हां! मुकेश अंबानी को नहीं मिलनी चाहिए “सरकारी” जेड प्लस सुरक्षा, लेकिन...

 

पिछले कुछ समय से लगातार दिल्ली सहित देशभर में महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं के सामने आने के कारण नागरिकों (विशेषकर) महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में सरकार की विफलता एक बार फिर उजागर हुई। महिलाओं की सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त व बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग को लेकर सारा देश उद्वेलित हो गया। पुलिस की सक्रियता पर जब सवाल उठें तो आला अधिकारियों ने पुलिस कर्मियों की कमी का रटा रटाया राग अलापना शुरू कर दिया। मीडिया तफ्तीश में पता चला कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था में तैनात हैं जिसके कारण पुलिस विभाग को धन व जन की कृत्रिम कमी से जूझना पड़ रहा है।

इसी बीच, एक और खबर आयी कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमैन व सीईओ मुकेश अंबानी को एक आतंकी संगठन द्वारा जान से मारने की धमकी दी गई है। जांच पड़ताल में धमकी की बात सही पाए जाने पर सरकार की तरफ से तत्काल ही मुकेश अंबानी को “जेड प्लस” सुरक्षा प्रदान कर दी गई। हालांकि मुकेश अंबानी ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर आने वाला सारा खर्च (15 लाख रुपए) स्वयं वहन करना स्वीकार किया।

हालांकि सरकार के इस फैसला का जमकर विरोध भी हुआ, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मसले पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। यह बात और है कि सर्वोच्च न्यायालय की नाराजगी मुकेश अंबानी को जेड प्लस सुरक्षा प्रदान करने के मामले में नहीं बल्कि आम जनता व बच्चियों को सुरक्षा प्रदान करने में सरकारी असक्षमता को लेकर थी। इसके बावजूद यह मसला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का मुद्दा बना। कुछ लोगों को इसमें सरकार की अमीरों के प्रति प्रेम व गरीबों के प्रति दोहरे आचरण की बात दिखाई दी तो कुछ को उद्योगपतियों के हाथों खिलौना बनने का आभास हुआ। हालांकि असल मुद्दा, यानि कि देश के सर्वाधिक कर प्रदान करने वाले व्यक्ति को सरकारी खर्च पर सुरक्षा व्यवस्था मिलनी चाहिए या नही? था। इसके अलावा एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि आखिर मुकेश अंबानी को सरकारी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत ही क्यों पड़ी? क्या 15 लाख रुपए मासिक खर्च पर मुकेश को दुनिया के एक से बढ़कर एक सुरक्षा एजेंसियों की सेवा नहीं मिल जाती? फिर आखिर मुकेश अंबानी को इतनी फजीहत झेलते हुए सरकारी सुरक्षा लेने की जरूरत क्यों पड़ रही है? सवाल यह भी है कि देश में तमाम ऐसे उद्योगपति हैं जो सुरक्षाकर्मियों का खर्च वहन करने में सक्षम हैं और यदि कल को वह भी पेड जेड प्लस सुरक्षा की मांग करते हैं तो क्या सरकार के पास इतनी संख्या में प्रशिक्षित कमांडो हैं कि सबकी मांग पूरी की जा सके?

दरअसल, यह भारतीय कानून ही है जिसके कारण आज ऐसे तमाम “क्या” सवाल के रूप में सामने आ रहे हैं। भारतीय कानून (आर्म्स एक्ट) के अनुसार कुछेक जगहों को छोड़कर सार्वजनिक स्थानों, कार्यालयों, हवाई अड्डा परिसर आदि में निजी सिक्योरिटी गार्ड खतरनाक अग्नेयास्त्रों को लेकर प्रवेश नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा चुनाव आदि जैसे मौकों पर भी इनकी पाबंदी है। जबकि सरकारी सिक्योरिटी के साथ ऐसी बंदिश कम ही स्थानों पर है। दूसरा कारण यह है कि हमारे देश में अब भी “गन कल्चर” को गलत माना जाता है और लोगों को अपने पास (विशेष परिस्थितियों को छोड़कर) बंदूक रखने की इजाजत नहीं होती। यहां तक कि जरूरत साबित कर देने के बावजूद असलहों को रखने के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया इतनी कठिन है कि वैद्य लाइसेंस युक्त असलहे कम ही देखने को मिलते हैं।

इसके अलावा सुरक्षा, व्यवसाय करने की आजादी, संपत्ति अर्जित करने की आजादी आदि जैसे मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित कराने के ऐवज में भारी भरकम कर प्रदान करने वाले व्यक्ति को भी क्या अपने जीवन की रक्षा के लिए अलग से शुल्क चुकाना चाहिए? यदि हां तो राजनेताओं को इस दायरे से मुक्त क्यों रखा जाता है?

तो क्या यह मान लेना चाहिए कि यदि मजबूर और लाचार व्यक्ति मारा जा रहा है तो सक्षम और समर्थ व्यक्ति भी बेवजह इसलिए मारा जाए क्योंकि समाजवादी व्यवस्था एक की सुरक्षा में असक्षम होने के कारण दूसरे की सुरक्षा में सक्षमता से रोकती है? चूंकि भारत देश के बाहर और भीतर दोनों से सुरक्षा की चुनौतियां झेल रहा है क्या अब यह समय नहीं आ गया है कि अस्त्रों से संबंधित कड़े नियमों को ढीला किया जाए और लोगों को अपनी सुरक्षा की जरुरतों को खुद पूरा करने में सक्षम बनाया जाए।

 

- अविनाश चंद्र