व्यंग्यः नेताजी को किस बात की टेंशन ?

नेताजी का मन उदास था। रह रहकर कुछ अजीब सी 'फीलिंग' हो रही थी। चलते मॉनसून सत्र में उनका काम में मन नहीं लग रहा था। इलाके के लोगों ने कई सवाल देकर भेजा था उन्हें लेकिन वो आज साथी सांसदों के लिए भी खुद एक सवाल बन गए थे। उनके मुरझाए हुए चेहरे को देखकर आलाकमान ने भी उन्हें आज जरुरी हो तो सिर्फ गांधी प्रतिमा के पास मुंह पर काली पट्टी बांधने का काम दिया था, जबकि जिनके चेहरे पर तेज था, उन्हें वेल में उतरकर हल्ला-गुल्ला करने और कागज उड़ाने जैसे तमाम अधिकार थे। नेताजी को डर सताने लगा था कि हाल यही रहा तो उनका टिकट कट सकता है। नेताजी का प्लान था कि मॉनसून सत्र के आरंभ होते ही वो परिवार समेत गोवा निकल लेंगे क्योंकि संसद में हल्ला गुल्ला ही होना है और यह काम उनके साथी कर लेंगे। लेकिन ऐन मॉनसून सत्र से पहले जिस तरह अविश्वास प्रस्ताव का ड्रामा हो गया, व्हिप जारी हो गया, उसने नेताजी का सारा प्लान चौपट कर दिया। पत्नी किचकिच कर रही थी। बच्चे गरिया रहे थे। यह सब छोटी मोटी परेशानी थीं लेकिन नेताजी को असल परेशानी क्या थी- उन्हें समझ नहीं आ रहा था।  

डॉक्टर बोला-'आपके लक्षण कहते हैं कि या तो आप प्यार में हैं या तनाव में !'

नेताजी ज़ोर से चौंके-प्यार में ?

उनके चौंकने के अंदाज से डॉक्टर समझ गया। बोला-'आप प्यार के मारे नहीं लगते। वैसे भी, हर शादीशुदा बंदा इस दौर में एक्स्ट्रा अफेयर अफोर्ड नहीं कर सकता। आपको ठेठ तनाव ही है।'

नेताजी ने कहा-' ठेठ तनाव, मगर किस बात का?'

डॉक्टर बोला-' ये आपको पता होगा। और हो सकता है कि इस बात का ही तनाव हो कि आपको किसी बात का तनाव नहीं है।'

डॉक्टर की यह दार्शनिक सूक्ति नेताजी के दिल में घर कर गई। उन्हें पहला डर यही लगा कि क्या उन्हें ऑरिजनिकल टेंशन भी नहीं हो सकता है। फैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न करें तो सुना था लेकिन क्या वे इतने गये गुजरे हैं कि असली टेंशन भी नहीं ले सकते और टेंशन न होने से उन्हें टेंशन है।

रात पर चिंतन जारी रहा कि आखिर तनाव किस बात का है? क्या टिकट कटने की आशंका से मन घबराया हुआ है। क्या साले को विधानसभा का टिकट दिलाना है, उससे मन उदास है। क्या आलाकमान के पास एक खोखा पहुंचाना है, उसका टेंशन है। पूरी रात जब समझ नहीं आया कि तनाव किस बात का है तो सुबह नेताजी का ब्लड प्रेशर हाई होने लगा। अचानक तनाव और ब्लडप्रेशर के कॉम्बो ऑफर ने घबराहट और बढ़ा दी।

इसी घबराहट में वे फिर चिंतन में जुट गए कि उन्हें तनाव किस बात का है। क्या उन्हें इस बात का तनाव है कि जिस गांव को गोद लिया था-वहां कोई काम नहीं कराया और जब वो सांसद नहीं रहेंगे तो वहां की जनता पीटेगी। क्या उन्हें इस बात का तनाव है चुनाव प्रचार में जितनी जुमलेबाजी की है-उसका विरोधियों ने कच्चा चिट्ठा बना लिया है। कहीं कोई अदृश्य सीडी तो नहीं मार्केट में आने वाली?

तनाव का कारण खोजते खोजते नेताजी बालकनी में निकल आए। सामने देखा तो छोटा बेटा पैर पटकते हुए चला आ रहा था। नेताजी ने पूछा-"क्या हुआ चुन्नू । इतना गुस्से में क्यों हो।" 

बेटा बोला-"गुस्से में नहीं हूं। टेंशन में हूं। ट्यूशन टीचर ने बोला था कि कल आएंगी पढ़ाने लेकिन आज ही आ रही हैं। मैंने होमवर्क भी नहीं किया।टेंशन में दिमाग खराब हुए जा रहा है।"

नेताजी की दिमाग की बत्ती चल गई। वो समझ गए कि तनाव तो सबको है। बच्चों को अच्छे नंबर लाने से लेकर मां-बाप के मोबाइल न देने तक का तनाव है। ज्यादातर किशोर लड़कों को गर्लफ्रेंड न होने का तनाव है तो कुछ को ब्रेकअप होने का। कुछ ऐसे भी हैं, जिनके पास गर्लफ्रेंड है लेकिन दूसरों की खूबसूरत या रईस गर्लफ्रेंड देखकर तनाव में हैं। किशोर लड़कियां फेसबुक पर डाली अपनी सेल्फी पर पर्याप्त लाइन न मिलने से तनाव में हैं। युवा रोजगार न मिलने से तनाव में हैं। और जिनके पास नौकरी है वो औकात से ज्यादा कर्ज लेने के बाद ईएमआई की वजह से तनाव में हैं। किसान कर्ज से तनाव में है और व्यापारी जीएसटी से। हारा हुआ नेता इसलिए तनाव में है कि बैठे बैठाए 10-20 करोड़ रुपए चुनाव में खर्च हो गए और अब कोई ठेका वगैरह नहीं मिलेगा तो पैसा वापस कैसे आएगा? जीता हुआ नेता मंत्री बनने के लिए तनावग्रस्त है। प्रधानमंत्री नाकारा मंत्रियों और सांसदों से तनावग्रस्त हैं कि यही लोग नैया डुबोएंगे। विपक्ष के तमाम नेता कोई सर्वमान्य नेता न होने से तनावग्रस्त हैं।

नेताजी को समझ आने लगा कि तनाव ही सत्य है? वैसे, त-नाव में एक नाव भी है, और ये नैया कई लोगों को इस भव सागर में बड़ा होने का अहसास दिलाती है। बंदा जितना बड़ा उतना ज्यादा तनाव। नेताजी ने सोचा कि पार्षद होते ही उन्होंने नेता की पदवी ली थी यानी वे तभी बड़े आदमी बन गए थे यानी उन्हें तबसे टेंशन होनी चाहिए थी। लेकिन चलिए देर आए दुरुस्त आए। नेताजी ने गहरी सांस ली और पत्नी को फोन किया-चलो गोवा चल रहे हैं। मॉनसून सत्र गया तेल लेने। काहे टेंशन लेनी सत्र-वत्र की। जो बिल पास होने हैं,वो मेरे बगैर भी पास होंगे, और जो अरसे से पास नहीं हुए-वे नहीं होंगे तो क्या हो ही जाएगा।

भयंकर टेंशनात्मक होने के बाद यह आराम का क्षण था। नेताजी गोवा पहुंच चुके थे। टेंशन से दूर।

- पीयूष पांडेय (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार और धंधे मातरम् और छिछोरेबाजी का रिज्योल्य़ूशन नामक व्यंग्य संग्रह लेखक हैं)

-फोटोः Rediff.com

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