बीच राह में खड़े मतदाता की त्रासदी

संदर्भः मोदी से मोहभंग और राहुल गांधी पर भरोसा न होने से उनके सामने वोट देने का विकल्प नहीं

जब 2014 में मैंने मोदी को वोट दिया था तो मैंने अपने वामपंथी मित्र खो दिए थे। मैंने अपने दक्षिणपंथी मित्र तब गंवा दिए जब मैंने नोटबंदी, बहुसंख्यकों के प्रभुत्व की राजनीति करने और हमारे संस्थानों को कमजोर करने के लिए मोदी की आलोचना की। जब मेरे दोस्त ही नहीं बचे तो मैं समझ गया कि मैं सही जगह पहुंच गया हूं। आम चुनाव निकट आने के साथ मेरा मोह भंग हो गया है। अच्छे दिन तो नहीं आए पर राष्ट्रवाद आ गया और जिस भारत से मैं प्यार करता हूं, वह बदल रहा है। मैं मोदी भक्त और मोदी से नफरत करने वालों से घिरा हूं, दोनों को मैं कुछ अरुचिकर पाता हूं। लेकिन मुझे पता ही नहीं है कि मैं किसे वोट दूं। मुझे राहुल गांधी पर भरोसा नहीं है और वंशवाद मुझे पसंद नहीं है। महागठबंधन से तो मुझे भीषण डर लगता है। यह अराजक गठजोड़ मोदी को हटाने के अलावा कोई पेशकश नहीं करता। मुझे सिर्फ यही सांत्वना है कि मैं अकेला नहीं हूं।

पांच साल पहले मैं खफा था। महंगाई बहुत अधिक थी, आर्थिक वृद्धि दर घट रही थी, घोर भ्रष्टाचार था और यूपीए सरकार पंगु बन गई थी। मैं चिंतित था कि भारत फिर मौका न गंवा दे। इसके पास युवा आबादी होने का सीमित अवसर था। यदि कामकाजी युवा आबादी को रोजगार दिया जा सके तो देश को बोनस जीडीपी मिल सकती थी। मुझे लगा कि अगले नेता के लिए यह नैतिक अनिवार्यता है कि वे जॉब निर्मित करने की परिस्थितियां बनाएं। अन्यथा एक दर्जन वर्षों में यह अवसर गायब हो जाएगा। मैनें निर्णय लिया कि मोदी ही हमारी श्रेष्ठतम उम्मीद है। यह आसान फैसला नहीं था। हिंदू राष्ट्रवाद ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया। मैं मोदी की तानाशाही प्रवृत्तियों से भी वाकिफ था और धर्मनिरपेक्षता के लिए जोखिम से भी। मैनें गुजरात 2002 के दाग की अनदेखी नहीं की लेकिन, मेरी दलील यह थी कि यदि भारत जॉब निर्मित करने में नाकाम रहा तो हम एक और पीढ़ी गंवा देंगे। वर्ष 1050 से 1990 के बीच दो पीढ़ीयां गंवा देना ही कोई कम नुकसान नहीं था। मुझे लगा था कि भारत के लोकतांत्रिक संस्थान तानाशाही शासन पर लगाम लगा देंगे और मोदी ने भी सबक सीखा है, क्योंकि 2002 के बाद से गुजरात शांत था।

पांच साल बाद मैं हताश हूं, क्योंकि वादे के मुताबिक नौकरियां कहीं नजर ही नहीं आ रही हैं और किसान भी तकलीफ में है। मोदी बदलाव लाने वाले नेता नहीं निकले। मुझे उम्मीद थी कि वे ऐतिहासिक बहुमत का फायदा उठाकर तेजी से सुधार लाएंगे। यदि उन्होंने कृषि उपज के वितरण में सुधार लागू किए होते तो खेती के संकट को कई अंशों में टाला जा सकता था। वे बैंकिंग के संकट का इस्तेमाल सबसे खराब सरकारी बैंकों के निजीकरण में कर सकते थे। फिर भी मुझे खुशी है कि अर्थव्यवस्था को काफी हद तक ठीक ढंग से संभाल लिया गया है। वित्तीय घाटा कम हुआ है, महंगाई रिकॉर्ड 2-3 फीसदी तक गिर गई है और बुनियादी ढांचे में सुधार हो रहा है। दिवालिया कानून, जीएसटी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसे उनके मुख्य सुधारों से आगे के वर्षों में अत्यधिक फायदा मिलेगा। नोटबंदी विनाशकारी थी पर जीएसटी गेम चेंजर साबित होगा। दिवालिया कानून संपत्तियों का उत्पादक इस्तेमाल सुनिश्चत करेगा। रिसावग्रस्त सरकारी सब्सिडी का धीरे धीरे नकद हस्तांतरण में बदलाव हो रहा है।

नागरिक व सरकार के बीच ऑनलाइन लेन-देन से बिजनेस करने की आसानी की विश्व बैंक की रैंकिंग में भारत ने 30 स्थानों की उछाल लगाई है। देश बेहतर ढंग से काम करे, मोदी ने इसकी शुरूआत कर दी है। इन उपलब्धियों के बावजूद मैं भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति इसके जुनून से नाखुश हूं। मोदी विभाजनकारी रहे हैं और अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। देश के संस्थान कमजोर हुए हैं जैसे अब मैं जीडीपी और नौकरियों के आंकड़ों पर भरोसा नहीं करता।

मोदी नतीजे देने में नाकाम क्यों रहें? यह सरकार की कमजोर क्षमता और सिविल सेवा पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने का परिणाम है। उन्होंने बहुत सारे कार्यक्रमों की घोषणा कर दी और इसमें रोजगार जैसे अहम मुद्दे खो गए। उत्पादक रोजगार निर्मित करने के लिए भारत को अधिक प्रतिस्पर्धात्मक होना पड़ेगा। यह ऐसा जटिल काम है कि वह आईएएस अधिकारियों पर नहीं छोड़ा जा सकता है, जो निर्यात को लेकर पुराने निराशावाद से पीड़ित हैं। निराशावादियों को याद दिलाना होगा कि वैश्विक व्यापार 16 लाख करोड़ डॉलर है और इसमें भारत का हिस्सा सिर्फ 1.7 फीसदी है। यदि यह 205 तक बढ़ जाए तो अच्छे दिन आ जाएंगे। चीन से विदा हो रही नौकरियां वियतनाम नहीं, भारत में आनी चाहिए। जब मोदी ने 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' का वादा किया, तो मुझे अपेक्षा थी कि वे सरकारी ढांचे में सुधार लाने का कठिन काम शुरू करेंगे। न्याय पाने में 12 साल क्यों लगते हैं? आईएएस में आने वाले किसी भी प्रतिभाशाली युवा को इस तथ्य से ज्यादा कोई बात हताश नहीं करती कि अच्छा प्रदर्शन करने वाले और खराब प्रदर्शन करने वाले को साथ में पदोन्नति मिलती है। सरकार की कमजोरी, जरूरत से ज्यादा जवाबदेही से और भी बढ़ जाती है, क्योंकि देश हमेशा चुनाव के दौर में ही रहता है। मोदी ने एक साथ चुनाव कराने की हिमायत की पर विपक्ष उन्हें समर्थन देने में नाकाम रहा।

ऐसे में मैं 2019 में किसे वोट दूंगा? सच तो यह है कि मैं नहीं जानता। अब तक मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बने हुए हैं। इसकी उम्मीद कम है कि कांग्रेस और इसके सहयोगी एकजुट होकर प्रभारी सरकार का स्वरूप लेंगे। मैं आंकड़ों में कम जाने वाले और अधिक धर्मनिरपेक्ष मोदी या अधिक अनुभवी, दृढ़प्रतिज्ञ, सुधारों के भूखे राहुल गांधी को तरजीह दूंगा। लेकिन, यह काल्पनिक ख्वाहिश है। इन दोनों में, मैं जानता हूं कि मोदी कहीं अधिक आर्थिक व शासन संबंधी सुधार कर पाएंगे लेकिन, क्या मैं इसके लिए सामाजिक वैमनस्यता का बहुत बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हूं? राहुल गांधी के मातहत देश अधिक धर्मनिरपेक्ष होगा पर उनकी रूचि जॉब निर्मित करने में नहीं, सिर्फ खैरात बांटने में है। क्या मैं एक और पीढ़ी की बलि चढ़ाने को तैयार हूं जैसे नेहरू व इंदिरा गांधी के लाइसेंस राज में चढ़ा दी गई थी?

मध्यमार्गी होने के कारण मेरा रुझान जो तर्कसंगत और व्यवहारिक है उसके लिए वोट देने की ओर होता है। मुझे लगता है कि मेरी तरह कई भारतीय मतदाता बीच राह में खड़े होने की त्रासद दुविधा में फंस गए हैं।

- गुरचरण दास (लेखक और स्तंभकार)
साभारः दैनिक भास्कर, 5 अप्रैल 2019

गुरचरण दास