क्या है मोदी का विकास का माडल? -----(3)

गुजरात ने इस दलील को गलत साबित कर दिया है कि लोगों को कम दाम में बिजली चाहिए होती है और वह ज्यादा दामों का भुगतान नहीं करना चाहते। गुजरात का अनुभव बताता है कि लोग भुगतान करने को तैयार होते हैं बशर्ते बिजली सप्लाई बेहतर हो। यह ज्योतिग्राम योजना के साथ भी हुआ है। एक बार जब बिजली पूर्व निर्धारित समय पर उपलब्ध हो जाती है तो कृषि के लिए मिलनेवाली सब्सिडाइज्ड रेटवाली बिजली को घरेलू खपत के लिए इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति कम हो गई है। ज्योतिग्राम योजना ने बिजली के ट्रांसमिशन और वितरण के दौरान होनेवाले नुक्सानों को कम किया है। उसने ट्रांसफारमर खराबी घटनाओं को कम करने में  भी मदद की है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस योजना ने सारे गांवों तक बिजली पहुंचाई है वह भी बिना लोड शेडिंग के। इससे सामाजिक –आर्थिक लाभ कई गुना बढ़े हैं। सरदार पटेल पार्टीसिपेटरी वाटर कंजरवेशन स्कीम के तहत लाभप्राप्त करनेवालों से अंशदान लेकर चैक डैम बनाए गए हैं। कुछ मामलों 20 प्रतिशत तो कुछ मामलों में 10 प्रतिशत अंशदान लिया गया है।

गुजरात माडल के विरोधी इस बात से इंकार नहीं कर पाते कि गुजरात की विकास दर बहुत अच्छी है और उसमें निरंतरता भी बनी हुई है। लेकिन उनकी एक सशक्त दलील यह होती है कि गुजरात का आर्थिक विकास मानवीय विकास सूचकांकों में प्रतिबिंबित नहीं होता। यही कारण है कि इन सूचकांकों से स्पष्ट है कि गुजरात में कुपोषण बहुत ज्यादा है, बड़े पैमाने पर बच्चे अनिमिक हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी गुजरात कई राज्यों की तुलना में पीछे हैं। लेकिन कई प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इन दलीलों से सहमत नहीं हैं। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और जानेमाने अर्थशास्त्री जगदीश भगवती और कोलंबिया विश्वविद्यालय के ही प्रोफसर अरविंद पानगारिया ने अपनी पुस्तक –इंडियाज ट्राइस्ट विथ डेस्टीनी – में कहते हैं कि गुजरात एक रूपक है। जिसका एक संदेश है कि विकास गरीबी उन्मूलन का सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। भारत को दोनों बातों की जरूरत है कि विकास दर तेज हो और उसे टै्रक -2 सुधारों के जरिये समावेशी बनाया जाए। इन अर्थशास्री द्वय का कहना है कि हम परंपरागत रूप से उपयोग में लाए जानेवाले विकास के रिसने शब्द का उपयोग करने के बजाय ऊपर उछने शब्द का प्रयोग करत हैं विकास गरीबी को कम करके आमदनी को बढ़ाता है जिससे सामाजिक सूचकांकों आपेक्षित परिवर्तन होता है। (हालांकि जहां तक कुपोषण का सवाल है लोगों की रुचि पोषख भोजन के बजाय रुचिकर भोजन की ओर बढ़ने से कुफोषण बढ़ भी सकता है) गुजरात में सभी सामाजिक सूचकांकों में काफी वढ़ोतरी दिकाई देती है। गुजरात को विरासत में मिले सामाजिक सूचकांक काफी निम्न स्तर के थे। और इन सूचकांकों में मामले में गुजरात ने बहुत प्रभावी प्रगति की है। साक्षरता दर को ही लें वह 1951 में केवल 22 प्रतिशत थी। जो 2001 में 69 प्रतिशत हो गई और 2011 में 79 प्रतिशत। इसी तरह बाल मडत्यु की दर भी घटी है। 1971 में वह 144 थी 2001 में वह घटकर 60 हो गई तो 2011 में में और घटकर 41 रह गई। सबसे अच्छी बात यह है कि सापेक्ष रूप से उच्च प्रति व्यक्ति आय और उच्च विकास दर के कारण राजस्व में तेजी से वडद्धि होती रहेगी इसके साथ सुशासन के जुड़ जाने से सभी क्षेत्रों में तेजी विकास होगा। कुछ चुने हुए सामाजिक सूचकांकों को पर खासकर उनके स्तर पर ध्यान देना बहुत सार्थक नहीं होता। हमें कई सूचकांकों में हुए हुए परिवर्तनों को समग्र रूप में देखना चाहिए। उस दृष्टि से गुजरात का प्रदर्शन कापी अच्छा रहा है। इसलिए हम नरेंद्र मोदी द्वारा आर्तिक क्षेत्र में दिए नेतृत्व से प्रभावित हैं।

लेकिन केवल भगवती ही नहीं कई उद्योगपति, अर्थशास्त्री और सामान्य लोग भी नरेंद्र मोदी के सुशासन और राज्य के विकास के मामले में  दिए गए नेतृत्व से इस कदर अभिभूत हैं कि उन्हें नेरंद्र मोदी बारत के मार्घरेट थेचर साबित हो सकते हैं जो भारत में समाजवादी युग के जो मकडजाले है उन्हे मुस्तैदी से साफ कर देश में तीव्रगति से सुधार लाकर उसे आर्थिक स्वतंत्रता युक्त विकास के पथ पर ले जा सकते हैं। (समाप्त)

- सतीश पेडणेकर