सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

हर रोज और घंटे दर घंटे भारी उतार-चढ़ाव देखने वाली विनिमय दर का कोई खुले तौर

इस सवाल का जो लगभग अनबूझ जवाब मैंने दिया है उसका महत्व समझने में कुछ पल का वक्त लगेगा, मैं यह कह रहा हूं कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा संबंधित स्कूलों, परिवारों और कुल मिलाकर समाज के लिए या तो अच्छी हो सकती है या फिर बुरी। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है, जिसमें

बर्लिन की दीवार को 13 अगस्त 1961 की रात को खड़ा कर दिया गया था। दीवार से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, जो 31 जुलाई 1989 तक के हैं-

  • पश्चिमी बर्लिन के ईद-गिर्द बॉर्डर की कुल लंबाई थीः 155 किमी.
  • पश्चिमी और पूर्वी बर्लिन के मध्य बॉर्डर थाः 43.1 किमी.
  • पश्चिमी बर्लिन और पूर्वी जर्मनी के मध्य बॉर्डर थाः 111.9 किमी.
  • बर्लिन के आवासीय इलाकों से निकलने वाला बॉर्डर थाः 37 किमी.
  • बर्लिन दीवार पर मारे गए लोगों की संख्याः 192
  • गोलीबारी में घायल हुए लोगों की संख्याः 200

 

बर्लिन की दीवार बनने का फैसला साम्यवाद को बचाने की आखिरी कोशिश कहा जा सकता है लेकिन दुनिया का दस्तूर है दीवारों के सहारे दुनिया को सुरक्षित रखने के नाम पर असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। वैमनस्य और शोषण का प्रतीक बनी यह दीवार किन हालातों में बनी और ढहीः

नब्बे के दशक की बात है जब मैं पूर्व भारत में काफी भ्रमण किया करता था। अपनी इन यात्राओं से मैं इस नतीजे पर पहुंच गया था कि भारत जल्द ही आर्थिक तौर पर तरक्की कर लेगा और इतिहास में पहली बार भारतीय हर बात की कमी से जूझने से उपर उठकर एक ऐसे युग में पहुंच जाएंगे जब अधिकांश की जिंदगी आराम की होगी।

अमेरिका की सिलीकॉन वैली और भारत के बैंगलूरू ने निश्चित ही मलेशिया के मल्टीमीडिया कॉरीडोर या टोक्यो बे के अत्याधुनिक आइटी पार्क की तुलना में जबरदस्त सफलता हासिल की है. सिलीकॉन वैली के सफल उद्यमी कंवल रेखी बता रहे हैं उद्यम, उद्योग और उद्यमिता की

बदलाव की राह दिखाते कुछ मंत्री - Read complete article...

जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत-अमेरिका परमाणु करार को आगे बढ़ाने की बात की तो कई विश्लेषकों को यह लगा कि बुश अमेरिकी परमाणु उपकरण निर्माताओं के लिए कई अरब डॉलर के ऑर्डर का रास्ता साफ करने में जुटे हैं। कई भारतीय वैज्ञानिकों ने इस करार का विरोध इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे घरेलू परमाणु ऊर्जा संयंत्र में अमेरिकी दखल बढ़ेगा।

भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के लिए दौड़ की शुरुआत हो चुकी है। इस रेस में रूस काफी आगे है। फ्रांस की कंपनी अरेवा दूसरे नंबर पर है। अमेरिकी-जापानी उपक्रम (जीई-हिताची और तोशिबा-

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