सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आज के जमाने में अगर आप किसी यूनिवर्सिटी कैंपस में खुली बाजार व्यवस्था की बात करेंगे तो आप वैश्वीकरण की आलोचनाओं के तले दब जाएंगे। छात्रों और फैकल्टी के बीचअंतरराष्ट्रीय बाजार की मुखालफत की मुख्य वजह दूसरों के हितों की चिंता है। इसके पीछे सामाजिक और नैतिक कारण है। अगर इसे सरल शब्दों में कहें तो वे मानते हैं कि वैश्वीकरण का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता, लेकिन मैं इसके उलट सोचता हूं। मेरा मानना है कि वैश्वीकरण के चलते न केवल धन संपदा का निर्माण और विस्तार हो रहा है, बल्कि इसमें शामिल पक्षों में बेहतर नैतिक मूल्यों का विकास भी हो

एक तरफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जूझती और दूसरी तरफ बिहार में करारी हार झेलने के बाद, कांग्रेस एक नाज़ुक दौर से गुज़र रही है. इसी माहौल के बीच पार्टी ने अपनी स्थापना के 125 वर्ष भी पूरे किये और अपना 83वां महाधिवेशन दिल्ली में आयोजित किया. भ्रष्टाचार के मामलों पर विपक्ष की घेराबंदी, बिहार में चुनावी पराजय, राहुल गांधी से जुड़े कथित विकिलीक्स खुलासे, कुछ अन्य राज्यों में  आने  वाले विधानसभा चुनाव की तय्यारी और बढ़ती महंगाई समेत कई मुद्दों पर इस अवसर पर चर्चा हुई.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार किया कि

चायनीज़ दबाव को ना मानते हुए, भारत ने नोर्वे में चीन के लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी लियु श्याबाओ को मिलने वाले नोबेल शांति पुरस्कार समारोह में हिस्सा लिया. ऐसा कदम उठाते हुए, भारत ने स्वतंत्रता और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का अच्छा प्रमाण दिया. चीनी सरकार के आव्हान के चलते, रूस और पाकिस्तान समेत 15 देशों ने इस समारोह का बहिष्कार किया. ये समारोह विश्व मानवाधिकार दिवस पर मनाया गया और भारत, अमरीका, यू के और फ्रांस समेत 46 देशों इस अवसर में सम्मिलित हुए.

श्याबाओ चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार को समाप्त

आजादी पत्रकारिता पुरस्कारः एक परिचय

आजादी पत्रकारिता पुरस्कार, हिंदी संचार माध्यमों (प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक/रेडियो) में कार्यरत (पूर्णकालीन/अंशकालीन) अथवा किसी प्रकार (लेख/स्तंभ लेखन आदि) से जुड़े उदारवादी विचारधारा के समर्थक पत्रकारों को प्रदान किया जाने वाला पुरस्कार है, जो अपने रिपोर्ट, लेख या स्तंभ के माध्यम से उदारवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे पत्रकारों

क्यों बातें बेहतर होने पर ज्यादा खराब लगने लगती हैं?

अर्थशास्त्र के पेशे में इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि आय असमानता को लेकर आम सोच दिशाहीन करने वाली है। साथ ही इस बात के भी पक्के प्रमाण हैं कि अब तक जिन रुझानों का अध्ययन किया गया है, वे वास्तविक असमानता में इजाफे को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। विल (विलकिंसन) ने इस क्षेत्र में इनमें ज्यादा महत्वपूर्ण ताजा जानकारियों को संक्षेप में अच्छी तरह से पेश किया है। वह यह कह सकते थे कि जब घर बनाम व्यक्ति (लोग आजकल अकेले रहने के लिहाज से ज्यादा सक्षम/इच्छुक हैं, जिससे औसत में गिरावट हो

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 दरअसल 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार को सुनिश्चित करने की ही एक वैधानिक कोशिश है। इसके मुख्य बिंदु हैं-

  • 6 से 14 वर्ष तक की आयु के हर बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक अपने घर के पास स्थित स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।
  • सरकारी मदद पाने वाले निजी स्कूलों को कमजोर वर्गों और पिछड़े तबके के 25 फीसदी बच्चों को प्रवेश देना होगा।
  • निजी गैर अनुदानित स्कूलों को छोड़कर सभी स्कूलों का प्रबंधन स्कूल प्रबंधन

दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

हर रोज और घंटे दर घंटे भारी उतार-चढ़ाव देखने वाली विनिमय दर का कोई खुले तौर

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