सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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नैतिकता के मामले में खुली बाजार व्यवस्था एम्प्लीफायर की तरह है।हमारे पास ज्यादा दौलत और संसाधन देकर वह हमारे उन गुणों का और ज्यादा विकास करती है, जो पहले से ही हमारे पास हैं। इसका कुल मिलाकर जो नतीजा सामने आता है, वह मोटे तौर पर सकारात्मक होता है। अधिकतर लोग अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने दोस्तों के लिए अच्छी जिंदगी चाहते हैं और यह सकारात्मक नैतिकता का ही नतीजा है। बाजार समाज के अलग-अलग तबके के बहुत ज्यादा लोगों के लिए इंसानी जरुरतों की तमाम चीजें हासिल करने का एक मौका देता है, मुमकिन बनाता है।

खुली बाजार व्यवस्था के दूसरे पहलू हमारे

आलोचकों का सही ही मानना है कि खुली बाजार व्यवस्था परंपरा और वो सारे स्थानीय नियम कानून जो हमें नैतिकता को बनाए रखने और सिखाने में मदद करती, उनका पतन करती है। खास तौर पर बच्चों की हालत के बारे में जरा सोचिेए। वो नैतिकता सबसे पहले अपने परिवार से सीखते हैं जिसके साथ वो भावनात्मक तौर पर सबसे ज्यादा जुड़े होते हैं। प्यार बच्चों को नैतिकता के सबसे अधिक जोड़ता है और उनके अंदर दया और अपराधबोध जैसी जरुरी नैतिक भावना का विकास करता है। औद्योगिकीकरण से पहले के समाज में नैतिकता से जुडी आदतों को गांव,समुदाय या जनजातियों के साथ साथ धार्मक प्रतिष्ठान और लोक कहानियां और मजबूत करती थी।

बर्नाड हेनरी लेवी फ्रांसीसी विचारक हैं। उन्होंने तीस से ज्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें बेस्टसेलर अमेरिकन वर्टिगो भी शामिल है। हाल में उनकी किताब लेफ्ट इन डार्क प्रकाशित हुई है।

यह साफ है कि आज के जमाने में हर चीज के पैमाने के तौर पर स्वार्थ, पैशन, पैसे को लेकर अंधी होड़ और भौतिकतावाद को लेकर जिस तरह की जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है, वह हमारी नैतिकता का जोरदार पतन करती है। संक्षेप में कहें तो खुली बाजार व्यवस्था सभी नियम-कानून से मुक्त और सबसे ताकतवर के लालच से चलने वाली व्यवस्था है।

महान एलेक्जेंडर

अमेरिका के पैदा होने के समय अधिकतर समाज या तो जमींदारों के दबदबे में था या फिर सैन्य व्यवस्था के अधीन। अमेरिका के निर्माताओं ने इन मॉडल्स को खारिज करते हुए तर्क दिया कि एक ऐसी सोसायटी बनाई जाए, जहां व्यापार की छूट हो और जो जहां के लोग अपने कानून को मानें। इस तरह का समाज सत्ता की चाहत के लिए नहीं, बल्कि हर चीज को अधिकता में पाने के लिए समर्पित होगी। एलेक्जेंडर हेमिल्टन ने फेडरेलिस्ट-12 - में लिखा है ‘बड़े राजनयिक इस बात को अच्छे से समझ गए हैं और मानते हैं कि वाणिज्य की खुशहाली देश की समृद्धि का सबसे उपयोगी और लाभदायक स्रोत है। राजेनेताओं ने इसे अपने करियर का सबसे

बाजार में प्रतिस्पर्धा इंसान पर इस बात का जोरदार दबाव बनाती है कि अच्छे आचार विचार के साधारण नियमों को तोड़े और उसके लिए अच्छे तर्क भी बताए। यही वह निरपेक्षता( अपने पसंद की चीज हासिल करने के लिए खुद को धोखा देने की प्रवृति ) है, जो नैतिकता का पतन करती है। लेकिन खुली बाजार व्यवस्था की खिलाफत करने के लिए अपने आप में यह कोई तर्क नहीं है। उन लोकतांत्रिक तरीकों के बारे में भी सोचिए, जिनसे नैतिकता का पतन होता है। राजनीतिक सत्ता हासिल करने के चक्कर में भी लोगों की नौतिकता का पतन होता है। इसके लिए वह सार्वजनिक सभाओ में दूसरों पर चिल्लाते हैं, ऐसे वादे करते हैं जिन्हें वे निभा

पिछले कई दशकों के दौरान दुनिया ने ऐसे तमाम तरीके देखे हैं, जिसमें एक सक्रिय बाजार व्यवस्था के चलते भौतिक और सामाजिक प्रगति हुई है और साथ ही साथ उसी वक्त पर नैतिकता भी मजबूत हुई है। इसके ठीक उलट, वैसे लोग जो खुली बाजार व्यवस्था के विरोधी आदर्शवादी और योजनाबद्ध व्यवस्था में रहे हैं, उनका आर्थिक विकास एक ही जगह अटक गया। सिविल सोसायटी की हालत और खराब हुई और नैतिकता का पतन हुआ। हाल के दशक में योजनाबद्ध अर्थवयवस्था अपने ही विरोधाभासों के बीच खत्म हो गई। इस तरह के प्रयोग पूरी तरह से व्यवस्थागत नाकामी साबित हुए। तबाही को काफी लंबे समय तक झेलनेवाले लोग इससे छुटकारा पाने के लिए

खुली बाजार व्यवस्था प्रतिस्पर्धा की एक ऐसी जगह है, जहां इंसान का सबसे बेहतरीन बाहर आ सकता है। कंपीटिशन जोरदार है और जब अस्तित्व दांव पर लगा होता है,उस वक्त नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं बचती,लेकिन तमाम तरह की कमियों के बावजूद खुली बाजार व्यवस्था अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए अब तक आजमाई गए तमाम व्यवस्थाओं में सबसे बेहतर हैं।

शुरुआत में ऐसा लगता था कि आत्म-रुचि के आधार पर बनी व्यवस्था व्यक्ति को नैतिक पतन की ओर ले जाएगी। अगर कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के संघर्ष के दौरान आप अपने भाई की मदद करने के लिए पल भर भी रुकते हैं तो कंपीटिटर आपको पीछे छोड़

खुली बाजार व्यवस्था नैतिकता के कुछ पहलुओं को बर्बाद भी करती है और कुछ को बेहतर भी बनाती है। अब इसके नतीजे अच्छे हैं या बुरे या संतुलन में हैं, यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि अच्छी जिंदगी को कोई किस तरह से देखता है।

बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या कोई यह मानने के लिए तैयार है या नहीं कि दूसरी आर्थिक व्यवस्था अच्छा कर सकती है। इस सवाल का सही जवाब केवल तभी मिल सकता है, जब हम उनकी तुलना असल विकल्पों से करें और समझें कि किस तरह अलग-अलग व्यवस्था अलग-अलग तरह के मानवीय चरित्र का विकास करती है।

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