सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

इस पेज पर विभिन्न लेखकों द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं| उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्तराष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी काम-काज नियमावली की धारा 51 में संशोधन करवाकर हिंदी का नाम जुड़वाना होगा| इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं| सूरिनाम में संपन्न हुए पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन

बेफिक्र हो जाइए। अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग घटने के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था दोहरी मंदी (डबल-डिप रिसेशन) में फंसने नहीं जा रही है। हालांकि ग्लोबल इकनॉमी की रफ्तार सुस्त हो रही है। मुमकिन है कि लंबे समय तक आर्थिक रफ्तार सुस्त रहे। अक्सर जब वित्तीय संकट से मंदी शुरू होती है तो ऐसा होता है। ऐसे में शेयर बाजार में गिरावट खरीदारी का अच्छा मौका है। यह मंदी के निचले स्तरों तक नहीं जाएगा।

2 अगस्त को तकनीकी डिफॉल्ट से बचने के लिए अमेरिकी नेताओं के बीच वक्त रहते कर्ज सीमा बढ़ाने पर सहमति बन गई थी। आलोचकों का कहना था कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के

केरल के श्रीपद्मनाभ मंदिर से अकूत संपदा का प्राप्त होना दुनियाभर के लिए विस्मय का कारण बन गया है। इस संपदा का मूल्य एक लाख करोड़ रुपए आंका गया है, जबकि मंदिर का एक तहखाना खोला जाना अब भी बाकी है। इसके साथ ही श्रीपद्मनाभ मंदिर संपदा के मामले में तिरुपति सहित दुनिया के किसी भी अन्य धर्मस्थल से आगे निकल गया है। यदि कलात्मक महत्व के आधार पर मंदिर की संपदा का आकलन किया जाए तो यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। कुछ पश्चिमियों के दिमाग में इस संपदा ने वैसा ही जादू जगाया है, जैसा कभी गोलकुंडा के खजाने ने जगाया था। इसी खजाने की खोज में क्रिस्टोफर कोलंबस भारत को ढूंढ़ने निकला था, लेकिन

नेताओं को समझना होगा कि भारत का नया मध्यवर्ग आत्मसम्मान के लिए लड़ने को तैयार है. वह अपने गुस्से को खुद जाहिर कर रहा है. जन भावना का दबाव राजनीतिक व्यवस्था व नेताओं को अस्थिर कर देगा या फ़िर एक वास्तविक राजनीतिक सुधार की नींव रखेगा.

एक साल पहले किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि कई मंत्री, राजनेता, वरिष्ठ अधिकारी और सीइओ तिहाड़ जेल में होंगे और सुनवाई का सामना कर रहे होंगे. भारत में भ्रष्टाचार अब कोई नयी खबर नहीं है, यह आम प्रतिक्रिया अप्रत्याशित और एक पहेली की तरह है. यदि ऐसा है तो फ़िर घूसखोरी के खिलाफ़ अंतहीन आंदोलन क्यों हो रहे हैं? दरअसल, आज

देश में गरीब राज्यों को बेहतर जनसांख्यिकी लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) मिल रहा है। इस बार की जनगणना में देश की जनसंख्या वृद्धि दर में कुछ कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2001 की जनगणना में जहां जनसंख्या वृद्धि दर 21.54 फीसदी दर्ज की गई थी, वहां इस बार की जनगणना में यह दर 17.64 फीसदी दर्ज की गई है। सबसे अच्छी बात यह है कि 0-6 वर्ष तक के बच्चों की संख्या में 3.08 फीसदी की कमी आई है।

बच्चों की संख्या में कमी होने से किसी भी क्षेत्र को जनसांख्यिकी लाभांश हासिल होता है, जिसके कारण आने वाले दशक में उन क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय में काफी वृद्धि होगी। छह

सोवियत यूनियन और इसके साम्यवादी साम्राज्य के अंत की 20 वीं सालगिरह से पहले उसके सिद्धांतों पर चलने वाले भारत के एक राज्य पश्चिम बंगाल में भी साम्यवादी शासन ध्वस्त हो गया। चुनाव के बाद बृंदा करात के विश्लेषण से साफ जाहिर हुआ कि सीपीएम पहले सोवियत संघ और बाद में पश्चिम बंगाल में हार की वजहों से आंखें मूंदे बैठा है।

ब्रिटिश साम्राज्यवादी दावा करते हैं कि वे पिछड़ी नस्ल की आबादी में सभ्यता का प्रसार कर रहे थे। वामपंथी साम्राज्यवादियों ने भी उन लोगों के उत्थान का दावा किया, जिनमें क्रांतिकारी चेतना का अभाव था। अलबत्ता, पिछड़ी हुई नस्लों ने

चार जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में की गई पुलिस ज्यादतियों का विरोध करने वाले तमाम धर्माचार्य, योगाचार्य, संन्यासी और स्वयंसेवी संगठन अगर आने वाले समय में एक मंच पर एकत्र होकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की मांगों का समर्थन करने का तय कर लें और गांव-गांव और शहरों में फैले अपने करोड़ों समर्थकों से सरकार का विरोध करने का आह्वान कर दें तो कैसी परिस्थितियां बनेंगी?

तब क्या कोई बहस करेगा कि इन गैर-राजनीतिक लोगों से सरकार को बातचीत नहीं करनी चाहिए? तब भी क्या वही तर्क दिए जाएंगे, जो प्रणब मुखर्जी दे रहे हैं? केंद्र में बनने वाली सरकारें जिस तरह

देशभर के शहरों में रहनेवाले गरीबों के आंकड़े जुटाने के लिए एक जून से सात माह का सर्वे शुरू हो चुका है. इसके साथ ही गरीबों की पहचान के मानदंड पर बहस भी फ़िर छिड़ गयी है. यह विडंबना ही है कि तमाम योजनाओं के बावजूद गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

शहरी गरीबों की गणना की खबरों के साथ ही गरीबी को लेकर जारी बहस फ़िर छिड़ गयी है. यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि एक तरफ़ तो यह चुनावी प्रक्रिया में गरीबों की बढ़ती भागीदारी पर गर्व महसूस करती है, दूसरी तरफ़ इसी भागीदारी ने राजनीतिक और सांख्यिकीय रूप से गरीबों की पहचान को अत्यंत जटिल और

Pages