सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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पूंजीवाद हमारे मन में सिर्फ एक गाली की तरह आता है ,एक निंदा की तरह आता है बिना यह जाने की पूंजीवाद ने मनुष्य जाति के लिए किया क्या है। बिना यह जाने की पूंजीवाद ही मनुष्य जाति को समाजवाद तक पहुंचाने की प्रक्रिया है ,बिना यह समझे हुए कि अगर कभी मनुष्य समान होगा और अगर कभी सारे मनुष्य खुशहाल होंगे और अगर कभी मनुष्य दीनता और दरिद्रता से मुक्त होंगे तो उसमें सौ प्रतिशत हाथ पूंजीवाद का होगा।

पूंजीवाद के बारे में दो तीन बातें समझ लेना जरूरी हैं। पहली यह कि पूंजीवाद पूंजी पैदा करने की व्यवस्था का नाम है। एक ऐसी व्यवस्था जो संपत्ति का सृजन करती है।

उर्दू शायरी आमतौर पर इश्क प्यार की शायरी ही माना जाता है लेकिन उसमें कई रंग मौजूद हैं हैं ।उसमें हास्य व्यंग्य का रंग भरा है अकबर इलाहबादी ने ।अंग्रेज सरकार के मुलाजिम रहे अकबर इलाहबादी में अपने समय की विसंगतियों  पर खूब चुटकियां ली हैं ,फब्तियां कसी हैं जो हंसाती,गुदगुदाती और तिलमिलाती हैं।यही कारण है कि उनकी शायरी  जो भी उन्हें पढ़ता है उसकी जुबान चढ़ जाती हैं।उनकी- हंगामा है क्यों बरपा ,ठोड़ी सी जे पी ली है डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है - बच्चे-बच्चे की जुबान पर रही है। यहां पेश हैं उनके हास्य व्यंग्य से सराबोर कुछ शेरों की पहली किस्त -

अभी पांच विधानसभाओं के चुनाव हुए लेकिन एक भी नारा ऐसा नहीं सुनाई दिया जो याद रह जाए जनता को रोमांचित कर  दे। लगा कि चुनावों में वह मजा नहीं रहा। बिना नारों का चुनाव भी क्या चुनाव हुआ भला। चुनावों में  नारों का महत्व अपरंपार है । बिना नारे के तो चुनाव ऐसे बेमजा लगता है जैसे बिना नमक की सब्जी। असल में चुनाव में नारे ही माहौल बनाते हैं। नारे ही पार्टियों के चुनाव अभियान में दम और कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम करते हैं। कभी–कभी तो नारे ही चुनाव जीता भी देते हैं जैसे गरीबी हटाओं का नारा था। इसलिए हर पार्टी एक ऐसा नारा अपने लिए चाहती है जिससे वह वोटरों का दिल जीत

प्रसेनजीत बोस मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के युवा नेता है । इसके अलावा  वे पार्टी की रिसर्च यूनिट के संयोजक हैं। पिछले दिनों सतीश पेडणेकर  ने उनसे बजट और देश की आर्थिक स्थिति पर बातचीत की । यहां उसके कुछ अंश प्रस्तुत हैं -

कभी बजट केवल बैलेंस आफ बुक ही नहीं होता था उससे देश की आर्थिक नीति की दिशा भी तय होती थी। क्या अब बजट का वह महत्व खत्म हो रहा है?

बैलेंस आप बुक तो करना ही है । सवाल यह है कि आप बैलेंस आफ बुक किस तरह कर रहे हैं। इससे ही आपकी दिशा तय होती है। सरकार की नीति

पिछले दिनों एक किताब हाथ लगी। उसका शीर्षक देखकर ही मैं चौंक गया। शीर्षक था –मोरलिटी आफ कैपिटलिज्म यानी पूंजीवाद की नैतिकता। चौंकने की वजह यह थी कि पहली बार पता चला कि पूंजीवाद की भी कोई नैतिकता होती  है । अब तक तो यही जाना था कि  पूंजीवाद और नैतिकता का कोई लेना देना नहीं है । कुछ लोग कहते हैं कि पूंजीवाद नैतिकतावहीन है तो कुछ लोगों का कहना था कि पूंजीवाद अनैतिक है। कुछ व्यंग्य में कहते थे कि पूंजीवाद की एक ही  नैतिकता है कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाओ और अपनी तिजोरियां भरो। वामपंथियों का जो प्रचार हम लोग सुनते थे उसका एक ही लब्बोलुबाब यही होता था कि

आदि काल से ही महिलाओं को उनकी दर्द सहने की अदभुत क्षमता के कारण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन दर्द सहने की यह क्षमता ही कभी-कभी उनके लिए मुसीबत का सबब बन जाती है और उन्हें अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ जाता है। हार्ट अटैक के मामले में तो यह अदभुत क्षमता और ज्यादा खतरनाक साबित होती है। जी हां, अमेरिका में हुए एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि हार्ट अटैक के कारण महिलाओं की मृत्यु की प्रतिशतता पुरूषों की मृत्यु की प्रतिशतता से कहीं ज्यादा (लगभग ४१ फीसदी) होती है। इसका कारण महिलाओं में दर्द सहने की जबरदस्त क्षमता का होना ही होता है।

अगर आप अक्सर रेल यात्रा करते हैं और आपको आपनी जान प्यारी है तो अगली बार आपको रेल में यात्रा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए। कम से कम  अनिल काकोडकर समिति की रेलवे सुरक्षितता के बारे में आई रपट के बाद तो आपको चौकन्ना हो ही जाना चाहिए। एक तरह से रेल मंत्रालय के खिलाफ आरोपपत्र है यह रपट कि वह किस तरह रेलयात्रियों की जान के साथ खिलवाड कर रहा है। खराब और दोषपूर्ण रेलवे ट्रेक ,असुरक्षित खस्ताहाल कोच, बरसों पुराने रेलवे पुल,लिकिंग ब्रेक - यह हालत है रेलवे की सुरक्षितता की । तभी तो पचास प्रतिशत ट्रेन दु्र्घटनाएं पटरी से उतरने के कारण होती है तो 36 प्रतिशत अनमैन्ड लेवल

क्या आपको पता है, आपकी जानकारी व अनुमति के बगैर आपका मोबाइल फोन न केवल हैक कर उससे की गई बातचीत व एसएमएस की जानकारी ली जा सकती है बल्कि उससे फोन काल व एसएमएस भी किए जा सकते हैं। और तो और इसके लिए हैकर्स को आपके फोन को हाथ लगाने की भी जरूरत नही पड़ेगी। हैकर्स सात समुंदर पार बैठकर भी भारतीय मोबाइल फोन धारकों के फोन व नंबर को मनचाहे तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। अफसोस कि ऐसी स्थिति किसी नई तकनीकी के अविष्कार की वजह से नहीं बल्कि मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों की लापरवाही के कारण उत्पन्न हुई है। पणजी में साईबर विशेषज्ञों के एक दल ने सर्विस आपरेटरों के सुरक्षित सेवा प्रदान

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