सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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आंध्रप्रदेश सरकार माओवादी हिंसा पर प्रभावी ढंग से काबू पाने के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है। वैसे सारे देश को ही उसकी पीठ थपथपानी चाहिए। पिछले तीस वर्षों के दौरान वर्ष 2011 पहला मौका है जब राज्य में माओवादी हिंसा में  भारी कमी आई है। इस साल माओवादी हिंसा के केवल 41 मामले दर्ज हुए, छह लोगों की जानें गईं और कोई भी पुलिसवाला हिंसा का शिकार नहीं बना। यह आंकंड़े बताते है  कि माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा त्रस्त इस राज्य ने पिछले तीन दशकों में माओवादी हिंसा से लगातार संघर्ष करने के बाद उसपर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाने में महत्वपूर्ण सफलता पाई है। ऐसे समय जब हाल ही

डा.टॉम जी पॉमर पूंजीवादी दर्शन और नैतिकता के मुखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। वे जितने अच्छे लेखक है उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी। उनकी पुस्तक –रियलाइजिंग फ्रीडम : लिबरेशन थ्योरी,हिस्ट्री एंड प्रैक्टिस – उनके  स्वतंत्रता संबंधी विचारों का सशक्त प्रतिपादन है।पामर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति शासत्र में डाक्टरेट की है  और वाशिंगटन स्थित कैटो इंस्टीटयूट में सीनियर फैलो हैं। इसके अलावा वे एटलस नेटवर्क के अंतर्राष्ट्रीय प्रोग्राम के कार्यकारी उपाध्यक्ष है। हाल ही में वे अपनी नई पुस्तक -मारलिटी आफ कैपिटलिज्म – (पूंजीवाद की

दो चुनावों में तारा चमका
तीसरे में  डूब गया

राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के जरिये समृद्ध भारत बनाने की संकल्प प्रगट करके भारतीय राजनीति में एक नई लीक बनानेवाली नवजात स्वतंत्र पार्टी को अपनी स्थापना के ढाई साल के भीतर ही आम चुनाव की भारी चुनौती का सामना करना पड़ा और वह उस चुनौती का सामना करने में कामयाब भी रही। अपनी पहली चुनावी परीक्षा में  लगभग 8.54 प्रतिशत वोट और लोकसभा में अठारह सीटें प्राप्तकर वह देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई। उसे सत्तारूढ कांग्रेस और संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के बाद सबसे ज्यादा सीटें हासिल हुईं

उस दिन कब्रिस्तान के पास से गुजर रहा था तो लगा कोई कब्र में करवटें बदल रहा है ,कराह रहा है फिर रोने की सी आवाज सुनाई दी । तब मुझसे रहा नहीं गया मैं कब्र के पास पहुंचा और पूछा – अरे भाई कौन हो ,तुम्हें कब्र में भी  चैन नहीं । क्या नाम है तुम्हारा ? जब कुछ देर कोई आवाज नहीं आई तो मैंने फिर पूछा – अरे बताओं कौन हो क्या नाम है तुम्हारा ? शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं ? तब अंदर से जवाब आया –मेरा नाम है मार्क्स।

मैंने पूछा – कौन ,ग्रुचो मार्क्स।

मेरी बात सुनते ही अंदर से झल्लाती हुई आवाज आई

स्वतंत्र पार्टी का 21 सूत्री कार्यक्रम

1 और 2 अगस्त 1959 को मुंबई में हुए स्वतंत्र पार्टी के तैयारी सम्मेलन में इस 21 सूत्री कार्यक्रम को स्वीकार किया गया।

  1. स्वतंत्र पार्टी धर्म,जाति ,व्यवसाय और राजनीतिक भेदभाव के बगैर सभी को सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता का वादा करती है।
  2. पार्टी का मानना है लोगों की प्रगति,कल्याण और खुशी व्यक्तिगत पहल,उद्यमशीलता और ऊर्जा पर निर्भऱ करती है । पार्टी व्यक्ति को अधिकतम स्वतंत्रता और राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप, के पक्ष में हैं। राज्य पर केवल यह

दिलवालों की नगरी मानी जाने वाली दिल्ली ने प्रख्यात पार्श्व गायिका आशा भोंसले का दिल तोड़ दिया। यहां आयोजित एक समारोह के दौरान दिल्ली के अंग्रेजीदां लोगों ने उन्हें बेहद उदास और निराश कर दिया और वह कहने को मजबूर हो गई कि 'पहली बार पता चला दिल्ली में केवल अंग्रेजी ही बोली जाती है।' आलम यह रहा कि आशा ताई द्वारा इस बाबत ईशारा करने के बावजूद मंच संचालक व आयोजक उनकी इच्छा को भांपने में असफल रहे। परिणाम यह हुआ कि कार्यक्रम के शुरुआत में काफी खुश दिख रही आशा ताई की भाव-भंगिमाएं गंभीर होती गई और समापन होते होते उनका मूड भी खराब हो गया। यहां तक कि आशा ने आयोजकों द्वारा

आज भी कमी महसूस होती

है स्वतंत्र पार्टी की 

आजादी के बाद जब देश प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के समाजवादी समाज रचना के रंगीन और लुभावने सपनों के पीछे भाग रहा था तब देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसी उदारवादी राजनीतिक पार्टी उभरी जिसने न केवल नेहरू के समाजवाद का पुरजोर विरोध  किया वरन समाजवाद के नाम पर चल रहे परमिट कोटा राज को खत्म कर मुक्त अर्थव्यवस्था  को लागू करने की वकालत की । तब  उसे राजा-महाराजाओं ,जमींदारों ,धन्ना सेठों और

पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अत्यंत महत्वपूर्ण  बैठक में पार्टी के विचारधारा संबंधी प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया । इस प्रस्ताव को अगले वर्ष होनेवाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा।पार्टी कांग्रेस ही माकपा की सबसे बड़ी नीति नियंता होती है।इस प्रस्ताव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि माकपा  बीस साल बाद एक बार फिर विचारधारा संबधी प्रस्ताव तैयार कर रही है।यह बात अलग है कि साम्यवादी आंदोलन के कई जानकार ये मानते हैं कि यह प्रस्ताव वैचारिक लीपापोती ही होगी क्योंकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों में वैचारिक साहसिकता और

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