सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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पार्थ जे शाह देश के जानेमाने उदारवादी चितंक और अर्थशास्त्री है। इसके अलावा वे दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी के संस्थापक और अध्य़क्ष है। अर्थशास्त्र के कई क्षेत्रों में उन्होंने महत्वपूर्ण शोधकार्य किया है। इसकेअलावा फ्रीडमैन आन इंडिया, प्रोफाइल इन करेज :डिसेंट आन इंडियन सोशलिज्म, डू कार्पोरेशन्स हैव सोशल रिसपांसिबिलिटी?, सोशल पालिसी एड चेंज आदि कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं और कई पुस्तकों का संपादन किया है। बौद्धिक हल्कों में आर्थिक स्वतंत्रता के विषय पर उनके चिंतन को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हाल ही में सतीश पेडणेकर ने बजट पर उनकी

गुरूचरण दास देश के सुप्रसिद्ध लेखक और चिंतक है जो जिन्हें उनके बेबाक विचारों के लिए जाना जाता है। देश विदेश के अखबारों में छपनेवाली उनकी आर्थिक और अन्य विषयों पर टिप्पणियों को बहुत गंभीरता से पढ़ा जाता है। उनकी मुक्त भारत (इंडिया अनबाउंड)आजाद भारत में आ रहे आर्थिक परिवर्तनों का गहन विश्लेषण है जो उनकी दिशा को भी बहुत अचूक तरीके से इंगित करती है। उनकी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक है - अच्छाई की कठिनाई (द डिफीकल्टी आफ बिइंग गुड)। इसके अलावा उन्होंने कई नाटक भी लिखे हैं ।हाल ही में सतीश पेड़णेकर ने उनसे केंद्रीय बजट

भारतीय जनता पार्टी के नेता जगदीश शेट्टीगार जानेमाने अर्थशास्त्री भी है। पिछले दिनों सतीश पेडणेकर ने उनसे बजट और वर्तमान आर्थिक स्थिति पर बातचीत की। प्रस्तुत है यहां उसके कुछ अंश -

पहले बजट का उद्देश्य आर्थिक नीति की दिशा तय करना था लेकिन कहा जाता है कि अब वह बैलेंस आफ बुक ही रह गया है। आपका इस बारे में क्या कहना है?

पहले भी बजट का मकसद होता था  आर्थिक नीति की दिशा तय करना आज भी वही है। लेकिन हालात कई बार ऐसे  हो जाते  है कि वह दिशा स्पष्ट नहीं हो पाती। उदाहरणार्थ अभी

पिछले  सोमवार को कपास उत्पादक किसानों और कपास व्यापारी जब अपने काम पर गए तो उन्हें पता चला कि सरकार ने खेल के दौरान ही नियम बदल दिए हैं। विदेश व्यापार माहनिदेशक ने घोषणा की कपास के  और निर्यात पर तुरंत लागू होनेवाली पाबंदी लगा दी गई है।

इससे पहले इन  सभी भले लोगों ने यही सोचा होगा कि  उन्होंने दूसरों के साथ जो योजनाएं बनाई है  अनुबंध किए हैं उसे वे पूरा करेंगे। कुछ लोगों ने यह सोचकर कर्ज भी लिया होगा कि उन्होंने अपने कपास के लिए एक मूल्य हासिल कर लिया है। दूसरी जगहों पर व्यापारियों ने यही सोचकर अपने ग्राहकों को कपड़ा और

हाल ही में हुए  पांच विधानसभा चुनावों को 2014 में होनेवाले चुनावों का सेमीफायनल कहा जा रहा था। यदि ऐसा है तो उसके नतीजे यूपीए सरकार के लिए खतरे की घंटी हैं। इन चुनावों के नतीजों का एक एक स्पष्ट संदेश यह है कि एक उत्तराखंड को छोड़ दिया जाए तो  सभी राज्यों में मतदाता ने जहां जनता की उपेक्षा करनेवाली सरकारों को बुरी तरह हरा कर दंडित किया है तो दूसरी तरफ काम करनेवाली सरकारों को दूसरा मौका दिया है। एक और जो बात उभरकर आती है कि मतदाता जिसे जीता रहा है उसे जीताने में कंजूसी नहीं कर रहा है वरन उसे पूर्ण बहुमत देकर जीता रहा है ताकि उसके पास बच निकलने का मौका न रहे

पूंजीवाद हमारे मन में सिर्फ एक गाली की तरह आता है ,एक निंदा की तरह आता है बिना यह जाने की पूंजीवाद ने मनुष्य जाति के लिए किया क्या है। बिना यह जाने की पूंजीवाद ही मनुष्य जाति को समाजवाद तक पहुंचाने की प्रक्रिया है ,बिना यह समझे हुए कि अगर कभी मनुष्य समान होगा और अगर कभी सारे मनुष्य खुशहाल होंगे और अगर कभी मनुष्य दीनता और दरिद्रता से मुक्त होंगे तो उसमें सौ प्रतिशत हाथ पूंजीवाद का होगा।

पूंजीवाद के बारे में दो तीन बातें समझ लेना जरूरी हैं। पहली यह कि पूंजीवाद पूंजी पैदा करने की व्यवस्था का नाम है। एक ऐसी व्यवस्था जो संपत्ति का सृजन करती है।

उर्दू शायरी आमतौर पर इश्क प्यार की शायरी ही माना जाता है लेकिन उसमें कई रंग मौजूद हैं हैं ।उसमें हास्य व्यंग्य का रंग भरा है अकबर इलाहबादी ने ।अंग्रेज सरकार के मुलाजिम रहे अकबर इलाहबादी में अपने समय की विसंगतियों  पर खूब चुटकियां ली हैं ,फब्तियां कसी हैं जो हंसाती,गुदगुदाती और तिलमिलाती हैं।यही कारण है कि उनकी शायरी  जो भी उन्हें पढ़ता है उसकी जुबान चढ़ जाती हैं।उनकी- हंगामा है क्यों बरपा ,ठोड़ी सी जे पी ली है डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है - बच्चे-बच्चे की जुबान पर रही है। यहां पेश हैं उनके हास्य व्यंग्य से सराबोर कुछ शेरों की पहली किस्त -

अभी पांच विधानसभाओं के चुनाव हुए लेकिन एक भी नारा ऐसा नहीं सुनाई दिया जो याद रह जाए जनता को रोमांचित कर  दे। लगा कि चुनावों में वह मजा नहीं रहा। बिना नारों का चुनाव भी क्या चुनाव हुआ भला। चुनावों में  नारों का महत्व अपरंपार है । बिना नारे के तो चुनाव ऐसे बेमजा लगता है जैसे बिना नमक की सब्जी। असल में चुनाव में नारे ही माहौल बनाते हैं। नारे ही पार्टियों के चुनाव अभियान में दम और कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम करते हैं। कभी–कभी तो नारे ही चुनाव जीता भी देते हैं जैसे गरीबी हटाओं का नारा था। इसलिए हर पार्टी एक ऐसा नारा अपने लिए चाहती है जिससे वह वोटरों का दिल जीत

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