सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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अच्छे इरादवाले कानून और गरीब
दमघोटू लाइसेंस व्यवस्था  के अलावा कई तरह के नियम भी बाधाएं खड़ी करते हैं।इनमें से कई नियमों का उद्देश्य तो अच्छा होता है लेकिन उनके नतीजे विकृत होते हैं। दिल्ली में एक कानून है कि रिक्शा को चलानेवाले और उसका मालिक एक ही व्यक्ति होना चाहिए। रिक्शा किराए पर देना गैरकानूनी है। इस कानून का मकसद मालकियत को बढ़ावा देना और रिक्शाचालकों का उन लोगों के द्वारा शोषण को रोकना है  जो कई रिक्शा खरीदकर उनको किराए पर उठाते हैं। लेकिन उन आव्रजकों का क्या जिनके पास पर्याप्त पैसे नहीं होते और जिनके पास और कोई कौशल होता भी नहीं

वर्ष 1991 के बाद आर्थिक सुधारों पर किसी भी चर्चा में एक बात अक्सर कही जाती है –अमीर अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब । 1991 वह साल था जिसके बाद देश में अंदरूनी आर्थिक सुधारों के जरिये उदारीकरण की शुरूआत हुई तो दूसरी तरफ देश के बाजारों को बाहरी प्रतियोगिता के लिए खोला गया। बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि इस उदारीकरण और वैश्वीकरण का लाभ गरीबों को नहीं मिला।

आर्थिक स्वतंत्रता का असमान वितरण
इस आरोप को विश्व बैंक के इस आंकड़े के आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि भारत में 1994 में गरीबी की रेखा के नीचे रहनेवालों की संख्या 36

टीम अन्ना ने अनशन तोड़ते हुए घोषणा की कि अब वह राजनीतिक दल बनाएगी। यह एक लोकप्रिय जनांदोलन की असामयिक मौत है वहीं एक राजनीतिक दल के जन्म की शुरूआत।इन दोनों ही फैसलों पर मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई है। लेकिन एक बात तो है ही किसी आंदोलन का निराश और हताश होकर अपने को राजनीतिक दल में तब्दील होने के बारे में सोचना कोई शुभ संकेत नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि हमारी सरकारे बहरी हैं जो जनता की बाते सुनने को तैयार नहीं है।लेकिन अन्ना के आंदोलन के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता  क्योंकि उसे थोड़े समय के लिए ही सही जो अपार जनसमर्थन मिला उसने सरकार और राजनीतिक दलों को एक बार तो

मुझे फेविकोल का एक चर्चित विज्ञापन याद आता है जिसमें एक बस को दिखाया गया है कि कैसे बस के अंदर-बाहर और ऊपर तमाम लोग लदे हुए हैं। देश के अद्र्घशहरी तथा ग्रामीण इलाकों में यह दृश्य आम तौर पर देखा जा सकता है। विज्ञापन खत्म होता है और बस के पिछले हिस्से में फेविकोल का बोर्ड नजर आता है। हालांकि यह भारत में प्राय: नजर आने वाला एक विशिष्ट दृश्य है, वहीं यह भारतीयों के 'जुगाड़' के स्वभाव का भी परिचायक है। बस की बात करें तो उसमें जितनी सीट होती हैं, उससे कहीं अधिक लोगों को बस में बिठाया जा सकता है, इसके अलावा ढेर सारे लोग खड़े होकर और बस की छत पर बैठकर भी सफर कर सकते हैं बल्कि

असम के कई हिस्सों में आए सांप्रदायिक हिंसा में उबाल ने हमें यह सवाल पूछने को मजबूर कर दिया है –बांग्लादेशी आव्रजकों का  मुद्दा केवल भारत के लिए ही क्यों समस्या बन गया है ? इसका बिल्कुल तैयार जवाब यह है कि ज्यादातर आव्रजन अवैध है। बात सही भी है इसका गैर कानूनी होना इससे जुड़ी अर्थव्यवस्था  को भूमिगत कर देता है और इसे संगठित अपराधियों ,  भ्रष्ट नौकरशाहों और बेईमान नेताओं के हाथों में सौंप देता है जो इससे पैदा होनेवाले वोट बैंक का इस्तेमाल करते हैं।यह केंद्र और राज्य सरकारों को राजस्व के स्रोतों से वंचित कर देता है जो उसे मिलते यदि अर्थव्यवस्था कानूनी होती।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि पूंजीवाद में भ्रष्टाचार, ब्लैक मार्केटिंग है, रिश्वत है। इन सबके लिए आप क्या कहते हैं?

इस सबका कारण पूंजीवाद नहीं है। इस सबका कारण पूंजी का कम होना है। जहां पूंजी कम होगी वहां भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सकता। लोग होंगे बहुत,पूंजी होगी कम तो लोग सब तरह के रास्तें खोजेंगे पूंजी की मालकियत करने के । अगर दुनिया से भ्रष्टाचार मिटाना है तो भ्रष्टाचार मिटाने की फिक्र न करें। भ्रष्टाचार केवल बाइ प्रोडक्ट है उससे कोई लेना देना नहीं है। लेकिन सारे नेता भ्रष्टाचार मिटाने में लगे हैं। सारे साधु भ्रष्टाचार मिटाने में लगे हैं। वे

इस वर्ष मानसून बहुत कमजोर रहा जैसा 1965 में रहा था। लेकिन इस बार इसे थोड़ी बड़ी असुविधा से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा जबकि 1965 में यह दैत्याकार और भयावह आपदा थी। भारत पर अब सूखे का असर न पड़ना एक यशोगाथा है लेकिन  ऐसी जिसे आमतौर पर गलत समझा गया है।

छठे दशक में भारत अमेरिकी अनाज सहायता  पर बुरी तरह निर्भर था । यहां तक 1964 में जब मानसून बहुत अच्छा रहा तब भी भारत को 70लाख टन अनाज की सहायता लेनी पड़ी थी जो घरेलू उत्पादन के दस प्रतिशत से कहीं ज्यादा थी। उसके बाद भारत में दो साल 1965और 1966 में दो बार सूखा पड़ा और अनाज की पैदावार घटकर

आजादी के बाद के भारत की पहचान उसकी समाजवादी विचारधारा रही है लेकिन धीरे-धीरे वह बदला लेकिन 1991 के उदारवादी सुधारों को लागू करने के बाद भी वह मुक्त व्यापार और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिकूल है। कम्युनिस्ट पार्टी की दमनकारी नीति के कारण पश्चिमी उदारवाद चीन में जड़े नहीं जमा सका। इस तरह दोनों ही देशों की कोई खास विचारधारा नहीं है। लेकिन चीन भारत की तरह बेखबर नहीं है।चीन का एक स्पष्ट लक्ष्य है – आर्थिक वृद्धि और विकास और उसे हासिल करने के लिए एक  सुनिश्चित राह है ।यह बात अलग है कि उसने मुक्त बाजार के सिद्धांतों को समाजवादी विचारधारा की ओट में छुपा रखा है।

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