सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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अक्सर कहा जाता है कि हम भारतीयों में सेंस आफ ह्यूमर की भारी कमी है।हमारे सांसदों ने यह साबित कर दिया कि यह सही है। जहां तक राजनेताओं का सवाल है वे हमेशा ही कार्टूनिस्टों के निशाने पर रहे हैं आखिर क्यों न रहें? वे देश के भाग्यविधाता जो बन गए हैं और उन्होंने देश का जो हाल बनाया है उसके बारे में सभी जानते हैं। मगर इस देश में लोकतंत्र है और लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार मौलिक अधिकार के तौर पर मिला हुआ है इसलिए वे  व्यंग्यबाण चुपचाप झेलने को मजबूर थे। लेकिन पहला मौका मिलते ही उन्होंने कार्टूनिस्टों को निशाना बना डाला। उनके कार्टूनों को चुन-चुनकर पाठ्यपुस्तकों से निकाल

भारतीय जनगणना रपट 2011 के नवीनतम  आंकड़े जारी होने के बाद मुझसे पूछा गया कि क्यों भारत में इतने सारे मोबाइल है लेकिन पर्याप्त शौचालय नहीं हैं।हालांकि पचास प्रतिशत से ज्यादा लोगों  के पास मोबाइल हैं लेकिन इतने लोगों के यहां शौचालय नहीं हैं। मेरे देश की असाधारण कहानी  में ऐसे विरोधाभास ढ़ेर सारे हैं। विकास रिसकर नीचे की तरफ पहुंच रहा है। लेकिन सरकार ने जिन सेवाओं को मुहैया कराने का वायदा किया है वे तो अब भी नदारद हैं।

यह सही है कि पिछले 10 वर्षों में देश में भारी परिवर्तन आया है। नए उद्यमियों,,ऊर्जावान निजी क्षेत्र  और तेजी से

चमत्कार को सभी नमस्कार करते हैं । फिल्म उद्योग के इस चमत्कार की भी चर्चा भी हर जगह होती रहती है। लेकिन यह चमत्कार हुआ कैसे। कहना न होगा कि चमत्कार अचानक नहीं हुआ है इसकी कहानी लंबी है। कभी फिलमउद्योग में ऐसे निर्माताओं की भरमार थी व्यक्तिगत तौर पर फिल्में बनाते थे। इसके लिए उन्हें कहीं न कहीं से फायनेंस का जुगाड करना पड़ता था।कोई बैंक फिल्मों को फायनेंस नहीं करती थी।  कारण यह था कि कई वर्षो तक फिल्म उद्योग `कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त उद्योग ‘ नहीं था। 1951 के इंडस्ट्रीज एक्ट आफ इंडिया में सरकार द्वारा मान्यता  प्राप्त सभी उद्योगों की सूची थी और केवल वही

लड़कों अथवा पुरुषों में ऐसा क्या है जो हमें इतना अधिक आकर्षित करता है कि हम एक समाज के रूप में सामूहिक तौर पर कन्याओं को गर्भ में ही मिटा देने पर आमादा हो गए हैं। क्या लड़के वाकई इतने खास हैं या इतना अधिक अलग हैं कि उनके सामने लड़कियों की कोई गिनती नहीं। हमने जब यह पता लगाने के लिए अपने शोध कीशुरुआत की कि क्यों वे अपनी संतान के रूप में लड़की के बजाय लड़का चाहते हैं तो मुझे जितने भी कारण बताए गए उनमें से एक भी मेरे गले नहीं उतरा। उदाहरण के लिए किसी ने कहा कि यदि हमारे लड़की होगी तो हमें उसकीशादी के समय दहेज देना होगा, किसी की दलील थी कि एक लड़की अपने माता-पिता अथवा अन्य

पिछले दिनों बालीवुड के किंग खान या शाहरूख खान को न्यूयार्क हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया। तब एक एक एफएम रेडियो पर जोक चल रहा था। एंकर कह रहा था कि उनके सूत्रों ने खबर दी है कि शाहरूख खान को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि अमेरिकी अधिकारियों को पता चला था कि शाहरूख अपने सामान में अपनी रा-वन फिल्म की सीडी लेकर अमेरिका जा रहे थे। और अमेरिकी सरकार नहीं चाहती थी कि ऐसी बोर फिल्म अमेरिका तक पहुंचे। इस जोक के जरिये रा-वन के महाबोर होने पर कटाक्ष किया गया था। इन दिनों रा-वन की गणना सबसे बोर और सबसे फ्लाप फिल्म के रूप में हो रही है। लेकिन

मेरे एक मित्र ने पूछा है कि समाजवाद का अर्थ क्या है?

समाजवाद का अर्थ है राज्य पूंजीवाद- स्टेट कैपिटलिज्म । समाजवाद का अर्थ है संपत्ति व्यक्तियों के पास न हो संपत्ति की मालकियत राज्य के पास हो । लेकिन समाजवाद यह नहीं कहता कि वह राज्य पूंजीवाद है । वह कहता है कि वह पूंजीवाद का विरोधी है।यह बात झूठ है।समाजवाद पूंजीवाद का विरोधी नहीं है ।समाजवाद,जो पूंजी की सत्ता बहुत लोगों में वितरित है उसे राज्य में केंद्रीत कर देता है।

इसलिए समाजवाद का दूसरा अर्थ है गुलामी की व्यवस्था। समाजवाद का अर्थ है राज्य मालिक हो जाए और समाज के

पिछले कुछ समय में यूपीए सरकार की चालढाल देखने के बाद राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा था कि सरकार की निर्णय करने की क्षमता को लकवा मार गया है। कुछ अखबार तो यूपीए को यूनाइटेड पैरालाइजड एलाइंस भी कहने लगे हैं।लेकिन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने जब अमेरिका में एक कार्य़क्रम के दौरान कहा कि अब 2014 के बाद ही आर्थिक सुधार हो पाएंगे तो बवाल मच गया। इसका मतलब यही निकाला गया कि सरकार का प्रवक्ता खुद कह रहा है कि सरकार के बचे हुए कार्यकाल में कुछ नहीं होना है ,जो  होगा वह लोकसभा चुनावों के बाद नई सरकार के आने के बाद ही होगा। बवाल होने पर बसु ने ने

मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के जरिये छह से चौदह साल के हर बच्चे के लिए शिक्षा तक पहुंच का विस्तार करना,गुणवत्ता बढ़ाना और भागीदारी सुनिश्चित करना शिक्षा के अधिकार कानून का बहुत बड़ा वायदा है। इस कानून के तहत नियम बनाना राज्यों के हाथों में है और राज्य इस महान वायदे को पूरा करने के लिए नियम बना रहे हैं।

हम जब शिक्षा का अधिकार कानून की दूसरी वर्षगांठ मना रहे हैं तब 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से गोवा और कर्नाटक को छोड़कर शेष  33 राज्यों ने नियमों को अधिसूचित कर दिया है। हालांकि गंभीर आशंकाएं थी कि कानून के कुछ प्रावधान उस मकसद में

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