सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म नाशिक के निफड तालुके में 18 जनवरी, 1842 को हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय कोल्हापुर में बीता। 14 साल की अवस्था में उन्होंने बॉम्बे के एल्फिन्सटन कॉलेज से पढ़ाई प्रारंभ की। उन्होंने एक एंग्लो-मराठी पत्र ‘इन्दुप्रकाश’ का सम्पादन भी किया।

बाद में महादेव गोविन्द रानाडे का चयन प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के तौर पर हुआ। सन 1871 में उन्हें ‘बॉम्बे स्माल काजेज कोर्ट’ का चौथा न्यायाधीश, सन 1873 में पूना का प्रथम श्रेणी सह-न्यायाधीश, सन 1884 में पूना ‘स्माल काजेज

- हम अमीर सरकार वाले गरीब देश के निवासी है
- गरीबी उन्मूलन के लिए लाई जाने वाली सरकारी योजनाएं गैरकानूनी और काला धन बनाने का स्त्रोत होती हैं
- यदि समाजवाद के प्रति हमारी सनक बरकार रहती है तो देश का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा

16 जनवरी 1920 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) के पारसी परिवार में पैदा हुए पद्मविभूषण नानाभाई अर्देशिर पालखीवाला उर्फ नानी पालखीवाला उदारवादी विचारक, अर्थशास्त्री और उत्कृष्ट कानूनविद् थे। नानी पालखीवाला की आर्थिक समझ और विशेषज्ञता का अंदाजा इस बात से

लाइसेंस, परमिट और इंस्पेक्टर राज की बुरी तहर उलझी समस्याओं ने सेवा क्षेत्र के छोटे उद्यमों को परेशान करना जारी रखा है

भारत के दूसरे सबसे बड़े वाणिज्यिक शहर में व्यवसाय करना आसान नहीं है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी में मेरे सहयोगियों और मैं ने दिल्ली में व्यवसाय करने की सुगमता की वास्तविकता को जांचने के लिए गहरा गोता लगाया। हमने पाया कि दिल्ली में सुधार के अधिकांश दावे महज ऊपरी दिखावा हैं। हमारे अध्ययनों से पता चलता है कि पारंपरिक खुदरा सेवाओं के उद्यमों के मामले में

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल अगले चार महीने में पूरा करने जा रही है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि सरकार इन पांच वर्षों में क्या हासिल करने में सफल रही। सरकार ने कई क्षेत्रों में सुधार पेश किए हैं लेकिन देश भर में स्कूली शिक्षा प्रणालियों में एक बड़ा बदलाव लाने में विफल रही है।

देश को पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में और दूसरी 1986 में मिली। बाद में इसे 1992 में संशोधित किया गया। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में भारी बदलाव आया है। बदलावों को देखते हुए देश की शिक्षा नीति में आमूल चूल

सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या शरणार्थियों पर सुनवाई अगले साल जनवरी तक स्थगित कर दी है। जनवरी 2019 में इस पर आखिरी सुनवाई होगी। याचिका में भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने वापस न भेजने की मांग की है। केंद्र सरकार की दलील है कि ये मसला आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा है लिहाजा अदालत इसमें दखल न दे। वहीं देश में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने अपने कैंप में बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत भी याचिका में की है।

कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि बॉर्डर के

कुछ दिन पहले विश्व बैंक ने भारत और दुनिया में व्यवसाय करने की सुगमता से संबंधित अपनी वार्षिक सूची को जारी किया था। भारत ने रैंकिंग में 23 स्थान की छलांग लगाकर 2017 में 100 के मुकाबले इस वर्ष 77वां स्थान हासिल किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह हमारे आर्थिक स्वास्थ्य या हमारे कारोबारी माहौल की स्थिति के अंतिम शब्द से बहुत दूर है। इसके विपरीत सोचना गलत होगा। भारतीय सरकारी व्यवस्था एक जटिल जानवर के समान है। सरकारी मशीनरी, प्रक्रिया और नियमों के स्तर पर राज्यों में बहुत अधिक भिन्नताएं हैं। देश को यदि व्यापक

मोदी सरकारी द्वारा नई शिक्षा नीति के मसौदे को तैयार करने के लिए गठित के. कस्तूरीरंगन कमेटी को हाल ही में चौथा विस्तार प्रदान किया गया है। अब इस कमेटी के पास नई शिक्षा नीति से संबंधित फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 दिसंबर तक का समय होगा। इसके पूर्व कमेटी को तीसरा कार्य विस्तार 30 अक्टूबर तक के लिए प्रदान किया गया था। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने सरकार को ‘जीरो ड्रॉफ्ट’ सौंप दिया गया था, लेकिन सरकार की मंशा शायद इसे आम चुनावों तक टालने की ही प्रतीत होती है। खैर..

एक कहावत है कि देर आए, दुरूस्त आए ! शिक्षा नीति तैयार करने में सरकार

● स्कूल स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक मौजूदा कठोर नियमोँ को जितनी जल्दी हो सके आसान किया जाना चाहिए
● शिक्षा के क्षेत्र में नव प्रवेशियों के लिए सरकार को ‘स्कूल खोलने और चलाने की सुगमता’ रैंकिंग अभियान की शुरूआत करनी चाहिए और स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना चाहिए

नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में व्यवसाय शुरू करने हेतु सहूलियत देने के महत्व को समझा है और इस दिशा में उपाय भी किए हैं। विश्व बैंक की

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