सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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मुफ्त बिजली, अत्यधिक सब्सिडाइज्ड यूरिया और खुली खरीद के खतरनाक मिश्रण से पंजाब की प्राकृतिक संपदा समाप्त हो रही है।

वर्ष 1991 में भारत में हुए सुधारों के दौरान कृषि को इससे दरकिनार कर दिया गया। कृषि और खाद्य आधारित नीतियां ‘गरीबों के संरक्षण’ के नाम पर उपभोक्ता केंद्रीत ही बनीं रही। 

यदि मैं ये कहूं कि भारतीय कृषि में अगले 15 से 20 वर्षों के दौरान उत्पादन की वर्तमान क्षमता से दो गुने या तीन गुने तक की वृद्धि की क्षमता है तो अनेक लोग इसे हंसी में उड़ा देंगे। लेकिन सच्चाई यही है कि

सुधार की राह कभी भी आसान नहीं रही है। कड़े और संरचनात्मक सुधार के कारण चुनाव के दौरान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है किंतु आपदा सदैव अपने साथ परिवर्तन के अवसर लेकर आती है और महामारी ने भी केंद्र सरकार को सुधार का ऐसा ही अवसर प्रदान किया है।

उदाहरण के लिए, 1991 का उदारीकरण भी उस समय देय राशि के संबंध में उत्पन्न हुए भुगतान संकट की पृष्ठभूमि में पारित किया गया था। यह भारत के आधुनिकीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव बड़ा समर्थन खो बैठे।

हाल ही में आजादी.मी ने स्कूली शिक्षा से जुड़े विषय पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता और मंडेला पुरस्कार से सम्मानित दीपक मिश्रा से लखनऊ स्थित उनके आवास पर विस्तारपूर्वक बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश..

प्रश्नः उत्तर प्रदेश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को आप किस प्रकार देखते हैं?
उत्तरः
हमारे देश की और विशेषकर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी खामी है। यह असमान और दोहरी (प्रवृत्ति वाली) है। डा. लोहिया ने

पिछले साल मार्च की शुरुआत से देश भर में स्कूलों के संचालन में बहुत सारी समस्याएं आई हैं। चूंकि भारत में स्कूलों को उद्यम नहीं माना जाता, उन्हें कोरोना महामारी से हुए वित्तीय नुकसान से निपटने के लिए सरकार से कोई राहत या किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिली। लेकिन स्कूलों की फ़ीस भरने में अक्षम अभिभावकों ने राहत के लिए अदालतों में याचिकाएं दायर की। उच्च न्यायालयों ने अपने आदेश में स्कूलों को केवल ट्यूशन फ़ीस लेने और अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करने को कहा।

लेकिन शैक्षणिक वर्ष

नजरियाः प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों के लिए 75% आरक्षण के कानून का असर बाकी राज्यों पर भी पड़ेगा

भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। अपनी सहयोगी जननायक जनता पार्टी के दबाव में उसने प्राइवेट सेक्टर में हरियाणवियों के लिए प्राइवेट नौकरियों में 75% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। कानून 50 हजार रूपये प्रतिमाह से कम कमाने वालों पर लागू होगा। उद्योगों को डर है कि नया कानून हरियाणा को गैर-प्रतिस्पर्धी और व्यापार के लिए अनाकर्षक बना देगा। इससे स्थानीयों को नौकरी मिलने की

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार वाहनों को नष्ट करने के बाबत एक नीति लाने को लेकर काफी उत्सुक है, जिसके तहत पुराने वाहनों को नष्ट करना अनिवार्य किया जाएगा या फिर उन्हें स्वयं नष्ट करने वालों को कुछ सब्सिडी प्रदान की जाएगी। ऐसा करने का एक उद्देश्य नई कारों की मांग में वृद्धि कर ऑटो इंडस्ट्री को बढ़ावा देना है। वर्ष 2008 में आई मंदी के बाद यूएस और यूरोप में वाहनों को नष्ट करने के प्रति प्रोत्साहित करने के पीछे वास्तव में यही उद्देश्य था। दूसरा उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है, चूंकि पुराने वाहन आमतौर पर नए वाहनों की तुलना में अधिक प्रदूषण युक्त वायु

दिल्ली के बॉर्डर पर पिछले 100 दिनों से जारी किसान आंदोलन के बीच राजनैतिक दलों और राज्य सरकारों के बीच भी सियासी प्रतिस्पर्धा जारी है। यह प्रतिस्पर्धा स्वयं को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की है। किसानों (वोट) को अपने साथ लाने के लिए पहले पंजाब सरकार और उसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा संशोधित कृषि कानून लाए गए। इन कानूनों का उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के कारण किसानों के होने वाले ‘नुकसान’ को कम करना है। आज बात करते हैं राजस्थान सरकार द्वारा पारित तीन कृषि संशोधन विधेयकों की।

भारत में संघवाद के स्वरुप को लेकर अकसर बहस होती रहती है। संघवाद का मतलब एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है जहां केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट सीमांकन और बंटवारा किया गया है। जहां भारत में संघवाद की कुछ विशेषताएं हैं, इसमें कुछ एकात्मक गुण  भी हैं। भारत में संघवाद को लेकर हमेशा से ही बहस होती रही है। नवीनतम बहस हाल में कानून का रुप लेने वाले कृषि अधिनियमों से जुड़ी है।

देश की संसद ने हाल में तीन कृषि अधिनियम पारित किए। कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और

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