सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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दुनिया में कोरोना वायरस का तांडव लगातार जारी है। दुनिया में अबतक लगभग चार करोड़ लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं जबकि 11.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश भारत भी इस प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है। अब तक देश में 75 लाख लोग इस संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं और 1.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले 100 साल के इतिहास में इसे सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में देखा जा रहा है। कुल मौतों के हिसाब से भारत अमेरिका (2,24,282) और ब्राजील (1,53,690) के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। जबकि संक्रमित

विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी कि फॉरेन कॉंट्रिब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट में एक बार फिर संशोधन किया गया है। विगत दिनों संसद के दोनों सदनों से नए संशोधनों वाले फॉरेन कॉंट्रिब्यूशन (रेग्युलेशन) अमेंडमेंट बिल 2020 को पास करा लिया गया। सरकार का दावा है कि इससे विदेशी चंदा प्राप्त कर देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाली संस्थाओं और संगठनों पर अंकुश लग सकेगा और देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी। साथ ही साथ धर्म परिवर्तन जैसी गतिविधियों पर भी रोक लगाई जा सकेगी।

नये प्रावधानों के

  • मनचाहे क्रेता को फसल बेचने की आज़ादी मिली, मनचाहे बीज से फसल उगाने की आज़ादी कब 
  • जीएम बीजों के इस्तेमाल की अनुमति के लिये किसान लंबे समय से कर रहे हैं मांग
  • खेती को लाभदायक बनाने के लिये लागत में कमी आवश्यक, एचटीबीटी हो सकता है कारगर

पिछले दिनों काफी हो-हल्ले के बीच मोदी

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने के बाद से ही आरंभिक शिक्षा का माध्यम क्या हो इसे लेकर बहस का दौर फिर से शुरु हो गया है। बहस इस बात पर है कि छात्रों को प्राथमिक शिक्षा स्थानीय भाषा में प्रदान करना ठीक होगा या मातृभाषा में या फिर हिंदी में!
 
थोड़ा फ्लैश बैक में चलते हैं। अभी उस जमाने को बीते तीन दशक भी नहीं हुए हैं जब देश में सर्वाधिक सुसंस्कृत व उच्च शिक्षित लोग अंग्रेजी बोला करते थे। यदि आप उन लोगों में से रहे हों तो पता होगा कि वह कितना अद्‌भुत दौर था। मेरे मरहूम दादाजी बताते थे कि कैसे उस समय सिर्फ अंग्रेजी बोलने भर से आप

रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

इस बहस की ताजा वजह

आमतौर पर यह माना जाता है कि गरीबी दूर करने का सीधा और सरल तरीका यह है कि वंचित लोगों को वह सब उपलब्ध करा दिया जाए जो उनके पास नहीं है। गरीबी दूर करने का यह दर्शन काफी पुराना है और हम सब के दिलो दिमाग में पूरी तरह से रचा बसा है। धर्मार्थ कार्य में विश्वास करने वाले जहां दरिद्र नारायण की सेवा कर अपने को उप कृत समझते हैं वहीं जन कल्याण के लिए कार्य करने वाले (फिलॉंथ्रोपिस्ट्स) गरीबों को वह सब दे देने में विश्वास करते हैं जिन्हें वे स्वयं हासिल नहीं कर सकते। जबकि समाजवादी सरकारों का ज्यादा जोर रॉबिनहुड वाले तरीके यानी कि गरीबी मिटाने के लिए

गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

अपने युवावस्था के दिनों में मैं इस खिसिया देने वाले लेकिन निष्ठुर कानून से अनजान था। उन दिनों तो मैं गरीबी को हल करने के तुरत-फुरत सलोने उपायों के सपने बुन लिया करता

पिछले दिनों बहु प्रतिक्षित और बहु चर्चित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। देश की शिक्षा को लेकर नीति क्या हो, आखिरी बार यह 1986 में तय किया गया था। हालांकि 1992 में इसमें छिटपुट संशोधन किया गया था। वर्ष 2014 की चुनावी रैलियों में तब के बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा नीति में बदलाव की ज़रूरतों को मुद्दा बनाया था। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा लागू किये गए शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों की प्रधानमंत्री ने चुनावी रैलियों के दौरान मुखर

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