सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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नीति आयोग द्वारा तैयार किया गया स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स इन दिनों राष्ट्रव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस इंडेक्स में अप्रत्याशित जैसा कुछ भी नहीं है। यह इंडेक्स पूर्व में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर हुए शोधों और उनके आंकड़ों की एक प्रकार से पुष्टि भर ही करता है। वैसे यह इंडेक्स शिक्षा का अधिकार कानून के उन प्रावधानों की भी कलई खोलता है जो स्कूलों को लर्निंग आऊटकम की बजाए बिल्डिंग और प्ले ग्राउंड के आधार पर मान्यता प्रदान करता है। जबकि दुनियाभर के शोध लर्निंग आऊटकम और क्लासरूम के साइज़ के बीच किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार

इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) के मुताबिक भारत 109 देशों की सूची में 103वें स्थान पर है और 20 करोड़ अन्न के अभाव का शिकार हैं। यह बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप इस भूख और भुखमरी का प्रमुख कारण है। मेरा मानना है कि सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप से जो विकृतियां या असंतुलन पैदा होते हैं वे व्यापक समूह को प्रभावित करते हैं। इस विकृति या दुष्प्रभाव से निबटने के लिए सरकार नए हस्तक्षेप लागू करती है। इससे अंतहीन सरकारी हस्तक्षेपों का सिलसिला शुरू होता है जो आर्थिक विकास

प्रमुख भारतीय उदारवादी चिंतक हृदयनाथ कुंजरु का जन्म 1 अक्टूबर 1887 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित अयोध्या नाथ कुंजरु और माता का नाम जनकेश्वरी था। वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और चार दशकों तक संसद और विभिन्न परिषदों को अपनी सेवाएं दी। वर्ष 1946 से 1950 तक वह उस कांस्टिटुएंट असेम्बली ऑप इंडिया के सदस्य भी रहे जिसने भारत का संविधान तैयार किया था। वह देश दुनिया की घटनाओं पर पैनी नजर और रूचि रखते थे। उन्होंने इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स और इंडियन स्कूल्स ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज

चीन के सबसे अमीर व्यक्ति जैक मा ने कुछ समय पहले विश्व आर्थिक मंच पर कहा था कि आर्थिक तरक्की जारी रखने के लिए हमें अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देने होगी कि वे मशीनों से मुकाबला कर सकें। उनके मुताबिक शिक्षा में सुधार इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। शिक्षा में सुधार को लेकर भारत को इसलिए भी अधिक सक्रियता दिखाने की जरूरत है, क्योंकि उसके जरिये ही आर्थिक रुप से सशक्त हुआ जा सकता है। एक अर्से सेस यह दिख रहा है कि सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों के वेतन में अंतर के बावजूद सरकारी विद्यालयों के परिणाम कमतर हैं। इस वर्ष उत्तर प्रदेश

615 मिलियन लोगों के द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली ‘हिंदी’ विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। अंग्रेजी और मैंडरिन का स्थान क्रमशः पहला और दूसरा है। दुनिया भर में एक ओर जहां तमाम भाषाएं विलुप्त हो रही हैं और उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अनेक कदम उठाने की जरूरत पड़ रही है वहीं हिंदी का प्रसार दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा से ही नहीं था। आजादी के पहले व बाद में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर प्रयास किए जाते रहे। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा हाल ही में समस्याओं से घिरा रहा। स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के पूर्व सचिव, अनिल स्वरूप, जिन्होंने शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली समिति को इनपुट प्रदान किए थे, ने इससे जुड़ी कुछ बड़ी समस्याओं के बारे में प्रज्ञानंद दास से बातचीत की:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रस्तुत मसौदे को लेकर आपकी क्या राय है?

सबसे पहले तो हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह कोई नई शिक्षा

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कानून के तहत इसका पालन न करने वाले कॉर्पोरेट्स के लिए जेल के प्रावधान पर पुर्नविचार करने के बयान के बमुश्किल एक सप्ताह के भीतर ही एक उच्च स्तरीय कमेटी ने इसे दीवानी अपराध (सिविल ऑफेंस) बनाने और प्रावधान को अर्थदंड तक सीमित रखने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। पूर्व में इसके लिए तीन वर्ष तक के जेल की सजा का प्रावधान था। इस सुझाव के आते ही कुछ प्रबुद्ध वर्गों के बीच तीखी आलोचना का दौर शुरू हो गया जो इसे जरूरी मानते हैं। उनके बहस का असर कुछ कॉरपोरेट कंपनियों के उच्च अधिकारियों पर

भारत की जीवन शैली का स्ट्रीट वेंडर्स (फेरी वाले) अभिन्न अंग हैं। नीले आसमां के नीचे खुली हवा में इन स्ट्रीट वेंडरों की जीविका सब्जी, फल, दूध, कपड़े व अन्य जरूरत का सामान बेच कर चलती है।
दिनेश कुमार दीक्षित भी एक ऐसे स्ट्रीट वेंडर हैं जिनकी गणना सामान्य भाषा में प्रचलित शब्द ‘रेहड़ी पटरी वालों’ में होती है। दिनेश कुमार दीक्षित जी ने अपने बहुमूल्य जीवन के 41 वर्ष दिल्ली की सड़कों पर कांच की चूड़ियां बेच कर जीवन निर्वाह करने में लगा दिया। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में जन्में-पले दीक्षित ने अपने व्यवसाय का साधन चुना और आज उन्हें अपने

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