खेल में छल कपट

 

भद्रजनों का खेल माने जाने वाले क्रिकेट के दामन पर एक और दाग लग गया है। दिल्ली पुलिस ने स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों समेत करीब एक दर्जन सट्टेबाजों को गिरफ्तार किया और इसके साथ ही इंडियन प्रीमियर लीग के पूरी तरह साफ-सुथरे होने का दावे पर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है जब क्रिकेट में खिलाड़ियों के मैच फिक्सिंग अथवा स्पॉट फिक्सिंग में लिप्त होने का मामला सामने आया हो। 1999-2000 में जब पहली बार दिल्ली पुलिस ने ही दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई श्रृंखला के फिक्स होने का दावा किया था और इसमें खिलाड़ियों की संलिप्तता के सुबूत पेश किए थे तभी यह स्पष्ट हो गया था कि इस खेल में लालच हद से अधिक बढ़ चुका है। तब केवल दक्षिणी अफ्रीकी क्त्रिकेटर हैंसी क्त्रोनिए और हर्शल गिब्स ही बदनाम नहीं हुए थे, बल्कि भारतीय क्त्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की जांच-पड़ताल में मोहम्मद अजहरुद्दीन, अजय शर्मा, अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर जैसे खिलाड़ियों को मैच फिक्सिंग में लिप्त होने के कारण दंडित भी किया गया था। इसके बाद बोर्ड के स्तर पर खिलाड़ियों के साथ अनुबंध के प्रावधान कड़े किए गए और उन्हें साफ हिदायत दी गई कि वे इस तरह की गतिविधियों में लिप्त न हों, लेकिन ताजा मामला यही सिद्ध करता है कि कुछ खिलाड़ियों पर इस हिदायत का कहीं कोई असर नहीं हुआ।

सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि कुछ खिलाड़ियों में अवैध तरीके से ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने का लालच इसके बावजूद घर कर गया है कि उन्हें इस खेल से अच्छा-खासा धन मिल रहा है। एक समय था जब क्त्रिकेटरों की यह शिकायत रहती थी कि उन्हें इस खेल से इतना धन नहीं मिलता कि वे सही तरह अपनी रोजी-रोटी चला सकें। विशेषकर इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया सरीखे देशों के क्रिकेटरों की तुलना में भारतीय खिलाड़ियों को बहुत कम पैसा मिलता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। इस समय अपने देश में क्त्रिकेट में इतना धन आ चुका है कि दूसरे खेल वाले उससे ईष्र्या करने लगे हैं। आइपीएल में भाग लेने वाले तो लगभग सभी खिलाड़ी करोड़पति बन जाते हैं। अगर कुछ खिलाड़ियों ने सट्टेबाजों के साथ मिलकर और अधिक पैसा बनाना चाहा तो इसे सिर्फ उनकी लालची प्रवृत्तिही कहा जा सकता है। चूंकि खिलाड़ी सट्टेबाजों के लालच में फंस रहे हैं इसलिए तमाम प्रयासों के बावजूद इस खेल में सट्टे के कारोबार पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। सट्टेबाजी का यह कारोबार कई सालों से चल रहा है, लेकिन न तो बीसीसीआइ उस पर अंकुश लगा सकी और न ही भारत सरकार। एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष दस हजार करोड़ रुपये से अधिक का सट्टा केवल क्त्रिकेट मैचों के जरिये ही खेला जाता है। अब तो लगभग प्रत्येक बड़े शहर में सट्टेबाजों ने अपना जाल फैला रखा है।

दिल्ली पुलिस के खुलासे से यह पता चल रहा है कि सट्टेबाजी का यह चौंका देने वाला कारोबार दुबई में बैठे अंडरव‌र्ल्ड माफिया द्वारा संचालित होता है। स्पष्ट है कि अब मैच फिक्सिंग अथवा स्पॉट फिक्सिंग महज सट्ेबाजी ही नहीं रह गई है, बल्कि यह एक संगठित अपराध का रूप ले चुकी है। कई वषरें पहले शारजाह में होने वाले मैचों को फिक्सिंग के खेल के रूप में देखा जाता था। इसी कारण भारत सरकार ने शारजाह में होने वाले मैचों में शामिल होने के लिए भारतीय टीम को अनुमति देना बंद कर दिया। बाद में जब चकाचौंध से भरी इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुआत हुई तब भी यह संदेह व्यक्त किया गया कि यह प्रतियोगिता आसानी से सट्टेबाजों का निशाना बन सकती है, लेकिन आइपीएल में खेल का जैसा स्तर देखने को मिला उससे यह नहीं कहा जा सकता कि हर मैचों में स्पॉट फिक्सिंग हो रही है। इसी के साथ यह भी सही है कि कोई पूरे दावे के साथ यह भी नहीं कह सकता कि आइपीएल मैच स्पॉट फिक्सिंग से पूरी तरह मुक्त हैं। स्पॉट फिक्सिंग का ताजा मामला सामने आने के बाद तो ऐसे किसी दावे का कोई मतलब भी नहीं रह जाता। इसके अतिरिक्त खुद दिल्ली पुलिस अभी यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि स्पॉट फिक्सिंग में अन्य टीमों अथवा खिलाड़ियों की संलिप्तता नहीं है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस ऐसे सुबूत जुटा पाएगी जो अदालत में खिलाड़ियों को बेईमान साबित कर सकें? यद्यपि भारत में सट्टेबाजी प्रतिबंधित है, लेकिन देखना यह है कि अदालत ऐसे खिलाड़ियों के प्रति क्या रुख अपनाती है जिन्होंने सट्टेबाजों के कहे अनुसार अपने खेल को प्रभावित कर एक अरब से अधिक लोगों के साथ छल किया? यह तो वक्त ही बताएगा कि जो तीन खिलाड़ी स्पॉट फिक्सिंग में लिप्त पाए गए हैं वे कोई कठोर सजा पा पाते हैं या नहीं, लेकिन इन तीनों ने क्रिकेट को तो बदनामी के दलदल में डुबो ही दिया है। बहुत से देशों में सट्टेबाजी को वैधता हासिल है, लेकिन अपने यहां इसे कानूनन ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी अपराध माना जाता है। भारत में घुड़दौड़ में सट्टेबाजी होती है, लेकिन यह एक छोटे से वर्ग तक ही सीमित है। पिछले कुछ समय से यह सुझाव रह-रह कर सामने आता रहा है कि क्यों न नियम-कानून बनाकर सट्टेबाजी को वैधता प्रदान कर दी जाए? नि:संदेह इससे राजस्व अर्जित करने का एक नया मार्ग तो खुल जाएगा, लेकिन एक तरह से जुएं को वैधता मिल जाएगी। ऐसा होने पर कुछ नए सवाल उठेंगे, क्योंकि भारतीय समाज में जुएं को एक बुराई के रूप में देखता है। तथ्य यह भी है कि भारतीय इतिहास में महाभारत काल से आनंद और मनोरंजन के लिए जुआं खेलने के दृष्टांत मौजूद हैं। इसके अलावा कुछ त्योहारों पर भी जुएं का चलन है।

चूंकि एक बुराई होते हुए भी जुएं अथवा सट्टेबाजी पर पूरी तौर पर रोक लगाना संभव नहीं इसलिए उसके नियमन पर विचार किया जा सकता है। ध्यान रहे कि शराब, सिगरेट सेवन सरीखी बुराइयों को सिर्फ कानून के सहारे पूरी तरह मिटा पाना संभव नहीं है। क्या यह विचित्र नहीं कि क्त्रिकेट और कुछ दूसरे खेलों में सट्टेबाजी का चलन हद से अधिक बढ़ जाने के बावजूद भारतीय कानून की किसी भी धारा में मैच फिक्सिंग अपराध नहीं है? उचित यह होगा कि भारत सरकार सट्टेबाजी को नियंत्रित करने के कुछ ठोस उपाय करे। ऐसा करते समय यह ध्यान रखा जाए कि खेलों को लेकर तो सट्टेबाजी हो, लेकिन उसमें खिलाड़ियों की कहीं कोई भूमिका न हो। खिलाड़ियों की परोक्ष-प्रत्यक्ष भूमिका वाली सट्टेबाजी तो एक अपराध के अलावा और कुछ नहीं। यह एक ऐसा अपराध है जो खेल के साथ-साथ खेल प्रेमियों की भावनाओं से भी खिलवाड़ है। इस अपराध पर हर हाल में अंकुश लगाना होगा, अन्यथा यह खेल अपना आकर्षण खो देगा।

 

[लेखक संजय गुप्त, दैनिक जागरण के संपादक है]

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