मारुति 800 वाला

तकरीबन 20 साल पहले जब मैं ग्यारहवीं या बारहवीं का छात्र था, मैंने शोलपुर में होने जा रही स्कूली बच्चों की राज्यस्तरीय शतरंज स्पर्धा के लिए पात्रता हासिल कर ली। मैं पुणे की टीम का हिस्सा था और इस स्कूल चैंपियनशिप में भारत के तकरीबन हर इलाके के स्कूली छात्र भाग लेते थे। हालांकि वह स्कूली चेस का पहला ही साल था। जब हमारी चार सदस्यीय टीम स्पर्धा से एक दिन पहले ही पहुंच गई, तो हमें एक बड़े हॉल में ले जाया गया। हमें बताया गया कि रात को हमें यहीं पर सोना है। वहां पहुंचे अन्य एथलीट और खिलाड़ी भी इसी हॉल में हमारे साथ सोने वाले थे। सामान्य परिस्थितियों में उस हॉल में 60 लोग आ सकते थे। जबकि यहां तो मामला 100 से ज्यादा लोगों का था। कोई बिस्तर मुहैया नहीं कराया गया था, फर्श गीला था (कहीं की लीकेज के कारण) और नींद आना आसान नहीं था। अगली सुबह हमें पता चला कि हमारे लिए जो टॉयलेट की सुविधा की गई थी, वह बिल्डिंग के बाहर ही एक छोटे से शेड में कर दी गई थी। इसमें तीन-चार खाने बना दिए गए थे। अंत में वही हुआ जो होना था, पहले टॉयलेट जाने के लिए खूब लड़ाईयां हुईं। वहां तो जूडोका, पहलवान, भारोत्तोलक, शॉटपुटर सब थे। आप समझ गए होंगे कि ऐसे में हम शतरंज खिलाड़ियों को तो सब्र से ही काम लेना सीखना पड़ा।

स्पर्धा में तीसरे स्थान पर रहकर मैंने राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए पात्रता हासिल कर ली। बुरी किस्मत ही कहिए कि इसका कार्यक्रम ठीक मेरी परीक्षा से मेल खा गया। ऐसा प्रतियोगिता में खेलने की पात्रता पाने वाले कई स्कूली बच्चों के साथ हुआ होगा। मैं नहीं गया।

राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा नियमित तौर पर आयु वर्ग के हिसाब से आयोजित स्पर्धाएं भी कुछ खास बेहतर नहीं थीं। मैंने राष्ट्रीय जूनियर प्रतियोगिता (अंडर-20) में एक बार महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया, 1992 या 1993 में। वह प्रतियोगिता गर्मियों के सीजन के चरम के दिनों में विजयवाड़ा में आयोजित की गई थी। एक स्थानीय दोस्त ने मुझे बताया, ‘वहां इतनी ज्यादा गर्मी होती है कि गायें गर्मी से ही मर जाती हैं।’ बिजली जो आती-जाती रहती थी, प्रतियोगिता के एक दिन पहले चली गई। मेरा मुकाबला ऐसे खिलाड़ी से था, जिस का मैं शतरंज के सैद्धांतिक ज्ञान के कारण काफी सम्मान करता था। हालांकि मुझे लगता था कि एक बार सैद्धांतिक ज्ञान की बात छोड़ दी जाए तो शतरंज खेलने में मैं उससे बेहतर था। उसे उसकी शुरुआती चालों के भंडार से परे करते हुए मैंने पहली चाल खेली 1.बी4-ओरुंगटान ओपनिंग। वह हमारे बाजी खेलने के टेबल पर काफी देर से आया और उसने मेरी चाल देखते ही जोर का ठहाका लगाया। मेरे चेहरे पर पसीना आ गया और सिर ठनकने लगा। मैं वह बाजी हार गया और अपनी उम्मीद के लिहाज से प्रतियोगिता में काफी नीचे के स्थान पर रहा। मैंने 19 वर्ष की उम्र में शतरंज से संन्यास ले लिया। मैं शतरंज को विदा करने के फैसले के लिए बाहरी तत्वों को जिम्मेदार नहीं मानता। मुझे इस बात का अहसास हो गया था कि मैं इस खेल को ऊंचे स्तर पर खेलने की काबिलियत नहीं रखता। और मैं बस हमेशा सुनहरी यादों को संजो रखूंगा, उस दिन को भी जब मैंने एक भविष्य के ग्रैंडमास्टर (मैं 18 साल का था और वह 15 का, लेकिन उसकी विलक्षण प्रतिभा के सभी कायल थे, मुझे आज भी याद है कि अपने हाथी की बलि देने के बाद मैंने उसे केवल चार और चालों में मात दे दी थी) को हराया था। मैंने कॉलेज के दिनों में भी लोगों को शतरंज की चालें बताकर भी खूब जेबखर्च बटोरा था। मैं यह सब बातें इसलिए बता रहा हूं ताकि बता सकूं कि केवल क्रिकेट ही नहीं दूसरे खेलों में भी बेहतर स्थान हासिल करना कितना मुश्किल था। इनमें से अधिकांश खेल सरकार के मार्गदर्शन में चलते हैं और मैं उन अक्षमताओं की ओर ध्यान नहीं दिलाना चाहता जो इसके कारण उपजती हैं। न उन दिक्कतों का जिक्र करना चाहता हूं जो युवा खिलाड़ियों को नौकरशाही के चलते झेलना पड़ती हैं। आप हमेशा यह महसूस करते हैं कि आपकी लड़ाई तंत्र के साथ है और आपने जो हासिल किया वह इसके रहते हासिल किया है। मैं इस पर ज्यादा खुलासा नहीं कर सकता। इस लानत भरे तंत्र में अस्तित्व के लिए, अपने पसंदीदा खेल को खेलते रहने के लिए आपको बहुत ही मोटी खाल वाला होना चाहिए।

इन सबसे उबरते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी पानाः एक बहुत ही अलग मामला है। ऐसा कर पाने वाले लोगों के लिए-सम्मान।

शतरंज खिलाड़ियों के लिए यह एक अन्य कारण से मुश्किल था। उन दिनों में, जब इंटरनेट नहीं था, चेस की दुनिया में ताजातरीन ज्ञान हासिल कर पाना मुश्किल हुआ करता था। शतरंज की किताबें आधारभूत जानकारी से ज्यादा स्तर की नहीं होती थीं और भले ही वह पुरानी हों उनको संभालकर रखा जाता था। और जबकि लगभग सभी स्थानीय शतरंज खिलाड़ी इन्हीं कमियों का सामना करते थे, जब भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शतरंज खेलने लगे तो जानकारी और प्रशिक्षण के लिहाज से वह बहुत ज्यादा पिछड़े हुए थे।

मेरे एक दोस्त देवांगशु दत्ता ने 1980 के दशक में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शतरंज खेली। एक बार ईमेल से संवाद के दौरान, उसकी इजाजत से मैं यह उजागर कर रहा हूं, उसने लिखा, भारतीय खिलाड़ियों के लिए बाधाएं "पहाड़ जैसी थीं" और "दो टूक कहा जाए तो, जब मैंने पूर्वी यूरोप के खिलाड़ियों के खिलाफ शतरंज खेलना शुरू किया, तो अंतर बहुत ज्यादा साफ दिखाई देता था। हम इतना कम जानते थे और यह कोई मजाक नहीं था। अगर किसी बात से तुलना ही करना हो तो कहा जा सकता था कि यह ऐसा था जैसे किसी बच्चे को जिसने खुद के बलबूते पर थोड़ी-बहुत आधारभूत जानकारी हासिल करके हायर सेकंडरी स्तर का गणित किया हो, उसे सीधे गणित के स्नातकोत्तर छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा में उतार दिया जाए।"

"हम शुरुआत को लेकर संघर्ष करते थे, मध्य बाजी में कुछ खेल लेते थे और फिर नहीं जानते थे कि करना क्या है। मैच के बाद इसके विश्लेषण के दौरान हमारा प्रतिस्पर्धी कहता था कि हमारे प्रशिक्षक ने हमें ऐसी परिस्थिति में इस तरह से खेलना सिखाया था। और आप सोचेंगे हाय रे फूटी किस्मत।" यही वह समय था जब विश्वनाथन आनंद ने भी अपनी प्रतिभा की झलक देना शुरू कर दिया था और खुद को विश्वस्तर के खिलाड़ियों में शामिल करके उसने महान गैरी कास्परोव तक को चुनौती दे डाली थी। इसी सप्ताह उन्होंने वेसलीन तोपालोव के खिलाफ अपने विश्व खिताब की बखूबी रक्षा की है।

उनकी उपलब्धियां जिनका मैं संक्षेप में जिक्र करना चाहूंगा किसी रूसी या पूर्व यूरोपीय शतरंज खिलाड़ी से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। उसे अद्भुत से भी ऊपर की श्रेणी में रखा जा सकता है। जिस पृष्ठभूमि से वो आए उसे देखकर तो यही कहने को मन करता है कि मारुति 800 में सवार इस शख्स ने फार्मूला वन कार रेस में भाग लेकर कामयाबी हासिल की है। वह व्यक्ति निश्चित तौर पर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ड्राइवर है।

1972 में बॉबी फिशर द्वारा बोरिस स्पास्की को हराए जाने के बाद अमेरिका में शतरंज की लोकप्रियता में एकाएक तेजी देखने को मिली। मैं यह सोचकर आशंकित हूं कि क्या आनंद की कामयाबी की भारत में ऐसी प्रतिक्रिया होगी। तोपालोव के खिलाफ उनके मैच का सीधा प्रसारण ट्विटर पर फॉलो किया जा रहा था और कुछ ने तो ट्विटर पर ही सीधी कमेंटरी भी शुरू कर दी थी। एक शतरंज खिलाड़ी के लिहाज से कुछ बाजियों, खासतौर पर अंतिम में, उनके खेल की सटीकता आकर्षक थी। शतरंज न खेलने वालों के लिए भी मुकाबले में मौजूद नाटकीयता आकर्षित करने वाली थी। मैं जबकि यह शब्द लिख रहा हूं, उनकी जीत के अगले दिन अखबार और टीवी चैनल उनकी ही तारीफ में डूबे हैं। शतरंज, चमत्कारिक रुप से भारत में भी दर्शक खींचने वाला खेल बनने की संभावना दिख रही है।

और भारत में युवा शतरंज खिलाड़ी बनने के लिए इससे बेहतर समय क्या होगा। जैसा कि देवांगशु ने मुझे बताया, "1993 तक भारतीयों को पिछली तिमाही की सबसे अच्छी एक हजार बाजियों (विशेषज्ञों की टिप्पणियों सहित) को समेटने वाली पत्रिका इंफोर्मेंट का बेलग्रेड में उसके वितरण के भी चार से छह सप्ताह बाद तक का इंतजार करना पड़ता था। यूरोपीय शतरंज खिलाड़ियों को तो यह पहले ही दिन मिल जाती थी। आज तो बाजी होते ही उसकी जानकारी आपको मिल जाती है। अब तो हमें विशेषज्ञों की टिप्पणियों के साथ ही बाजी का विश्लेषण मिल जाता है और मैं भी आनंद जितने ही वक्त में किसी बाजी के बारे में जान सकता हूं। आपको इंटरनेट पर मुफ्त के शतरंज इंजिन मिल जाएंगे जो कई मायनों में विश्व चैंपियन जितने सशक्त होते हैं। साथ ही सभी जानकारी डिजिटल है और समीक्षाएं अवर्णनीय हैं।" यह कहने की भी कोई जरूरत नहीं है कि शतरंज में उपकरणों पर निवेश काफी कम होता है, किसी भी अन्य खेल की तुलना में। (शुरुआत में आपको एक शतरंज लगता है, फिर एक घड़ी और फिर एक इंटरनेट कनेक्शन)। आप अब सरकार पर निर्भर नहीं हैं। आपको वो सारे संसाधन उपलब्ध हैं जो आप चाहते हैं। और अगर आपने आनंद को इस सप्ताह काम करते देखा हो तो आपको प्रेरणा भी मिल चुकी है। यही वजह है कि मैं उम्मीद करता हूं कि भारत आने वाले सालों में शतरंज के खिलाड़ियों की एक लहर सी पैदा करेगा। कौन जानता है, उनमें से कोई और भी विश्व चैंपियन बन जाए। लेकिन आनंद की उपलब्धि तो फिर भी बड़ी ही बनी रहेगी।

- अमित वर्मा