विकास के आंकड़े बताते हैं माओवादी महिमामंडन की सच्चाई

माओवादी उभार के विषय पर लिखी गई एक पुस्तक ‘हैलो बस्तर‘ के लोकार्पण के अवसर पर पुस्तक के लेखक राहुल पंडिता ने छोटे मोटे अधिकारियों और वन ठेकेदारों द्वारा जनजातियों के भारी शोषण पर रोशनी डाली। उन्होंने माओवादी विरोधी निगरानी बल सलवा जुडूम की निंदा की और कहा कि आदिवासियों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वे माओवादियों के साथ मिलकर बंदूकें उठाएं और अपने हक के लिए लड़ें।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस अवसर पर कहा कि मुख्य समस्या सामाजिक और प्रशासनिक है। जैसे-जैसे हम बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर से दूर जाते हैं सरकार की उपस्थिति घटती जाती है। सरकार ना सिर्फ कठोर है बल्कि कई क्षेत्रों में अनुपस्थित भी है और माओवादियों ने उन क्षेत्रों में, जहां सरकार अनुपस्थित थी, वहां जाकर लोगों को सेवाएं प्रदान की और उनके हक दिलाये जो राज्य उन्हें नहीं दिला पाया था।

इन बातों से माओवादियों के उभार के बारे में क्या पता चलता है? माओवादियों को रॉबिनहुड की तरह चित्रित किया जा रहा है, जो एक दमनकारी राज्य से लड़ रहा है। हांलांकि यह महत्वपूर्ण सच्चाई की ओर इशारा करता है, फिर भी इस सच्चाई में कई खामियां हैं और उन पर गहरी चुप्पी छाई हुई है। ये इस प्रकार हैं: चुप्पी का पहला क्षेत्र: माओवाद प्रभावित क्षेत्रो में 2008 में हुए राज्य सरकार के चुनाव और 2009 के आम चुनाव में सत्ताधारी भाजपा के पक्ष में भारी मतदान हुआ। यदि सचमुच सरकार और सलवा जुडूम इतने बुरे हैं तो क्यूं माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में लोगो ने सरकार के लिए मतदान किये?

कुछ कार्यकर्ताओं ने यह दावा किया है कि भाजपा ने मतदान में धांधली की है। पर ये मानना सही नहीं होगा। भाजपा ने ये चुनाव असहाय आदिवासियों के खिलाफ नहीं, बल्कि कांग्रेस के खिलाफ जीता है, जिसके नवीन चावला जैसे शक्तिशाली मित्र चुनाव आयोग में थे। यह मानना भी बेवकूफी होगी कि कांग्रेस ने चुपचाप भाजपा को ये चुनाव जीतने दिया। चुप्पी का दूसरा क्षेत्र: आर्थिक विकास। छत्तीसगढ़ को आमतौर पर सामाजिक और आर्थिक विकास के नजरिये से पिछड़ा राज्य कहा जाता है (खनन को छोड़कर, जो आदिवासियों को उसकी जमीन से बेदखल कर देता है और उनकी नदियों को प्रदूषित कर देता है)। हालांकि हाल के आंकड़े इससे उलटी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।

राज्य की वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद विकास दर 2000 से 2004 के बीच 6.1 फीसदी रही जबकि 2004 से 2009 में 9.7 फीसदी की चौंकाने वाली दर रही। यह विकास दर सिर्फ खनन के बल पर हासिल नहीं हुई थी, बल्कि स्टील, एल्युमीनियम, बिजली और अन्य उद्योग भी तेजी से विकास कर रहे थे। इंडिकस एनालिटिकस के अनुसार हाल के वर्षो में छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड़ और सभी आदिवासी राज्यों में औद्योगिक विकास दर सलाना 15 फीसदी रही। रायपूर भारत का दसवां सर्वाधिक औद्योगीकृत जिला बन चुका है। आलोचक इन आंकड़ों से बगैर प्रभावित हुए कहते हैं कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले आदीवासी राज्य में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अर्थशास्त्री शंकर आचार्य ने हाल ही में दिखाया है कि छत्तीसगढ़ देश का दूसरा सर्वाधिक कृषि विकास वाला राज्य बन गया है। 2000-01 और 2008-09 के बीच इस राज्य की कृषि विकास दर सलाना 9.1 फीसदी रही, जो कि देश की औसत कृषि विकास दर से तीन गुणा अधिक है। यही नहीं तेज औद्योगिकीकरण के कारण कृषि की जीडीपी में हिस्सेदारी सिर्फ 17 फीसदी रह गई है और झारखंड में यह सिर्फ 8.6 फीसदी रह गई है।

छत्तीसगढ़ में साक्षरता दर 71 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत 74 फीसदी से थोड़ी ही कम है, लेकिन आंध्रप्रदेश की 66.8 फीसदी से अधिक है। सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज ने भले ही छत्तीसगढ़ के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना की है, इसके बावजूद वह राज्य में बाल स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पंचायती राज संस्थाओं की उपलब्धियों को स्वीकार करते हैं।

चुप्पी का तीसरा क्षेत्रः माओवादियों ने झारखंड में नरेगा के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी, दूसरे को भागने के लिए मजबूर कर दिया और नरेगा के मुख्य कार्यकर्ताओं को डराने के लिए धमकी भरे पोस्टर लगाए। साधारण लोगों पर माओवादियों के अत्याचारों की यह एक और कड़ी है। ‘अच्छे माओवादी-बुरे राज्य’ जैसी व्याख्या सच्चाई का सिर्फ एक हिस्सा है, पूरी सच्चाई नहीं है। छत्तीसगढ़ में भाजपा की चुनावी जीत और आर्थिक उपलब्धियों को खारिज नहीं किया जा सकता। इसमें कोई शक नहीं है की माओवादी क्षेत्रों के भीतरी इलाकों में विकास नहीं हुआ है, लेकिन ऐसा इसलिए है कि माओवादियों ने बंदूक उठाकर सरकार को इन क्षेत्रों से दूर रखा है।

इस बीच, केंद्र सरकार लंबे समय के बाद आखिरकार वह कानून बनाने जा रही है, जिसमें आदिवासियों को कुछ निश्चित भूमि स्वामित्व और राज्य के बराबर खनिजों पर रॉयल्टी देने के प्रावधान किए गए हैं। ये बड़ी जीत हैं। माओवादियों ने राज्य की भयानक असफलताओं को उजागर कर और उसे पुराने अन्यायों को खत्म करने के लिए मजबूर कर इस जीत मे अपना योगदान किया है (केंद्र और राज्य दोनों ही स्तरों पर)। लेकिन अब इस नए परिवेश में क्या माओवादी ये दावा कर सकते हैं कि एक दुष्ट राज्य के खिलाफ वे आदिवासियों के एकमात्र संरक्षक हैं? विडंबना यह है कि राज्य की प्रकृति में सुधार करने में माओवाद को जो सफलता मिली है, वह खुद उसी का शिकार बन गया है। अब वे यह नहीं कह सकते कि राज्य में सुधार नहीं किया जा सकता है या फिर यह कि सिर्फ वे ही न्याय दिला सकते हैं। रॉबिन हुड (माओवादी) अब समाधान की जगह एक समस्या लगने लगा है।

राज्य में हालांकि अभी भी पूरी तरह से सुधार नहीं हुआ है और राज्य की ज्यादतियों को रोकने में माओवाद की भूमिका अभी भी बनी हुई है। इस नई भूमिका में बंदूकों की आवश्यकता नहीं है (जैसा माओवादी समूहों ने पॉस्को भूमि अधिग्रहण मामले में कर दिखाया है)। अगर फिर भी माओवादी यदि कहते हैं कि न्याय को बहाल करने के लिए राज्य को उखाड़ फेंकना ही एक मात्र रास्ता है, तो वे रॉबिन हुड से ज्यादा किंग जॉन नजर आएंगे।

- स्वामीनाथन अय्यर
साभार: स्वामीनॉमिक्स.ऑर्ग