आर्थिक स्रोतों को खत्म करने पर पस्त होंगे माओवादी

माओ ने कहा था – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसका तात्पर्य यह था कि क्रांति सशस्त्र संघर्ष के जरिये ही हो सकती है। भारत के माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि सशस्त्र संघर्ष के लिए अस्त्र-शस्त्र और हथियार खरीदने के लिए जेब भरी होना जरूरी है। उसीतरह बंदूक चलानेवालों का पेट भरा होना चाहिए तभी वह डटकर संघर्ष कर सकते हैं इसलिए माओवादी हर वैध और अवैध तरीके से पैसा जुटाकर अपनी तिजोरियां भरनें में लगे हैं। माओवदियों का आर्थिक साम्राज्य कितना बड़ा है इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि  कुछ अर्से पहले केंद्रीय गृहसचिव ने कहा था कि माओवादी हर साल 1600 से 2000 करोड़ रुपये लेवी के तौर पर वसूलते हैं।लेकिन जानकारों का कहना है कि यह आंकड़ा दोगुने से कम नहीं बैठेगा।वैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह का कहना है कि माओवादी केवल उनके ही राज्य से 300-400करोड़ रुपए लेवी के तौर पर वसूल करते हैं।।

माओवादियों के खात्मे के लिए  सरकार हर बार कोई नया अभियान चलाती रहती है लेकिन कोई अभियान कामयाब नहीं होता। दूसरी तऱफ माओवाद से निपटने के नाम पर पैसा खर्च हो जाता है  लेकिन माओवादी वहीं के वहीं रहते हैं। माओवाद का गंभीरता से अध्ययन करनेवाले कई लोगों का कहना है कि सरकार के पास एकीकृत नजरिये का अभाव है। सरकार की सोच केवल पुलिस और अर्ध सैनिक बलों की कार्रवाई या विकास योजनाएं शुरू करने के इर्दगिर्द ही घूमती रहती है। उसमें माओवादियों की ज़ड़े काटने की कारगर रणनीति नहीं होती जबकि उनके हौसले पस्त करने के लिए जरूरी है कि उनके आर्थिक स्रोंतों और हथियारों की आपूर्ति के चैनलों को पूरी तरह खत्म किया जाए। लेकिन इन दोनों ही मुद्दों की अनदेखी की जाती है। इसलिए कोई मुहिम सफल नहीं हो पाती।

माओवादी गतिविधियों के जानकार और माओवादियों के खिलाफ अभियान के मुखिया दोनों ही मानते हैं कि माओवादियों के वर्चस्ववाले इलाकों में माओवादियों ने अपना विशाल आर्थिक साम्राज्य बना लिया है। उसके पैसे से वे आधुनिक हथियार खरीदने में सक्षम हैं जिनका इस्तेमाल वे आतंकी और सैन्य कार्रवाइयों और हत्याकांडों को अंजाम देने में करते हैं। वे हरसंभव तरीके से पैसा जुटाने में लगे रहते हैं। अपहरण लूट और वसूली के अलावा उनकी आमदनी का जरिया लेवी की वसूली है। इस आमदनी का अंदाज छत्रधर महतो द्वारा दिए गए आंकडों से लगाया जा सकता है।लालगढ़ में माओवादियों के सहयोगी और और उनकी ही तर्ज पर काम करनेवाली पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटिज के नेता छत्रधर महतो ने पुलिस को बताया कि उनकी पार्टी ने अपने दबदबेवाले लालगढ़ में लेवी लगाई थी। उसकी दरें इस प्रकार थीं - अर्धशिक्षक के लिए सौ रुपए, प्राथमिक शिक्षक दो सौ, हाईस्कूल शिक्षक के लिए पांच सौ, बैंक मैनेजर के लिए सात सौ, बैंक कर्मचारियों के लिए दो सौ से तीन सौ रुपए, आंगनवाडी कार्यकर्ता के लिए सौ से दो सौ और व्यापारियों के लिए सौ से पांच हजार रुपए। इसके अलावा हर घर को एक-एक किलो चावल देने को कहा गय था। लोकार्ट फारेस्ट बीट आफिस से सतरह हजार, रामगढ़ फारेस्ट बीट आफिस से पंद्रह हजार रुपए और गोलटोरे फारेस्ट रेंज से बीस हजार रुपए वसूले थे। इसके अलावा पीसीपीए के कार्य़कर्ता चुंगी या टोल टैक्स के तर्ज पर हर आने-जाने वाले वाहन से पैसे वसूलते थे। इस पैसे को युनाइटेड बैंक आफ इंडिया की कंतापहाडी शाखा के संयुक्त खाते में जमा किया जाता था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि माओवादी देश में बड़ा सुनियोजित अवैध वसूली का तंत्र चला रहे हैं।

भाकपा (माओवादी) का देश के चालीस हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर बाकायदा वर्चस्व हैं जहां उसकी जनता सरकार नामक समांतर सरकार है और यह सरकार हर व्यक्ति से कर वसूलती है जो आर्थिक गतिविधियों में शामिल है। उद्योगपतियों, व्यापारी, ठेकेदार, खदान मालिक, गरीब आदिवासी और यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों और सरकारी संस्थानों तक को कर देना पड़ता है।

अबतक माओवादी बड़ी और निरंतर आय के लिए मुख्यरूप से तेंदू पत्ता, बांस और लकड़ी के ठेकेदारों को अपना निशाना बनाते रहे हैं। इसके अलावा लोहा, कोयला और अन्य खनिजों की खदानों के मालिकों से भी मोटी रकम बसूलते रहे हैं। इस मामले में तो झारखंड तो उनके लिए सोने के अंड़े देनेवाली मुर्गी साबित हुआ है। राज्य की खनिज और वन संपदा और उनसे जुडे उद्योगों में अवैध वसूली की भरपूर संभावनाएं हैं। झारखंड पुलिस के दस्तावेजों के मुताबिक अवैध खनन में लगे व्यापारी, ठेकेदार और ट्रांसपोर्टर आदि उन्हें चालीस करोड़ रूपये लेवी के रूप में देते हैं। इसके अलावा स्वर्णिम चतुर्भुज योजना भी उनके लिए दुधारू गाय साबित हुई। माओवादियों नें जंगलों से लकड़ी और शराब की तस्करी करनेवालों को भी निशाना बनाया हुआ है। इतना ही नहीं वे स्कूलों तक को नहीं बख्शते। लातेहार के एक स्कूल से उन्होंने पचास हजार रूपए मांगे थे और धमकी दी थी यदि मांग पूरी नहीं की गई तो वे स्कूल उड़ा देंगे। बिहार में पकड़े गए माओवादी नेता नारिया रवि वर्मा ने पुलिस को बताया था कि कई बड़ी कंपनियां नियमित रूप से पैसा देती रहती है। इसमें खनिज खदान, इस्पात और अन्य उत्पादों की कंपनियां शामिल हैं। दंडकारण्य के खनिजबहुल और उनसे जुड़े उद्योगों वाले राज्यों पर दबदबा होने के कारण माओवादी रणनीतिक दृष्टि से भी ताकतवर हो गए हैं। कुछ अर्से पहले केंद्रीय गृहसचिव जीके पिल्ले ने कहा कि अब माओवादी भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों को झुका सकते हैं लेकिन अभी वे ऐसा करना नहीं चाहते। वे जानते हैं कि वे अभी ऐसा करेंगे तो राज्य उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगा। वे राज्य की मशीनरी के पूरे हमले को झेलने को तैयार नहीं हैं। इसलिए वे धीरे चलेंगे।

इन अलग अलग जरियों से होनेवाली आमदनी से माओवादी हथियार खरीदते हैं और अपनी साठ हजार गुरिल्लाओं की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का भरण-पोषण और संचालन करते हैं। उनके पास बड़े पैमाने पर एक-47 बंदूकें हैं। कुछ समय पहले उन्होंने बडी तादाद में ऐसी मोटरसाइकले खरीदीं हैं जिनमें खासतरह के टायर लगे हुए हैं जिनसे जंगलों में आवागमन आसान होता है। प्रचार पर भी माओवादी काफी खर्च करते हैं। वे न केवल पत्रिकाएं निकालते हैं वरन वेबसाइटें भी चलाते हैं। इसके अलावा जंगलों में पुलिस और प्रशासन के खिलाफ अभियान चलाने के लिए लो फ्रीक्वेंसी रेडियों भी चलाते हैं। बहुत सारा पैसा मोबाइल और सैटेलाइट फोनों पर खर्च किया जाता है। माओवादियों का कानूनी सेल पर भी अचछा खासा खर्छ हो जाता है जो देशभर की जेलों में बंद हजारों माओवादियों के मुकदमें लड़ने का काम करती है। इसलिए माओवादियों के खात्मे के लिए उनकी आमदनी के उन स्रोतों को खत्म करना बहुत जरूरी है जिनसे वे इस तरह के खर्चों के लिए पैसा जुटाते हैं।

सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाशसिंह ने कहा था – आप उनकी आर्थिक सहायता और हथियारों की सप्लाई के स्रोत खत्म कर दीजिए वे खत्म हो जाएंगे। आईबी के पूर्व निदेशक अजित डोभाल का कहना है कि घने जंगलों में माओवादियों का पीछा करने के बजाय यह ज्यादा आसान है कि सरकार उनके आर्थिक स्रोतों को खत्म करें। लेकिन विडंबना यह है कि माओवाद से लड़ने की रणनीति बनानेवालों ने कभी इस पहलू पर गौर ही नहीं किया। 2005 में गृह मंत्रालय ने कमेटी आन काम्बेटिंग फायनेंस आफ टेरेरिस्ट (सीएएफटी) बनाई थी लेकिन 2009 तक माओवादियों को आतंकवादी घोषित नहीं किया गया था इसलिए इस मुद्दे पर ज्यादा विचार विमर्श नहीं हुआ। थोड़ी बहुत बातचीत के बाद निष्कर्ष निकाला गया कि ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि मामला इलाके की सुरक्षा की स्थिति से संबधित है और पैसे की आवाजाही गैर बैंकिंग चैनलों से हो रही है इसलिए मामले को राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों को झोंक देनेवाली सरकार ने कभी माओवादियों के आर्थिक स्रोतों को खत्म करने के पहलुओं पर विचार क्यों नहीं किया। कुछ समय पहले इसके जवाब में गृहसचिव पिल्ले ने कहा था कि उन इलाकों को सुरक्षा मुहैया कराना सरकार के लिए संभव नहीं है क्योंकि वहां पुलिस की कमी है। यदि हमारे पास पुलिसवालों की कमी है तो हम वसूली करनेवालों को कैसे पकड़ेगे। वैसे एक पहलू और भी है। राज्यों के पुलिस अफसर कहते हैं कि हमसे कोई शिकायत ही नहीं करता। वैसे आम लोगों की क्या कहें इस क्षेत्र में कार्यरत बड़ी बड़ी कंपनियां तक नक्सलियों की शिकायत करने के बजाय उन्हें पैसा देकर जान छुडाने में विश्वास करती हैं। कारण यह है कि वह जानती हैं कि सरकार उन्हें सुरक्षा मुहैया करा पाने में अक्षम है। उन्हें अपने को और अपने उद्योगों को बचाने के लिए माओवादियों से हाथ मिलाना होगा।

कुछ समय पहले गृहमंत्री चिदंबरम ने इस मामले में सरकार के असहाय होने की बात को स्वीकार किया। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था – माओवादी सबसे चालाक पूंजीपतियों में से है। वे कानून का उल्लंघन करके व्यापार करते हैं। वे टैक्स नहीं देते लेकिन किराया वसूल करते हैं। यह उन्हें चालाक पूंजीपति बनाता है। ऐसी स्थिति में अगर कोई कंपनी व्यापार करना चाहती है तो उसे लेवी या वसूली धन के रूप में किराया देने को मजबूर होना पड़ता है।

अक्सर जब सरकार पर यह आरोप लगता है कि माओवाद को केवल कानून व्यवस्था की समस्या मानकर पुलिस और सशस्त्र बलों की कार्रवाई करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। हालांकि माओवादी समस्या को केवल बल का प्रयोग कर नहीं निपटा जा सकता तो अक्सर सरकार विरधियों का मुंह बंद करने के लिए माओवादी इलाकों के विकास के लिए कोई योजना लेकर आ जाती है। उसे इस तरह पेश किया जाता है गोया वह माओवाद रूपी मर्ज की रामबाण दवा हो। लेकिन अब इस रवैये को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

यह भी कहा जाने लगा है कि यह कथित विकास योजनाओं की दवा मर्ज का इलाज करने के बजाय उसे और ज्यादा बढ़ाएगी क्योंकि पीडित इलाकों  में जबतक नक्सली वर्चस्व है तबतक किसी भी योजना पर पैसे खर्च करना माओवादियों की जेबे भरना है। कारण यह है कि माओवादी अपने इलाकों में किसी भी तरह का विकास होने नहीं देते या केवल उन्हीं आर्थिक गतिविधियों को चलने देंगे जिससे उनकी लंबी जेबें भरती रहें और जो उनके मकसद को आगे बढ़ाएं।

कई जानकार नेता और विशेषज्ञ यह मानने लगे हैं कि अभी सरकार को इन इलाकों में पैसा खर्च करने के बजाय पेसा और एफआरए जैसे जैसे कानून प्रभावी ढंग से लागू कर आदिवासियों के सशक्तीकरण पर ज्यादा जोर देना चाहिए। यूपीए -1 सरकार ने माओवादी वर्चस्ववाले जिलों के विकास के लिए बीस हजार करोड रूपये का इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान बनाया था। लेकिन पैसा तो खर्च हो गया लेकिन उसका लाभ कोई नजर नहीं आया। अक्सर कहा जाता है कि विकास न हो पाने के कारण आदिवासी क्षेत्रों में माओवादी पनप रहे हैं इसलिए यदि माओवादियों का सफाया करना हो तो पहले आदिवासी क्षेत्रों का विकास करना जरूरी है। लेकिन अब यह सवाल अंडा पहले या मुर्गी जैसा बनता जा रहा है। विकास न होने के कारण माओवादी फलफूल रहे है। लेकिन चूंकि माओवादी विकास विरोधी हैं और अपने वर्चस्ववाले इलाके में विकास नहीं होने देते इसलिए जबतक माओवादियों का सफाया नहीं होता तबतक इन इलाकों का विकास संभव नहीं है।मगर माओवादियों का सफाया किए बगेर पैसा खर्चकर विकास करने की कोशिश की गई तो यह पैसा माओवादियों की जेबें भरेगा। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक सेमिनार में सरकार द्वारा माओवादग्रस्त इलाकों में पैसा खर्च किए जाने की योजना पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह रकम माओवादियों के पास चली जाएगी। राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष वार्ष्णेय कहते हैं कि विकास की वापसी के लिए जरूरी है कि पहले माओवादियों द्वारा इलाकों को सैन्यशक्ति के द्वारा काबू में लाया जाए।

इन नेताओं और विश्लेषकों के निष्कर्ष माओवाद नियंत्रित इलाकों की जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। एक बातचीत में छत्तीसगढ़ के सबसे ज्यादा नक्सल पीडित इलाकोंवाले के जिलों –नारायणपुर और बस्तर की सीईओ आर संगीता ने अपनी दुविधा प्रगट करते हुए कहा था - वे नारायणपुर क्षेत्र के सत्तर फीसद इलाके वाले ओरछा विकास खंड के लिए किसी विकास कार्य को मंजूरी नहीं देतीं क्योंकि पैसा सीधे माओवादियों के हाथ में चला जाता है। इसके अलावा माओवादी किसी सरकारी अधिकारी (प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी और राशन दुकानों की सप्लाई करनेवाले वाहनों को छोड़कर) और वाहनों को अंदर नहीं घुसने देते इसलिए इस बात की पुष्टि करना मुश्किल होता है कि काम हुआ है या नहीं। माओवादी सड़क की मरम्मत के लिए किसी ठेकेदार को आने नहीं देते ताकि कोई बाहरी व्यक्ति इस क्षेत्र में नहीं घुसे। संगीता ने दो तिहाई बस्तर जिले के लिए किसी विकास कार्य के लिए कोई मंजूरी नहीं दी क्योंकि वहां भी नारायणपुर जैसे ही हाल हैं। दांतेवाडा के पुलिस अफसर कहते हैं कि माओवादी केवल उन्हीं गतिविधियों की इजाजत देते हैं जो उनके वजूद के लिए जरूरी हैं। मेडिकल सेवा और राशन के अलावा वे अपने क्षेत्र में कुछ नहीं आने देते। वे न केवल कोई विकास नहीं होने देते वरन पहले से हुए विकास को नष्ट करने में लगे हैं। स्कूल आंगनबाडी, सड़के, बिजली के खंभे, मोबाइल टावर आदि हर एक चीज को उन्होंने उडाया है। छात्रों को शहरों में जाने से रोका जाता है। उन्हें डर है कि वे कहीं पुलिस मुखबिर न बन जाएं।

कुछ ऐसा ही उदाहरण है ओडिसा के मलकानगिरी का जहां उनहोंने अपने दो बेस एरिया बनाए हैं। मुख्य बेस एरिया को कट आफ एरिया भी कहा जाता है क्योंकि यह दो नदियों, एक जलाशय और पूर्वी घाटी के पर्वत से घिरा क्षेत्र बाकी राज्य से पूरी तरह कटा हुआ है इसलिए यह माओवादियों के छिपने के लिए सुरक्षित ठिकाना है। नौंवे दशक से अबतक सरकार ने कई बार गुरूप्रिय नदी पर पुल बनाकर इस क्षेत्र को बाकी राज्य के साथ जोडने की कोशिश की। दर्जनों बार टेंडर जारी किए गए। मगर माओवादियों ने ठेकेदारों को डराकर भगा दिया। 2006 में गेमन इंडिया ने बहादुरी दिखाने की कोशिश की तो माओवादियों ने उनका स्टोर हाउस उड़ा दिया और ठेकेदारों को भाग जाने को कहा। इसके बाद कंपनी ने परियोजना छोड़ने में ही भलाई समझी। माओवादी अपने वर्चस्ववाले इलाकों में कुछ ऐसे विकास कार्य जरूर चलने देते हैं जो उनके हित में हैं या जिनसे उन्हें आर्थिक लाभ होता है। मसलन मनेरगा को वे चलने दे रहे हैं तो वजह यह है कि उससे वयस्क आबादी का शहरों की तरफ पलायन रुका है।  इन लोगों में से ही माओवादियों को अपने समर्थक मिलते हैं। माओवादी कुछ सरकारी कार्यों और प्रायवेट उद्योगों को भी चलने देते हैं। और उनसे मोटी रकम वसूलते हैं जो दस से पंद्रह प्रतिशत होती है। सीआरपीएफ के पत्र सीआरपीएफ समाचार में इस्पैक्टर जनरल (विशेष बल) के निदेशक आशुतोष शुक्ल ने लिखा है कि माओवादियों द्वारा इस तरह विकास फंड को हडपा जाना सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।

यही कारण है कि कई अर्थशास्त्री यह कहने लगे हैं कि सरकार को माओवादी नियंत्रणवाले क्षेत्रों में विकास योजनाओं पर खर्च करने के बजाय ऐसे कानून लागू करने पर बल देना चाहिए जिनसे आदिवासियों का शोषण खत्म होकर उनका सही सशक्तीकरण हो।

- सतीश पेडणेकर