शिक्षा का अधिकार कानून से भ्रष्टाचार को मिलेगा बढ़ावा: मनीष सभरवाल

मनीष सभरवाल भारत की अग्रणी स्टाफिंग कम्पनी 'टीम लीस सर्विसेस' के चेयरमैन और स-संस्थापक हैं. कुछ ही साल पुरानी 'टीम लीस सर्विसेस' के आज भारत में 870 जगहों पर आफिस हैं जहां से वो अस्थायी और स्थायी नौकरियां लगवाने का काम करती है. अमरीका के मशहूर वार्टन स्कूल के पढे हुए श्री सभरवाल ग्यारवीं पंचवर्षीय योजना के लिए प्लानिंग कमीशन की लेबर व रोज़गार सम्बन्धी कमेटी के मेम्बर रह चुके हैं तथा प्रधान मंत्री की कौशल विकास काउन्सिल का भी हिस्सा हैं.

Q 1- क्या भारत का वर्तमान शिक्षा तंत्र हमारे जॉब मार्केट की मांग पूरी करने में सक्षम है?
A - नहीं. मैं ये मानता हूँ कि भारत में करीब 90 प्रतिशत स्कूल से निकले हुए बच्चे किताबी ज्ञान लेकर बाहर आते हैं जब कि हमारी जॉब मार्केट को ठोस skill (कौशल) चाहिए. औसतन करीब 58 प्रतिशत बच्चों के अन्दर किसी न किसी तरह का skill deprivation यानी कौशल वंचन है. जब तक इन बच्चों की सहायता कर इन को ज़रूरी बातें ना सिखाई जाएँ, तब तक ये नौकरी के लिए तैयार नहीं हैं.

Q 2- आप के अनुसार देश के युवाओं को रोज़गार के लिए तैयार करने के लिए क्या कदम उठाये जा सकते हैं, खासतौर पर सरकारी स्तर पर?
A - 1961 में पारित हुए अप्रेंटिसशिप एक्ट को हमें फ़ौरन ही ख़ारिज कर देना चाहिए चूंकि उसका हमें कोई लाभ नहीं है. आज भी हमारे देश में सिर्फ ढाई लाख अपरेंटिस हैं जब कि जर्मनी में 600,000 अपरेंटिस है और जापान में 2 मिलियन अपरेंटिस हैं. हमारे देश में फैले 1400 एम्प्लोय्मेंट एक्सचेंजों को बदल कर करियर डेवलपमेंट सेण्टर की तरह विकसित करना चाहिए जहां नौकरी के साथ ज़रूरी निर्धारण, काउंसलिंग, प्रशिक्षा आदि भी दी जाए. पिछले साल इन एम्प्लोय्मेंट एक्सचेंजों में 4 करोड़ लोगों ने आवेदन किया और उनमें से सिर्फ 2 लाख की ही जॉब लग पायी जिससे ये सिद्ध होता है कि वो निरर्थक हैं. पर रोज़गार आवेदकों को इकठ्ठा करने के लिहाज़ से इनको हम आगे भी उपयोग में ला सकते हैं. सरकार के व्यवसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों जैसे आईटीआई को भी प्रदर्शन प्रबंधन के एरिया में फोकस करना चाहिए, जिसके अंतर्गत अच्छे परफार्मेंस के लिए रिवार्ड रखा जा सकता है.

Q 3- इस दिशा में प्राइवेट सेक्टर का क्या रोल हो सकता है?
A - हाँ बिलकुल क्यूंकि सरकार के लिए अकेले इस दिशा में काम करना असंभव है. हमारे देश में शिक्षा, रोज़गार और रोज़गार क्षमता का निजीकरण कोई वैचारिक मुद्दा नहीं है बल्कि एक अनिवार्य ज़रुरत है. अगले 20 सालों में 1 मिलियन लोग हमारी जॉब फ़ोर्स से जुड़ेंगे और सरकार के पास बिलकुल भी क्षमता नहीं की वो अकेले इनको प्रशिक्षित कर के रोज़गार दिलवा सकें. इसलिए निजी सेक्टर की मदद तो सरकार को लेनी ही पड़ेगी.

Q 4-आप को शिक्षा का अधिकार कानून का असर इन विषयों पर क्या पड़ता दिखाई पड़ता है?
A- 1991 में आर्थिक सुधारों के बाद हमारे देश में उद्यमशीलता को बहुत बढ़ावा मिला और आर्थिक रूप से हम ने बहुत उन्नति करी पर शिक्षा के क्षेत्र में आज भी हम सुधारों के लिए तरस रहे हैं. "शिक्षा के आय्तुल्लाओं" ने हमें इस क्षेत्र में आगे ही नहीं बढने दिया. शिक्षा का अधिकार कानून से सिर्फ भ्रष्टाचार को और अधिक बढ़ावा मिलेगा. प्राइवेट सेक्टर स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण के नाम पर शिक्षा अधिकारीयों को लूट करने का एक और बहाना दिया जा रहा है. आर्थिक रूप से कमज़ोर तबका जो प्राइवेट स्कूलों में नहीं जा सकता उनकी दशा सुधारने की तरफ तो कोई ध्यान ही नहीं दे रहा. सरकार को चाहिए कि वो गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों में ही बच्चो की छात्रवृत्ति या वाउचर सिस्टम के तहत मदद करे.

Q 5- आप इस एक्ट में किस तरह के संशोधनों को लाना चाहेंगे?
A - देश में शिक्षा सम्बन्धी आधार भूत ढांचे को सुधारना पड़ेगा. स्कूल बिल्डिंग, शिक्षकों की संख्या और खेल के मैदान आदि बिन्दुओं पर और अधिक फोकस करना पड़ेगा.
पर इस एक्ट से जुड़ा सब से कठिन प्रश्न है 25 प्रतिशत आरक्षण. सरकार को ये साफ़ करना होगा की इस आरक्षण के बाद स्कूलों की किस तरह से वित्तीय प्रतिपूर्ति करनी पड़ेगी और क्या 75 प्रतिशत अभिभावकों को इस 25 प्रतिशत का भार उठाना पड़ेगा. जब तक इस प्रावधान से जुड़ी बातें साफ़ नहीं हो जाती हैं, इसे पर रोक लगा देनी चाहिए.