शर्मनाक तो है, लेकिन शर्मसार कब होंगे ?

देश के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कुछ दिनों पूर्व कुपोषण के कारण देश में नौनिहालों की मृत्यु को राष्ट्रीय शर्म की संज्ञा दी थी। उनके बयान के बाद से ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद उनका मंत्रालय व देश की मशीनरी अब इस मसले को गंभीरता से लेगी और कुछ कड़े कदम उठाएगी। लेकिन जनता को दो जून की रोटी उपलब्ध कराने की गारंटी देने (दावा करने) वाले खाद्य सुरक्षा बिल को ही लागू करने को लेकर उन्हीं के कुछ मंत्रियों की तरफ से नींद उड़ जाने जैसे आए बयानों ने प्रधानमंत्री की चिंताओं को कम करने की बजाए और बढ़ाने का ही काम किया है। इस बीच नौनिहालों की स्थिति के बाबत जारी एक विश्वव्यापी रिपोर्ट ने देश की रही सही इज्जत को भी तार-तार कर दिया। रिपोर्ट में नवजातों की मृत्यु दर के मामले में भारत को विश्व के सबसे बुरे 50 देशों में शामिल किया गया है।

नवजात शिशुओं की मृत्यु दर के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनाईटेड नेशंस चिल्ड्रन्स फंड्स (यूनिसेफ) द्वारा तैयार किए गए विश्व के सबसे बुरे 50 राष्ट्रों की ताजा सूची में भारत को 46वें स्थान पर रखा गया है। जले पर नमक छिड़कने जैसी बात यह कि इस मामले में चीन तो चीन, भूटान, नेपाल और बांगलादेश जैसे छोटे व अपेक्षाकृत कम विकास दर वाले राष्ट्र भी भारत से कहीं अच्छी स्थिति में हैं। चीन जहां 108वीं रैकिंग के साथ कहीं बेहतर स्थिति में है वहीं पड़ोसी बांगलादेश (61), नेपाल (59) व भूटान (52) भी सबसे बुरे 50 राष्ट्रों की सूची से बाहर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में नौनिहालों के जीवित रहने की संभावना प्रति एक हजार मात्र 65 ही होती है। इसका तात्पर्य यह है कि विभिन्न कारणों (अस्पतालों, प्रशिक्षित दाईयों, उचित देखभाल व दवाईयों के आभाव) से देश में पैदा होने वाले एक हजार बच्चों में से 935 बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी करने के पूर्व ही अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

यूनिसेफ द्वारा जारी ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन 2012’रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष लगभग 16 लाख बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। जबकि एक लाख में से लगभग 4,800 बच्चों की मौत जन्म के एक वर्ष के भीतर ही हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पैदा होने के बाद शिशुओं के जिंदा रहने की संभावना भी एक बड़ी चुनौती है। देश में प्रति हजार में से मात्र 65 नवजातों के ही जिंदा रहने की संभावना होती है। गर्भवती महिलाओं की उचित देखरेख व पौष्टिक आहार की अनुपलब्धता सहित अन्य कारणों से यहां हर साल पैदा होने वाले 2.71 करोड़ बच्चों में से लगभग 28 फीसदी का वजन सामान्य से कम होता है। स्वास्थ्य मानदंड़ों के मामले में चीन की स्थिति भारत से कहीं बेहतर है। चीन में पैदा होने वाले प्रति हजार बच्चों में सिर्फ 18 की ही मौत होती है। यानि यहां पैदा होने वाले प्रति एक हजार में से 982 बच्चे जीवित रहते हैं जो  भारत के मात्र 65 की तुलना में काफी अधिक है।

बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा के मामले में भी कमोवेश देश की स्थिति कुछ ऐसी ही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में बाल विवाह पर प्रतिबंध व सजा का प्रावधान होने के बावजूद 18 वर्ष से कम आयु की 47 प्रतिशत लड़कियों की शादी कर दी जाती है। इसके अतिरिक्त 15 वर्ष के भीतर ब्याहे जाने वाली लड़कियों की प्रतिशतता लगभग 18 फीसदी है। 22 प्रतिशत किशोरियां विवाह योग्य उम्र होने के पूर्व ही मां भी बन जाती हैं जिससे स्वस्थ समाज की संरचना में अवरोध पैदा होता है। देश में प्रति लाख नवजातों में से 4,500 बच्चों को जन्म देने वाली मांओ की स्वयं की औसत आयु 15-19 वर्ष होती है।

- अविनाश चंद्र