भारत की समस्या भूख नहीं कुपोषण है

                                                    यूपीए को दम देगी गांवों की बढ़ती समृद्धि

अर्थव्यवस्था को लेकर फिलहाल छाई पस्ती को एक तरफ रख दें तो 2011-12 के रोजगार और उपभोग संबंधी आंकड़े कई उत्साहवर्धक संकेत देते हैं। इनसे पता चलता है कि पिछले दो सालों में औसत पारिवारिक उपभोग एक तिहाई बढ़ गया है, जो मुद्रास्फीति की दर से कहीं ज्यादा है। इससे 2014 के चुनाव को लेकर कांग्रेस की उम्मीदें रायशुमारी के नतीजों की तुलना में ज्यादा मजबूत हो सकती हैं। चार रुझान बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहला, गरीबी तेजी से कम हो रही है। दूसरा, मजदूरी में तेज बढ़ोतरी हो रही है। तीसरा, लोग अनाजों का दायरा पार कर बेहतर खाने की तरफ बढ़ रहे हैं। चौथा, आम धारणा के विपरीत रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) मजदूरी बढ़ाने में मुख्य भूमिका नहीं निभा रही है।

पिछड़ रही हैं महिलाएं

सरकार ने 2009-10 के बरक्स 2011-12 के लिए गरीबी के अनुपात का ठोस आंकड़ा अभी नहीं मुहैया कराया है। लेकिन सीमित आंकड़ों के आधार पर किया गया आकलन बताता है कि यह अनुपात 29.8 प्रतिशत से गिरकर 24-26 फीसदी पर आ गिरा है। पहले गरीबी कम होने की रफ्तार 0.75 प्रतिशत सालाना हुआ करती थी, जो अभी तेज होकर 2 फीसदी सालाना तक पहुंच गई है। उपभोग से जुड़ा सबसे स्पष्ट आंकड़ा यह बताता है कि गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग 1053 रुपये से बढ़कर 1430 रुपये हो गया है। गैर-सरकारी काम में लगे अस्थाई ग्रामीण मजदूर की मजदूरी 102 रुपये से बढ़कर 149 रुपया (पुरुष), और 69 रुपये से बढ़कर 102 रुपया (महिला) हो गई है। शहरी रुझान भी कमोबेश ऐसा ही है। गौरतलब है कि अस्थाई मजदूरों की मजदूरी औसत राष्ट्रीय उपभोग से ज्यादा रफ्तार से बढ़ी है। उसमें भी सबसे अच्छी रफ्तार गरीब मजदूरों की रही है। हां, महिलाओं की मजदूरी पुरुषों की तुलना में कम तेजी से बढ़ रही है।

मशीनों से कोई खतरा नहीं

आश्चर्य की बात है कि ऊंची मजदूरी भी ज्यादा लोगों को श्रमशक्ति का हिस्सा बनने के लिए राजी नहीं कर पाई। दो सालों में ग्रामीण पुरुष कार्यशक्ति में मात्र 27 लाख का इजाफा हुआ, जबकि महिला कार्यशक्ति में ठीक इतने की ही कमी दर्ज की गई है। बेरोजगारी की दर 2 प्रतिशत से बढ़कर 2.2 प्रतिशत हुई है, लेकिन ये दोनों संख्याएं बहुत छोटी हैं। काम की कमी से ज्यादा बड़ी समस्या मजदूरों की कमी की है। इसकी आशावादी व्याख्या यह हो सकती है कि दसियों लाख नौजवान काम से जुड़ने के बजाय पढ़ाई में जुटे हुए हैं। जबकि निराशावादी व्याख्या यह हो सकती है कि महिलाएं अपनी कार्यस्थितियों को असुरक्षित या अनुपयुक्त पा रही हैं। कुछ विश्लेषकों को इस बात का भय है कि बढ़ता मशीनीकरण ग्रामीण महिलाओं को काम से बेदखल कर रहा है। पंजाब के किसान धान रोपने के लिए मेकेनिकल ट्रांसप्लांटर का इस्तेमाल कर रहे हैं और बिहार तक में खेतों की कटाई कंबाइंड हार्वेस्टरों में की जा रही है। लेकिन ग्रामीण मजदूरी का तेजी से बढ़ना इस सिद्धांत को खारिज करता है कि मशीनें बेरोजगारी बढ़ा रही हैं। सचाई यह है कि मजदूरों की कमी किसानों को मशीनों का सहारा लेने को मजबूर कर रही है।

श्रमशक्ति में स्त्रियों की इतनी कम भागीदारी की व्याख्या के लिए हमें और ज्यादा शोध की जरूरत पड़ेगी। 2004 में लगभग 30 प्रतिशत से अभी यह सीधे 22 प्रतिशत पर आ गिरी है। शहरी इलाकों में उनकी भागीदारी 15 फीसदी के रुग्ण स्तर पर है। तेजी से बढ़ती मजदूरी के इस दौर में ज्यादा स्त्रियों को कामकाजी होना चाहिए था, लेकिन रुझान बिल्कुल उलटा है। मनरेगा का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को काम पर लगाना है लेकिन वहां भी कामकाजी महिलाओं का हिस्सा गिर रहा है। भोजन का स्वरूप भी इधर नाटकीय रूप से बदला है। 1993-94 से 2011-12 के बीच ग्रामीण इलाकों के कुल उपभोग में अनाज का हिस्सा आधे से भी कम, 24.2 फीसदी से गिरकर 12 फीसदी हो गया है। शहरों में यह 14 प्रतिशत से गिरकर 7.3 प्रतिशत पर आया है। भोजनेतर वस्तुओं का हिस्सा गांवों में 36.8 प्रतिशत से बढ़कर 51.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो वहां बढ़ती समृद्धि को दर्शाता है। गांव के लोग अब बेहतर खाने की ओर जा रहे हैं। उनके भोजन में अंडा, मछली, मांस, फल, मेवा और विभिन्न पेयों का हिस्सा बढ़ रहा है।

एक बात तो साफ है कि भारतीयों के यहां अनाज की कोई कमी नहीं है और वे बेहतर भोजन, स्थाई उपभोक्ता सामान तथा सेवाओं पर पैसे खर्च कर रहे हैं। यह बदलाव सभी आय वर्गों में देखा जा रहा है। खाद्य सुरक्षा अध्यादेश सस्ते अनाज की आपूर्ति 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत आबादी तक ले जाना चाहता है। इसे खाद्य सुरक्षा के बजाय मध्यवर्ग को राहत कहना ज्यादा सही रहेगा। 2004 में सिर्फ 2 प्रतिशत भारतीयों ने कहा था कि साल के किसी वक्त उन्हें भूखे सोना पड़ा है। खाद्य सुरक्षा की जरूरत ऐसे ही लोगों को है, मध्यवर्ग को नहीं। भारत में असल समस्या भूख की नहीं, कुपोषण की है। लोगों को लौहतत्व, विटामिनों और प्रोटीनों की जरूरत है। लेकिन खाद्य सुरक्षा अध्यादेश का दायरा अनाजों तक ही सीमित है।

हल्की रहेगी एंटी-इनकंबेंसी

मनरेगा के शुरुआती दिनों में न्यूनतम से ज्यादा मजदूरी देने का प्रावधान था। कई राज्यों ने तो अपने यहां हड़बड़ी में न्यूनतम मजदूरी बढ़ा दी थी क्योंकि मनरेगा खर्चा केंद्र सरकार को उठाना था। न्यूनतम मजदूरी जब राजनीतिक कारणों से बढ़ी थी तब इसके बाजार भाव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। किसानों ने इसे सियासी तिकड़म मानकर खारिज कर दिया था। लेकिन आज अस्थाई मजदूरों का बाजार भाव मनरेगा के रेट से काफी ऊपर चल रहा है। 2011-12 में मनरेगा ने महिलाओं को औसतन 102 और पुरुषों को 112 रुपये मजदूरी दी थी जो 103 और 149 रुपये के बाजार भाव से क्रमश: कम और काफी कम है। इसका मुख्य कारण एक दशक की तेज जीडीपी ग्रोथ है। एशिया की सभी चमत्कारिक अर्थव्यवस्थाओं ने ऊंची मजदूरी जीडीपी ग्रोथ के जरिये ही हासिल की है, रोजगार योजनाओं के जरिये नहीं। भारत भी इस मामले में उनसे अलग नहीं है। बहरहाल, इसका राजनीतिक निहितार्थ यही है कि भ्रष्टाचार और धीमी अर्थव्यस्था के आरोपों से घिरी कांग्रेस को अगले चुनावों में एंटी-इनकंबेंसी की मार उतनी ज्यादा नहीं झेलनी पड़ेगी।

 

 

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया