मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूं, मैं हिंदी हूं

मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।
मैं सज्जा हूँ, मैं जीवन हूँ। मैं भावों का दर्पण हूँ।।
मैं अमृत हूँ, मैं संगत हूँ। मैं प्रेम की चिर यौवन हूँ।।
मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

 मैं माँ-सम हूँ, मैं अम्बर हूँ। मैं सुंदर और मनोहर हूँ।।
मैं मीठी हूँ, मैं अनूठी हूँ। मैं सुघरता की धरोहर हूँ।।
    मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

मैं मैत्री हूँ, मैं माटी हूँ। मैं सहजता की परिपाटी हूँ।।
मैं मीरा हूँ, मैं कबीरा हूँ। मैं तुलसी-सूर की साथी हूँ।।
मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

मैं गर्व हूँ, मै माथा हूँ। मैं सरित-लेखनी गाथा हूँ।।
     मैं संस्कृत-सुता, मैं संस्कृति। मैं वगेश्वरीय पताका हूँ।।
      मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

मैं ओज हूँ, मैं आगा हूँ। मैं एका की धागा हूँ।।
मैं सरल हूँ, मैं अनुपम हूँ। मैं सोना हूँ, मैं सुहागा हूँ।।
मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

मैं जीवन हूँ, मैं आशा हूँ। मैं जन-जन की भाषा हूँ।।
           मैं मान हूँ, मैं अभिमान हूँ। हिन्द की कालजयी परिभाषा हूँ।।
   मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

 

- सत्येन्द्र सिंह, लखनऊ
कवि परिचयः सत्येन्द्र कुमार सिंह, एक जाने-माने कवि, लेखक, करियर काउंसलर, ट्रेनर एवं शिक्षाविद हैं| वह अनेक मीडिया चैनल पर पैनलिस्ट होने के साथ साथ राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार लिखते हैं। इनकी तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुकी है और पांच लघु कथा संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित