जन्मदिन मुबारक महादेव गोविंद रानाडे

महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म नाशिक के निफड तालुके में 18 जनवरी, 1842 को हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय कोल्हापुर में बीता। 14 साल की अवस्था में उन्होंने बॉम्बे के एल्फिन्सटन कॉलेज से पढ़ाई प्रारंभ की। उन्होंने एक एंग्लो-मराठी पत्र ‘इन्दुप्रकाश’ का सम्पादन भी किया।

बाद में महादेव गोविन्द रानाडे का चयन प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के तौर पर हुआ। सन 1871 में उन्हें ‘बॉम्बे स्माल काजेज कोर्ट’ का चौथा न्यायाधीश, सन 1873 में पूना का प्रथम श्रेणी सह-न्यायाधीश, सन 1884 में पूना ‘स्माल काजेज कोर्ट’ का न्यायाधीश और अंततः सन 1893 में बॉम्बे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया।

सन 1897 में रानाडे को सरकार ने एक वित्त समित्ति का सदस्य बनाया। उनकी इस सेवा के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘कम्पैनियन ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द इंडियन एम्पायर’ से नवाज़ा। उन्होंने ‘डेक्कन अग्रिकल्चरिस्ट्स ऐक्ट’ के तहत विशेष न्यायाधीश के तौर पर भी कार्य किया। वे बॉम्बे विश्वविद्यालय में डीन इन आर्ट्स भी रहे।

रानाडे का मानना था कि बड़े उद्योगों के स्थापना से ही देश का आर्थिक विकास हो सकता है और पश्चिमी शिक्षा आधुनिक भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। रानाडे भारतीयों और ब्रिटिशर्स के बीच प्रगाढ़ संबंधों के पक्षधर थे। उनका मानना था कि भारतीय एवं पश्चिमी सभ्यता के अच्छे पहलुओं को अपनाने से देश मजबूत हो सकता है। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख विचारधारा के विभिन्न नेतृत्वकर्ताओं में महादेव गोविंद रानाडे का नाम प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक सभी क्षेत्रों में रचनात्मक सुझाव प्रस्तावित किये। वे स्वतंत्रता, सामाजिक उन्नति और वैयक्तिक चरित्र की पुर्नस्थापना के महान समर्थक थे। रानाडे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। भारतीय राजनीति में रानाडे उदारवादी चिंतन के प्रमुख स्तंभ थे।

महादेव गोविंद रानाडे क्रांतिकारी, हिंसात्मक एवं विद्रोहात्मक साधनों के खिलाफ थे। जनता के कष्टों को दूर करने के लिए उन्होंने सरकार से आवेदन करने के संवैधानिक साधनों पर बल दिया। रानाडे ने ब्रिटिश संसद के पास एक याचिका भेजकर ब्रिटिश संसद में भारतीयों को प्रतिनिधित्व करने देने की मांग की। इस याचिका में उन्होंने भारत की स्वशासी संस्थाओं की स्थापना के लिए इच्छा जाहिर की। भारत को एकता के सूत्र में बांधने का श्रेय रानाडे ब्रिटिश शासन को देते थे। वे ब्रितानी नियमों से पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था, नियंत्रित कानूनों से मुक्त न्याय व्यवस्था, रेल और तार जैसी आधुनिक संचार साधन प्रणाली, अंग्रेजी भाषा, पाश्चात्य संस्कृति तथा विज्ञान से परिपूर्ण आधुनिक ज्ञान आदि के प्रशंसक थे। रानाडे का विश्वास था कि भारत में सामाजिक और नागरिक जागरुकता पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति को आत्मसात कर के ही लाई जा सकती है। यहां तक कि वे ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए वरदान स्वरूप मानते थे। उनके अनुसार अंग्रेजों कि नैतिक एवं राजनीतिक भावना सर्वोपरि थी। हालांकि उन्होंने अंग्रेजों की सिर्फ प्रशंसा ही नहीं कि बल्कि कई मौकों पर उनकी नीतियों की आलोचना भी की। अत्यधिक केंद्रीयकृत ब्रिटिश व्यवस्था का भी रानाडे ने विरोध किया। रानाडे ने अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को हीन समझने की नीति को उनके नैतिक पतन का कारक माना। 

रानाडे की स्वतंत्रता संबंधी मान्यता भी उदारवादी थी जिसका स्पष्ट अर्थ था, ‘निश्चित मापदंडों की सीमा में स्वतंत्रता का उपभोग।’ सन् 1893 ई. में रानाडे ने अपने एक भाषण में कहा था, ‘स्वतंत्रता का अर्थ है कानून बनाना, कर लगाना, दंड व्यवस्था स्थापित करना और अधिकारियों की नियुक्ति करना। एक स्वतंत्र देश और गुलाम देश में मात्र इतना सा अंतर है कि स्वतंत्र राष्ट्र में किसी प्रकार का दंड देने से पूर्व ही नियम बने होते हैं। कर लगाने से पूर्व उसके लिए जनता से स्वीकृति ली जाती है और विधि निर्माण से पूर्व जनमत लिया जाता है।’

- आजादी.मी