वृद्घि का जादू खत्म ना हो पाये

एक प्रमुख वैश्विक कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी ने एक बार कहा था कि जब भी उन्होंने भारतीय लोगों पर दाव लगाया तो उनका दावा कारगर सिद्घ हुआ लेकिन जब भी भारतीय बाजारों के बारे में उन्होंने वही रुख अपनाया, तो उन्हें वैसा नतीजा हासिल नहीं हो पाया। कुछ वर्ष पश्चात उन्होंने कहा कि यहां तक कि भारतीय बाजारों को लेकर भी उनके दाव दुरुस्त होते जा रहे हैं लेकिन अभी भी सरकार पर दाव लगाना सही विचार नहीं है। आर्थिक सुधारों का सूत्रपात हुए बीस वर्ष बीत चुके हैं लेकिन यह बात अभी भी कमोबेश वैसी ही है।

भारतीय लोग (या लोगों का एक बड़ा हिस्सा कहना अधिक मुनासिब होगा) समृद्घ हुए हैं-वे देश विदेश की कंपनियों में काम कर रहे हैं, उन्होंने देश-विदेश में अपना कारोबार शुरू कर दिया है और बड़े उपभोक्ता वर्ग में तब्दील हुए हैं जिनके लिए आर्थिक सुधार बड़ी नियामत लाए हैं। भारतीय बाजार का इस कदर विस्तार हुआ जितना पहले कभी नहीं हो पाया। कई उत्पादों और सेवाओं का बाजार पिछले दो दशकों के दरमियान 10 गुना बढ़ा है। यदि गुणवत्ता की बात करें तो 1991 में उपलब्ध उत्पादों की तुलना में सुधार आया है। जहां तक वेतन के अनुपात में कीमतों का संबंध है तो अधिकांश मामलों में वस्तुएं और सेवाएं अधिक किफायती हुई हैं। एकमात्र अपवाद संभवत: मकान है जिसकी कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है।

आज के संकटपूर्ण समय में अधिकांश लोग इन बुनियादी बदलावों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जब न तो निर्लज्ज भ्रष्टाचार पर कोई कड़ा प्रहार किया जा रहा है, और न ही सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं, शासन की गुणवत्ता का स्तर भी बेहतर नहीं हो पा रहा है, जो एक वास्तविक उम्मीद होनी चाहिए। परिणामस्वरूप एक संशयभरे माहौल का सृजन होता है कि भारतीय वृद्घि का जादू कब तक अपना जलवा बिखेर पाएगा, और क्या कामयाब राजनीति की कल्पित आवश्यकताओं और तार्किक अर्थशास्त्र के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा। लेकिन क्या अधिक आशावादी व्याख्या संभव है? उदाहरण के तौर पर शिक्षा क्षेत्र में तमाम नाकामियों के बावजूद पिछले दो दशकों में साक्षरता दर 52 फीसदी से बढ़कर 74 फीसदी हो गई। माध्यमिक और पेशेवर शिक्षा सहित उच्च शिक्षा में अवसरों में नाटकीय रूप से सुधार आया है।

कृषि क्षेत्र काबू से बाहर जा रहा है, इस नकारात्मक धारणा के बाद भी पिछले कई वर्षों में कृषि क्षेत्र की विकास दर औसतन 3 फीसदी से बेहतर रही है। जन स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रत्यक्ष विफलताओं के बावजूद अधिकतर सूचकांक (मातृत्व एवं शिशु स्वास्थ्य, प्रतिरक्षण स्तर) बेहतरी की कहानी बयां करते हैं। इसलिए, सरकार के दायरे में आने वाले प्रमुख क्षेत्रों में पहले की तुलना में स्थिति काफी सुधरी है। यह भी स्वीकार करना होगा कि जैसे विकास के मोर्चे पर चीन काफी बेहतर कर रहा है वहीं इनमें से कुछ मानकों पर बांग्लादेश का प्रदर्शन भी बेहतर है। लेकिन इसे मानने की कोई वजह नहीं है कि भारत में सरकार ने कुछ भी नहीं किया है और कुछ भी हासिल नहीं हुआ है।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने हाल में 'इकॉनमिक एक विस्तृत लेख लिखा है जिसमें उन बिंदुओं की लंबी फेहरिस्त है जिन्हें 12वी पंचवर्षीय योजना (जो अप्रैल से शुरू हो रही है) के दौरान 9 फीसदी की विकास दर हासिल करने के लिए बेहद अहम बताया गया है। यह एक बेहद उम्दा विचार होगा कि इस मसले को तरजीह दी जाए और एक समय सीमा के भीतर विशेष लक्ष्य निर्धारित किए जाएं, जिनकी निरंतर निगरानी और मध्यावधि समीक्षा संभव हो सके। यदि सरकार अपनी क्षमताओं को लेकर भरोसे को कायम करना चाहती है तो उसे इस मसले को व्यापक और केंद्रित रूप से निरूपित करना होगा। दुनिया पिछले दो दशकों में चीन की जबरदस्त तरक्की की साक्षी रही है जबकि भारत को समय-समय पर सम्मानित दर्जा हासिल होता गया। आने वाला दशक आखिरकार भारत का होगा क्योंकि चीन बुढ़ाता जा रहा है और उसकी कामगार जनता पर उम्र हावी होती जा रही है, और अनुमान के तौर पर उसकी बचत (और निवेश भी) कम होती जाएगी-जिसका नतीजा सुस्त वृद्घि ही होगी। लेकिन यदि भारत को अपनी नियति से साक्षात्कार करना है तो सरकार को सक्षम भूमिका अदा करनी ही होगी।

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