लोकपाल काफी नहीं, बुनियादी सुधारों की है जरूरत

कुछ साल पहले मैंने इसी कॉलम में इस बात पर बड़ा आश्चर्य जताया था कि कैसे अमरिका के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें सजा भी मिल जाती है, लेकिन भारत में ऐसे ही अपराधों में शामिल व्यवसायी आसानी से बच जाते हैं। भारत में दरअसल भ्रष्ट राजनेताओं ने पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को इस तरह से अपंग बना दिया है कि तमाम स्तर की सुनवाइयों के बाद भी उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि इस तरह का सड़ा हुआ सिस्टम धूर्त उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार नहीं होने देगा, क्योंकि किसी भी तरह का घपला इन दोनों की मिलीभगत से ही अंजाम दिया जाता है। ऐसे में जब हमारा सिस्टम इन धूर्त राजनेताओं पर कार्रवाई करेगा, तब ही भ्रष्ट उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार किया जा सकेगा।

मेरी यह धारणा तब सही साबित हुई जब 2जी लाइसेंस आवंटन मामले में पहले राजनेताओं और फिर बड़े व्यवसाइयों को गिरफ्तार किया गया। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा को पद से हाथ धोना पड़ा और फिर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया। इसके बाद अनिल अंबानी ग्रुप, स्वान टेलकॉम और यूनीटेक के प्रबंधकों के गिरेबां पर हाथ डाला गया। इसके बाद करुणानिधी की बेटी और सांसद कनीमोझी के दफ्तर पर भी सीबीआई ने छापे मारे। एक समय ऐसा भी था जब कनीमोझी की तरफ आंख उठाकर देखना भी शायद संभव नहीं था। लेकिन देर से ही सही कानून के हाथ उन तक पहुंचे। आश्चर्यजनक रूप से कनिमोझी के कार्यालय पर छापे तब मारे गये जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार-प्रसार अपने पूरे शबाब पर था। जांच की कड़ी चाहे जहां तक जाये, लेकिन कनिमोझी को जांच के आगोश में लेने से यूपीए सरकार का भविष्य जरूर अधर में लटक गया है।

लेकिन इन सारे घटनाक्रमों के बाद भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि कुछ राजनेताओं और बड़े कारोबारियों की गिरफ्तारी से देश की राजनीति और व्यापारिक दुनिया साफ सुथरी हो जाएगी और इसमें भ्रष्टाचार नाम की चीज नहीं बचेगी। इसके पहले देश को हिला देने वाले कई घोटालों के जांच में भी खूब हो हल्ला मचाया गया, लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला। लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा 1974-75 में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये गए मुहिम ने गुजरात के तत्कालीन चिमनभाई पटेल सरकार को गिरा दिया और केंद्र में इंदिरा गांधी को भी आम चुनावों में भारी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन विदित है कि कुछ ही साल बाद दोनों ही नेताओं ने फिर से पूरी ताकत के साथ वापसी की और सत्ता पर काबिज हो गये।

1989 के बहुचर्चित बोफोर्स घटाले ने राजीव गांधी को भी सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। लेकिन इसके दोषियों पर अभी भी कोई कार्रवाई नही की जा सकी। उस घोटाले का एक अभियुक्त विन चड्ढा की बुढ़ापे के कारण मृत्यु भी हो गई। कुछ ऐसा ही 1990 में हुए जैन हवाला घोटाले में भी हुआ। उस मामले में राजनेताओं ने जांच में ही खूब हिला-हवाली की और उसे रुकवा दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को आदेश दिया कि वह मामले की जांच करे और दोषियों को सजा दिलाये। दुर्भाग्य से सीबीआई ने राजनैतिक दबाव की वजह से इसे अनमने तरीके से निपटाया और सुनवाइयों के अलावा इसमें किसी को भी दोषी करार नहीं दिया जा सका।

अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार की हाल की घटनाओं, जैसे कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हुई धांधली, के खिलाफ शुरू हुए हालिया आंदोलनों का भी वही हश्र होगा, और भ्रष्टाचार की जिन घटनाओं की परिणति अन्ना हजारे द्वारा एक मजबूत लोकपाल की मांग से सम्बंधित आंदोलन और मध्य वर्ग का उनको मिले अपार समर्थन में हुई?

अभी तक यह साबित नहीं हो पाया है कि 2 जी स्पेक्ट्रम में जो सबूत इक्ट्ठा किये गये हैं वे हवाला केस में इक्ट्ठा किये गये सबूतों से ज्यादा मजबूत और महत्वपूर्ण हैं ? सीबीआई को इस बात के सबूत मिले हैं कि कनिमोझी के कलईगनर टीवी को 200 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, लेकिन कंपनी के प्रबंधन ने अपनी सफाई में कहा है कि उसने इंटर-कॉरपोरेट लोन लिया था जिसे बाद में चुकता भी कर दिया गया। वैसे घोटाले की जो कुल अनुमानित राशि है (50,000 करोड़ रुपये), उसमें 200 करोड़ रुपये तो बहुत ही छोटी रकम है।

यह हो सकता है कि जब इस केस की सुनवाई आगे बढ़ेगी तो कुछ और पक्के और ठोस सबूत मिले, लेकिन ऐसा होगा यह निश्चित नहीं। याद कीजिए पूर्व दूरसंचार मंत्री (1991-96) सुखराम को। 1996 के चुनावों में जब उनकी पार्टी बुरी तरह हार गई तो संयुक्त मोर्चा की सरकार ने उनके ठिकानों पर ताबडतोड़ छापे मरवाये। उन्हें करोड़ो रुपये के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार भी किया गया। उनके घर से सूटकेस और बेड शीट में बंधे नोटों की गड्डियां मिलीं। लेकिन कोर्ट को उन्हें दोषी करार देने में 13 वर्ष से ज्यादा का समय लगा और उन्हें महज तीन साल की सजा सुनाई गई। सुखराम ने कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील की है। वे अभी 84 साल के हैं और ऐसा लगता है कि जब तक उनकी अपील पर सुनवाई पूरी होगी, वे ‘स्वर्ग’ (ऐसे लोग तो आजकल स्वर्ग ही जा रहे हैं !) सिधार चुके होंगे।

इतिहास की इन कड़वी सच्चाईयों को जानकर 2 जी मामले में सीबीआई से ज्यादा की उम्मीद करना बेमानी है। और हां, लोकपाल बिल के पास होने पर भी ज्यादा रोमांचित होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एक मजबूत लोकपाल द्वारा दिये गए किसी तथ्यपरक और कड़े फैसले को भी ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है और फिर आपको पता है कि वहां क्या होगा... तारीख.. तारीख.. और तारीख...।

सिर्फ लोकपाल से कुछ नहीं होगा। हमें बड़े स्तर पर अपने पुलिस-प्रॉसिक्युटर-न्यायिक व्यवस्था को दुरूस्त करने की जरूरत है। इस मसले पर ज्यादा विस्तार से चर्चा करना इस कॉलम मे संभव नहीं है, लेकिन बिना इसके 2जी मामले का भी वही हश्र होगा, जो पहले भी ऐसे मामलों का हुआ है।

इन सबके अलावा हमें भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो खुद ही भ्रष्टाचार को खत्म करे। मैंने इस बात की पहले भी वकालत की है कि ऐसा कानून बने जिसके तहत संसद और विधानसभाओं के लिए चुने गए प्रतिनिधियों पर यदि किसी तरह का आपराधिक मामला हो, तो इसकी सुनवाई बाकी सारे मामलों से पहले हो और किसी भी सूरत में दो साल के अंदर इस पर फैसला हो जाए।

आजकल बहुत सारे भ्रष्ट और आपराधिक किस्म के लोग विधायिका में इसलिए प्रवेश कर रहे हैं कि ताकि उनके ऊपर चल रहे मामलों को वे लंबित कर सकें। लेकिन यदि ऐसी व्यवस्था हो जाये, जिसमें इस बात का प्रवाधान हो कि यदि कोई व्यक्ति एक बार चुनाव जीत जाता है तो उसके खिलाफ चल रहे मामले खुद ब खुद वरीयता क्रम में सबसे ऊपर चले आयेंगे और उसकी सुनवाई काफी तेजी से होगी, तो अपराधी खुद ही राजनीति से बाहर रहने में भला समझेंगे।

हम भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जयप्रकाश नारायण और अन्ना हजारे के अल्पकालिक आंदोलनों पर निर्भर नहीं रह सकते। लोकपाल बिल गंदी और भ्रष्ट राजनीति को साफ करने की दिशा में एक कदम जरूर हो सकती है, लेकिन पूर्णकालिक समाधान के लिए हमें पुलिस और न्यायायिक व्यवस्था में ठोस सुधार करने के साथ-साथ व्यवस्था से खुद भ्रष्टाचार मिटाने वाली व्यवस्था अपनानी होगी।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर