सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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लोकप्रिय हिंदी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की कहानी और हाल में कानून का रुप लेने वाले कृषि विधेयकों के बीच एक अप्रत्याशित और मजेदार समानता है। यह समानता चुनने की आजादी से जुड़ी हुई है। फिल्म में नायिका अपने पसंद के इंसान के साथ जिंदगी बिताने की आजादी चाहती है और उसका कड़क मिजाज वाला पिता अपने हिसाब से उसके भले की सोचते हुए, उसे इस तरह की आजादी नहीं देना चाहता। हालांकि हमें पिता के इरादे नेक लग सकते हैं, उसकी सोच नायिका के लिए तकलीफें पैदा करती है। इसी तरह से बहुत सारे किसान अपने कृषि उपज के लिए खरीदार चुनने की आजादी चाहते हैं लेकिन

कृषि की दशा और किसानों की आर्थिक अवस्था में सुधार के उद्देश्य से देश में तीन नए कानून बनाए गए हैं। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है जहां कृषि

संतोष गानर महाराष्ट्र के तटीय इलाके में स्थित रायगढ़ में दो एकड़ जमीन के मालिक हैं। यह जगह अल्फांज़ो आम के लिए विख्यात है। इसके बावजूद उन्होंने अत्यधिक मुनाफा दिलाने वाले आम की बजाय सस्ता चावल उगाने का विकल्प चुना है। जब मैंने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी आम उगाना पसंद है। चावल की खेती से उन्हें प्रति एकड़ 30 हजार रूपये ही प्राप्त होते हैं जबकि आम उगाने से उन्हें इससे दस गुना अधिक आय हो सकती है। लेकिन वह इस काम के लिए आवश्यक आरंभिक निवेश को वहन नहीं कर सकते थे, न ही वे पेड़ से फल प्राप्त करने के लिए पांच साल तक की

एक पुरानी कहावत है - अमेरिकी लोगों की बुद्धिमता को कम आंक कर किसी का आर्थिक नुकसान नहीं हुआ अर्थात अमेरिकियों को आसानी से फुसलाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। यदि आप इस पर आगे विचार करें तो उन्हें अधिक बुद्धिमान आंकना संभवतः ज्यादा कारगर होगा। यदि आप इस विषय पर और अधिक विचार करें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति सभी लोकतंत्रों के साथ है। और यदि आप में थोड़ा अधिक धैर्य है और आप और अधिक विचार करते हैं तो आप पाएंगे कि कहावत में ‘अमेरिकी लोगों’ के स्थान पर ‘भारतीय लोग’ ज्यादा सटीक बैठता है। विशेषकर वर्तमान में जारी उन बहसों के परिपेक्ष्य में जो बहु प्रतीक्षित

किसानों का एक तबका आंदोलन कर रहा है, जो झूठे प्रचारों के द्वारा गुमराह हैं। जबकि दूसरी तरफ खेती किसानी करने वाले बहुसंख्यक किसान जो कि दलित और गरीब हैं, अपनी अनुपस्थित के साथ सुस्पष्ट हैं।

वर्ष 2019 की अप्रैल की शुरुआत में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने ‘किसानों की आजादी के लिए घोषणा पत्र’ (फारमर्स मेनिफेस्टो फॉर फ्रीडम) जारी किया। यह एक प्रगतिशील दस्तावेज था जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रिटिश औपनिवेशक कानूनों से स्वतंत्रता प्राप्त होने के सात दशकों के बीत जाने के बाद भी किसान, जो

एक तरफ जहां ये संगठन कृषि कानूनों का समर्थन करता है, वहीं इसने प्याज के निर्यात पर रोक को तत्काल समाप्त करने की मांग की है। इसने चेतावनी दी है कि यदि केंद्र सरकार उनकी इस मांग को नहीं मानती है तो वे बीजेपी के सांसदों पर प्याज फेंकेंगे।

 

सोमवार को कुछ किसान संगठनों ने कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की और उन तीन कृषि कानूनों के प्रति अपना समर्थन प्रदर्शित किया जिनके विरोध में हजारों किसान दिल्ली की सीमा पर प्रदर्शन कर रहे हैं। तोमर से

देश में बिजनेस के क्षेत्र में आंत्रप्रेन्योरशिप की तर्ज पर कृषि के क्षेत्र में फार्मप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है। एमएसपी और उसकी दर को लेकर राजनीति और विवाद हमेशा चलते रहेंगे लेकिन यदि समस्या का हमेशा के लिए समाधान तलाशना है तो इस क्षेत्र में भी उद्यमिता को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी है। ऐसा कृषि कार्य में तकनीक और उद्यमिता का मेल करके किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस देश में किसान को अबतक बाजार का विश्लेषण करने और उसके आधार पर जोखिम लेते हुए फसल पैदा करने और बाजार में बेचकर उसका पुरस्कार प्राप्त करने में अक्षम

'किसान दिवस' पर पुरूष किसानों की चर्चाएं होती हैं। जबकि, चर्चाओं की हक़दार महिला किसान भी हैं। खेती के कामों में दिया जाने वाले उनके नियमित योगदान को कमत्तर आंका जाता है। जनगणना 2011 के मुताबिक समूचे हिंदुस्तान में तकरीबन 6 करोड़ के आसपास महिला किसानों की संख्या बताई गई है। लेकिन धरातल पर उनकी संख्या कहीं ज्यादा है। बीते एकाध दशकों से ग्रामीण इलाकों के पुरूषों विशेष कर युवाओं का रुझान खेती बाड़ी के बजाय नौकरियों व व्यापार में ज्यादा बढ़ा है। उनके नौकरियों या व्यापार में चले जाने के बाद खेती बाड़ी की पूर्णता ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर ही

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