सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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मुफ्त बिजली, अत्यधिक सब्सिडाइज्ड यूरिया और खुली खरीद के खतरनाक मिश्रण से पंजाब की प्राकृतिक संपदा समाप्त हो रही है।

वर्ष 1991 में भारत में हुए सुधारों के दौरान कृषि को इससे दरकिनार कर दिया गया। कृषि और खाद्य आधारित नीतियां ‘गरीबों के संरक्षण’ के नाम पर उपभोक्ता केंद्रीत ही बनीं रही। 

यदि मैं ये कहूं कि भारतीय कृषि में अगले 15 से 20 वर्षों के दौरान उत्पादन की वर्तमान क्षमता से दो गुने या तीन गुने तक की वृद्धि की क्षमता है तो अनेक लोग इसे हंसी में उड़ा देंगे। लेकिन सच्चाई यही है कि

सुधार की राह कभी भी आसान नहीं रही है। कड़े और संरचनात्मक सुधार के कारण चुनाव के दौरान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है किंतु आपदा सदैव अपने साथ परिवर्तन के अवसर लेकर आती है और महामारी ने भी केंद्र सरकार को सुधार का ऐसा ही अवसर प्रदान किया है।

उदाहरण के लिए, 1991 का उदारीकरण भी उस समय देय राशि के संबंध में उत्पन्न हुए भुगतान संकट की पृष्ठभूमि में पारित किया गया था। यह भारत के आधुनिकीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव बड़ा समर्थन खो बैठे।

नजरियाः प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों के लिए 75% आरक्षण के कानून का असर बाकी राज्यों पर भी पड़ेगा

भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। अपनी सहयोगी जननायक जनता पार्टी के दबाव में उसने प्राइवेट सेक्टर में हरियाणवियों के लिए प्राइवेट नौकरियों में 75% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। कानून 50 हजार रूपये प्रतिमाह से कम कमाने वालों पर लागू होगा। उद्योगों को डर है कि नया कानून हरियाणा को गैर-प्रतिस्पर्धी और व्यापार के लिए अनाकर्षक बना देगा। इससे स्थानीयों को नौकरी मिलने की

दिल्ली के बॉर्डर पर पिछले 100 दिनों से जारी किसान आंदोलन के बीच राजनैतिक दलों और राज्य सरकारों के बीच भी सियासी प्रतिस्पर्धा जारी है। यह प्रतिस्पर्धा स्वयं को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की है। किसानों (वोट) को अपने साथ लाने के लिए पहले पंजाब सरकार और उसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा संशोधित कृषि कानून लाए गए। इन कानूनों का उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के कारण किसानों के होने वाले ‘नुकसान’ को कम करना है। आज बात करते हैं राजस्थान सरकार द्वारा पारित तीन कृषि संशोधन विधेयकों की।

क्या हम कृषि के क्षेत्र में विकास करना चाहते हैं जो कि आर्थिक रूप से टिकाऊ भी हो, या फिर एमएसपी और एसएपी के वर्चस्व के कारण पैदा हुआ चावल, गेंहू और चीनी वाला झमेला?

नए कृषि कानून पारित किये जाने के मुद्दे पर भारत का लोकतंत्र अपने पूरे रौ में था। एक तरफ जहां सरकार इसे एक ऐतिहासिक फैसला बता रही थी, और मैं उससे सहमत होता प्रतीत हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने इसे ‘किसानों के लिए काला दिन’ और ‘कारपोरेट शार्क के हाथों बेच दिये जाने’ आदि के तौर पर प्रचारित

कोविड महामारी कई मायनों में दुनिया को स्थायी रूप से बदल देगी। जाहिर तौर पर, घर से काम करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि होगी। कार्य स्थल समाप्त तो नहीं होंगे लेकिन घर से होने वाले कार्यों की हिस्सेदारी काफी बढ़ जाएगी।

यह नियोक्ताओं के कार्यालय के लिए स्थान और आवश्यक सहायक सुविधाओं में बचत करेगा। इससे कर्मचारियों के पैसे, समय और कार्य स्थल पर आने जाने में लगने वाले समय में भी बचत होगी। हर मुद्दे पर होने वाली मीटिंग की जरूरतें भी कम होंगी। अधिक से अधिक लोगों को पार्ट टाइम या

लोकप्रिय हिंदी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की कहानी और हाल में कानून का रुप लेने वाले कृषि विधेयकों के बीच एक अप्रत्याशित और मजेदार समानता है। यह समानता चुनने की आजादी से जुड़ी हुई है। फिल्म में नायिका अपने पसंद के इंसान के साथ जिंदगी बिताने की आजादी चाहती है और उसका कड़क मिजाज वाला पिता अपने हिसाब से उसके भले की सोचते हुए, उसे इस तरह की आजादी नहीं देना चाहता। हालांकि हमें पिता के इरादे नेक लग सकते हैं, उसकी सोच नायिका के लिए तकलीफें पैदा करती है। इसी तरह से बहुत सारे किसान अपने कृषि उपज के लिए खरीदार चुनने की आजादी चाहते हैं लेकिन

कृषि की दशा और किसानों की आर्थिक अवस्था में सुधार के उद्देश्य से देश में तीन नए कानून बनाए गए हैं। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है जहां कृषि

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