प्रतिबंध समस्या का समाधान नहीं समस्या को बढ़ाने वाला कारक है (भाग दो)

उदाहरण के लिए चीनी व्स्तुओं पर प्रतिबंध उनकी घटिया गुणवत्ता व इसके अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए लगाया गया है। लेकिन भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं और खिलौनों आदि में प्रयुक्त रंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों को कैंसर, दिल व फेफड़े की बीमारी हो रही है। क्या ही अच्छा होता कि चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाए लेकिन इसके पूर्व उनके लिए कड़े मानक तय कर दिए जाएं और उनका अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। इससे देश को कई फायदे होंगे। एक तो प्रतिबंध समाप्त होने के कारण चीनी सामान वैध तरीके से कस्टम व आयात शुल्क अदा कर देश में पहुंचेंगे जिससे सरकार की आय भी बढ़ेंगी। चूंकि वर्तमान में चीनी सामान अवैध रूप से भारतीय बाजार में पहुंचते हैं इसलिए इसकी खराब गुणवत्ता के लिए किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन यदि चीनी उत्पादकों को भारतीय बाजार में अपने उत्पादों को बेचने की अनुमति दे दी जाएगी तो उन्हें मानक का ध्यान रखना अवश्यंभावी हो जाएगा। सबसे ज्यादा फायदा उपभोक्ताओं को होगा जिसे सामान सस्ता और हानि रहित प्राप्त हो सकेगा।

इसी प्रकार, संरक्षित जानवरों के शिकार को यदि रोकना है तो सबसे जरूरी काम यह है कि उक्त संरक्षित क्षेत्र से विस्थापित हुए लोगों के पुर्नवास व रोजी रोटी की व्यवस्था की जाए। कई मामलों में देखा गया है कि विस्थापित स्थानीय लोगों के पास चूंकि रोजी रोटी का संकट पैदा हो जाता है, वे आसानी से शिकारियों के चंगुल में फंस जाते हैं और शिकारियों से मिलने वाले थोड़े बहुत पैसों के लिए जानवरों को मार देते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि वन रक्षकों की उपस्थिति के बावजूद यदि कोई सफलता पूर्वक शिकार कर सकता है तो वह उक्त क्षेत्र की अति सूक्ष्मतम जानकारी रखने वाला ही कर सकता है। जो जानवर की हर गतिविधि और उसके आचरण आदि से परिचित हो। इसके अलावा विस्थापित लोगों के मन में इस मानसिकता के घर करने से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि चूंकि जानवरों के संरक्षण के कारण ही उन्हें विस्थापित होना पड़ा है तो न जानवर होंगे और ना उन्हें विस्थापित होना पड़ेगा। समाधान के तौर पर यदि पर्यटन पर प्रतिबंध न लगाकर उसे और प्रोत्साहित किया जाए और विस्थापितों को ही उक्त क्षेत्र की रखवाली और पर्यटन सेवा (ठहरने, खाने पीने व अन्य सामानों) के इंतजाम की जिम्मेदारी दे दी जाए तो उनके पास न केवल आय का जरिया होगा बल्कि उन्हें जानवरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रेरणा भी मिलेगी।

अब सबसे महत्वपूर्ण बात, शराब, गुटखा व प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की। वर्ष 1996 में हरियाणा की तत्कालिन हरियाणा विकास पार्टी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद पहला काम वहां शराब के उत्पादन, बिक्री व सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया। नियम का उल्लंघन करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान भी किया गया। जबकि इसके पूर्व मुंबई (तत्कालीन बांबे) में मोरारजी देसाई की सरकार ऐसा ही प्रतिबंध लगा चुकी थी जिसके परिणामस्वरूप वहां शराब के अवैध कारोबार की बाढ़ सी आ गई। कुछ ऐसा ही गुजरात में भी हुआ जहां मुंबई की तर्ज पर ही 1960 से ही शराबबंदी का कानून लागू है। यहां तो अवैध शराब के कारोबार पर मृत्युदंड तक का प्रावधान है। लेकिन सर्वविदित है कि शराब का अवैध कारोबार वहां के लिए बड़ी ही आम बात है और उपर से नीचे तक लोग मुनाफाखोरी में लिप्त हैं। उधर, सरकार को जहां करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि होती है वहीं शराब पीने वालों की जान पर भी बनी होती है। हरियाणा में भी कुछ ऐसा ही हुआ। हरियाणा विकास पार्टी की सरकार के कार्यकाल के दौरान शराबबंदी नियम के कारण प्रदेश सरकार पहले वर्ष ही 12,00 करोड़ रूपए के राजस्व का नुकसान हुआ। 20 हजार लोग बेरोजगार हुए। 40 हजार ट्रक मालिकों की आय पर बुरा प्रभाव पड़ा और 1 लाख लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गई और 98,699 मामले दर्ज हुए। 13 लाख बोतल व 7 हजार वाहन जब्त किए गए। परिणाम स्वरूप सरकार की वित्तिय हालत इतनी नाजुक हो गई कि क्षतिपूर्ति के लिए बस के किरायों में 25%, बिजली में 10-50% व पेट्रोल की कीमतों में 3% तक वृद्धि करनी पड़ी। व्यापारियों और व्यवसायियों पर अतिरिक्त कर लगाए गए फिर भी नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकी। प्रदेश में जहरीली शराब पीने से होने वाली मौतें बढ़ गई और पर्यटन बुरी तरह धराशायी हो गया। कुछ ऐसा ही हाल मणिपुर, लक्षद्वीप, मिजोरम व नागालैंड का भी हुआ जब वहां शराब की खरीद बिक्री और सेवन पर पाबंदी लगाई गई।

यही हाल गुटखा प्रतिबंध का भी हुआ। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, केरल, मध्य प्रेदश, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, मिजोरम आदि 16 राज्यों व 3 केंद्र शासित प्रदेशों में हाल फिलहाल गुटखा के उत्पादन, संग्रहण व खरीद-बिक्री पर रोक लगा दिया गया है। नियम की अवहेलना करने वालों पर 6 महीने से 3 साल तक की जेल व खरीद-बिक्री करने वालों पर 25 हजार रूपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है। हालांकि इस कड़े प्रतिबंध का क्या हश्र हो रहा है यह सबके सामने है। दिल्ली सहित प्रतिबंध लागू करने वाले सभी राज्यों के सभी शहरों में गुटखा न केवल उपलब्ध है बल्कि पूर्ववत यह लोगों को आसानी से प्राप्त भी हो रजा है। हां, इतना फर्क अवश्य है कि अब गुटखे की कीमत में चार से पांच सौ प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है। यह वृद्धि लागत मूल्य के बढ़ने से नहीं बल्कि मुनाफाखोरों और कालाबाजारियों के कारण हुई है। चोरी छुपे गुटखे की बिक्री करने वाले मोटी कमाई कर रहें है, जबकि अब इनकी गुणवत्ता पर किसी का नियंत्रण भी नहीं रह गया है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि कैंसर व गुटखा जनित बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या में पूर्व की अपेक्षा वृद्धि देखने को मिले।

जारी....

- अविनाश चंद्र