देश में लाइसेंस राज की वापसी जैसे बन रहे हालात

यह सोचकर कितना अजीब लगता है कि देश में कुछ वर्ष पूर्व (लगभग एक दशक) पहले तक यदि किसी को टेलीफोन कनेक्शन लेना होता था तो उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। टेलीफोन के लिए आवेदन फार्म हासिल करने से लेकर भरे आवेदन पत्र भरकर जमा कराने, अपने नंबर का इंतजार करने, घर में फोन लग जाने में दो से तीन साल तक लग जाया करते थे। इतना ही नहीं दो-तीन साल बाद भी नंबर तब आता था जब फार्म देने वाले बाबू से लेकर अधिकारी तक की मुट्ठी गर्म नहीं की जाती थी। इसके बाद भी जबतक कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर रसूखदार लोगों के पत्र आप की सिफारिश करते विभाग तक न पहुंचे थे, तबतक घर में फोन की घंटी बजना लगभग असंभव था। कोढ़ में खाज की स्थिति यह कि फोन महीने में 20 दिन खराब (डेड) ही रहता था। खराब फोन को ठीक कराने के लिए विभाग में कम्पलेन देने व स्थानीय लाइनमैन की तलाश में हफ्ता तो यूं निकल जाता था जैसे कुछ घंटे। लाइनमैन के भी तमाम नखरे अलग। जबतक दो चार दिन चाय पानी और कुछ मौद्रिक खातीरदारी न हो साहब कहां सुनने वाले हैं। किसी दिन मूड ठीक रहा और आप पे कृपादृष्टि हो गई तो अपने आप को धन्य मानिए। कुछ-कुछ ऐसी ही हालत स्कूटर (एकमात्र बजाज) या फिर कार (अंबेस्डर) खरीदने की चाह रखने वालों की होती थी। पैसा देकर एडवांस बुकिंग कराने के बाद भी लोगों के वाहन सुख हासिल करने का ख्वाब सालों तक पूरा नहीं हो पाता था। क्या कहा... दूसरी कार? भूल ही जाइए जनाब। एक कार वाले को दो कार रखने के अनैतिक ख्वाब का तो जिक्र ही करना वर्जित था। प्रत्येक परिवार पर वाहन का कोटा निश्चित हुआ करता था। यह हाल घरेलू गैस सिलेंडर के साथ भी था। गैस कनेक्शन लेना कुछ कुछ वैसा ही था जैसा छोटी मोटी जंग लड़ना। दरअसल, ऐसा देश में व्याप्त लाइसेंसी राज व्यवस्था व उत्पादों पर सरकारी नियंत्रण के कारण होता था। परिणाम स्वरूप डेढ़-दो दशक पूर्व शेयर सूचकांक यदि चार हजार के आसपास भी मंडरा जाता था तो हमे सावन के अंधे की तरह चहूंओर खुशहाली ही खुशहाली नजर आने लगती थी। आर्थिक विकास की दर 3-3.5 प्रतिशत तो बहुत हुआ करती थी।

भला हो, नब्बे के दशक की सरकार का जिसने भारी विरोधों के बीच  वैश्वीकरण व उदारीकरण के फलसफे को आंशिक तौर पर ही सही देश में लागू करने का साहस दिखाया। देसी बाजार का दरवाजा दुनिया के लिए खोल प्रगति की एक नई गाथी लिखी गई और कुछ वर्षों के भीतर ही आर्थिक स्थिति में परिवर्तन देखने को मिलने लगा। पहली बार शेयर सूचकांक पांच हजार अंक के पार पहुंचा और फीर छः, सात, आठ, नौ, दस... होते होते 16-17 हजार तक पहुंच गया। आर्थिक विकास की दर तीन से चार, फिर पांच, छः, सात, आठ... दस तक जा पहुंची। भारत की इस कुलांचे भरती प्रगति को देख दुनियां इसे अगली आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखने लगी। आज किसी भी चीज को कितनी भी मात्रा में खरीदने की सोचने भर की देरी होती है और वह चीज कई विकल्पों के साथ आपके समक्ष उपलब्ध होती है। गाड़ी, घर, मोबाइल फोन, लैपटाप बस एक पल में आपके समक्ष हाजिर है।

लेकिन... अफसोस! जिस वित्तमंत्री ने देश को इस मुकाम तक पहुंचाया था उसी के नेतृत्व की दूसरी सरकार के कार्यकाल में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनने लगीं कि लाइसेंस राज का दशकों पूराना दौर वापल लौटता नजर आने लगा। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला, सड़क घोटाला सहित तमाम ऐसे मामलों का खुलासा होने लगा जिसमें देशहित को ताख पर रखते हुए निजी स्वार्थों के वशीभूत मनचाहे लोगों को लाइसेंस का आवंटन किया गया। सरकार के साथ यूनीनार, वोडाफोन आदि के विवादों ने देश तो देश, विदेशों में भी भारत की साख पर बट्टा लगाने का काम किया। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों में व्यवसाय करने व उद्योग आदि स्थापित करने वाले मनपसंद देशों की सूची में भारत की स्थिति बद से बदतर होने लगी। भ्रष्टाचार के कारण उद्यमियों को उद्योग स्थापित करने के लिए कम्यूनिस्ट चीन, उदार भारत से ज्यादा बेहतर लगने लगा। यहां तक कि देश के वर्तमान राजनैतिक और आर्थिक हालात को देख विश्वस्तर पर इसके लाइसेंसी राज के दौर में  लौटने की भविष्यवाणी होने लगी है।

हाल ही में लंदन से प्रकाशित होने वाले प्रमुख आर्थिक अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है भारतीय अर्थव्यवस्था की सुइयां अब 70 के दशक की ओर उल्टी दिशा में अग्रसर हो रही है। अखबार लिखता है कि चार दशक पहले लालफीताशाही में जकड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर चार प्रतिशत के इर्द-गिर्द थी और इसे हिंदू ग्रोथ रेट की संज्ञा दी जाती थी। ऐसे हालात की ओर वापसी भारत का पराभव होगी, जिसे पश्चिमी और क्षेत्रीय देश चीन के प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते हैं। ब्रिटिश अखबार भारत की मौजूदा स्थिति के लिए मनमोहन सरकार के कड़े फैसले लेने में अक्षमता को प्रमुख कारण मानता है। जबकि राजनैतिक विश्लेषक इस स्थिति के लिए सोनिया गांधी की नीतियों व हस्तक्षेप को भी जिम्मेदार मानते हैं जो अपने आर्थिक मॉडल स्वयं तैयार करते हैं। एक बैंक अधिकारी के अनुसार, आज भारत को ब्रिटेन के वित्तमंत्री जार्ज ओस्बर्न की जरूरत है और ब्रिटेन को प्रणब मुखर्जी की।

प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा के हवाले से अखबार कहता है कि मनमोहन सिंह के बारे में विदेशों में राय और देश में उनकी लोकप्रियता के बीच कोई साम्य ही नहीं है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस के शंकर आचार्य चेतावनी भरे अंदाज में कहते हैं कि आर्थिक वृद्धि दर सात फीसदी से नीचे पहुंच गई है। औद्योगिक वृद्धि दर करीब करीब धराशायी हो चुकी है। कुल निवेश दर जीडीपी की 34 फीसदी तक गिर गई है। राजकोषीय घाटा और सब्सिडी पूरी तरह नियंत्रण से बाहर है। एक अन्य विश्लेषक कहते हैं कि करीब आठ साल के कांग्रेस शासनकाल में देश में आर्थिक सुधारों का माहौल लगभग पूरी तरह बदल चुका है। पिछले साल रिटेल और छोटे उद्योगों में शुरू किए गए सुधारों को राजनीतिक विरोध के चलते वापस लेना पड़ा। इसके अलावा इस साल सरकार और ब्रिटिश कंपनी वोडाफोन के बीच टैक्स विवाद ने भी निवेशकों के बीच सरकार की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। विदेशी निवेशकों का भी मानना है कि सरकार के इस तरह के आचरण ने भारत को कांगो जैसे छोटे से देश की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। सुधार के लिए प्रयासरत दिनेश त्रिवेदी का रेल मंत्री के पद से इस्तीफा लिए जाने को भी आलोचक गलत मानते हैं। उनका कहना है कि दशक भर में पहली बार किसी रेल मंत्री ने रेल किरायों में सब्सिडी घटाने का साहस किया था। इसके अलावा सेना और सरकार के बीच मतभेदों को सरकारी की नाकामी के रूप में देखा जा रहा है। अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की टिप्पणी है कि सरकार कुछ इस तरह आचरण कर रही है, मानो भारत में कोई बदलाव ही न हुआ हो।

- अविनाश चंद्र