जिम्मेदार आज़ादी सर्वोच्च सभ्यता की निशानी है

जब हम अपनी आज़ादी का उपयोग जिम्मेदारी से करते हैं, तब हमें पता चलता है कि वास्तव में हम कुछ अलिखित नियमों तथा शर्तों से बंधे हुए हैं। हमें पता चलता है कि हम कुछ भी अंधाधुंध करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।

मेरे गुरु महर्षि अमर ने हमें समझाया था कि हमें इच्छा-स्वातंत्र्य का वरदान मिला हुआ है। हम कुछ भी यहां तक कि गलत चुनने के लिए भी स्वतंत्र हैं। हम कभी गलत चीजों का चुनाव करते हैं, गलतियां करते हैं, असफल होते हैं। किंतु हम सीखते हैं और बदलते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सत्य है, जिसे हमें समझना होगा।

मैं स्वतंत्रता में, व्यक्ति-स्वातंत्र्य में विश्वास रखता हूं। सभी जागरूक लोग इसमें विश्वास रखते हैं। व्यक्ति-स्वातंत्र्य सभ्यता की, आध्यात्मिकता की निशानी है। हमें दूसरों को आज़ादी के साथ अभिव्यक्त होने देना चाहिए, उन्हें उनके अपने तरीके से जीने देना चाहिए तथा सोच-विचार करने के, आत्मोन्नति के नए मार्गों की खोज करने देना चाहिए। जो लोग चेतना के ऊंचे स्तर पर होते हैं वे लोग अपनी आज़ादी का प्रयोग यह ध्यान में रखकर करते हैं कि उससे दूसरों की आज़ादी में दखलअंदाजी न हो। वे दूसरों को, उनकी भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाते।

जब हम अपनी आज़ादी का उपयोग जिम्मेदारी से करते हैं, तब हमें पता चलता है कि वास्तव में हम कुछ अलिखित नियमों तथा शर्तों से बंधे हुए हैं। हमें पता चलता है कि हम कुछ भी अंधाधुंध करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। हमें दूसरों की स्वतंत्रता तथा उनकी भावनाओं का आदर करना होगा। हमें विश्व के नियमों का आदर करना होगा। आज़ादी के साथ जिम्मेदारी भी आती है। जिम्मेदार आज़ादी सर्वोच्च सभ्यता की निशानी है।

मेरे लिए सभ्यता तथा आध्यात्मिकता में कोई फर्क नहीं है। सहिष्णुता, शांतिपूर्ण असहमति तथा प्रदर्शन और दूसरों की आज़ादी का आदर, परिपक्व लोकतंत्र की निशानी हैं। यह सभी आध्यात्मिकता में समाविष्ट हैं। हम जैसे-जैसे समय पथ पर आगे नवयुग की ओर बढ़ेंगे, एक नई सभ्यता विकसित होगी। बढ़ती जागरूकता को हम अब भी देख सकते हैं। मैं उच्च बिंदु से इसे देख सकता हूं। मेरी आशा केवल पवित्र इच्छा पर आधारित नहीं है। मुझे जो भविष्य दिख रहा है, वह मेरी आशा का कारण है।

हम ऐसे समय में से गुजर रहे हैं, जब लोगों के अंतकरण में उथल-पुथल मची हुई है। हम महान बदलाव की प्रक्रियाओं में से गुजर रहे हैं। मुझे पता है कि ये प्रक्रियाएं कष्टदायक हैं। इस समय लोगों में उलझन तथा निराशा होना स्वाभाविक है। किंतु हमें आशा का त्याग नहीं करना चाहिए। हमें सत्ताधारियों से बदलाव लाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें दोष देकर रोते रहने की बजाए हमें अपनी व्यक्तिगत प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हमें उच्च सभ्यता को विकसित करना होगा। हमें ज्यादा आध्यात्मिक बनना होगा। हमें अपनी ध्यान साधना तथा शुद्ध इच्छा के द्वारा बदलाव की ऊर्जाओं को लाना होगा। हम ही रचनाकार हैं। हम ही भविष्य हैं। मेरे गुरु महर्षि अमर एक महान काल-प्रवासी थे। उन्होंने हमें बताया था कि कलियुग का अंत हो चुका है तथा हम नव-युग की ओर संक्रमण कर रहे हैं। नव-युग अब बहुत दूर नहीं है।

आत्मोन्नति का वैज्ञानिक तरीका है जिज्ञासा, प्रश्न खड़े करना। यह अज्ञात में खुले दिमाग की खोज है। कुछ भी आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करना है और न ही ठुकराना है। यहीं पर महाभूल होती है। वे अज्ञात को तब ठुकरा देते हैं, जब शैशव अवस्था के विज्ञान का छोटा फोकस इसे पकड़ नहीं पाता। अांख मूंदकर विश्वास ठीक नहीं है पर अांख मूंदकर हर चीज ठुकराना भी गलत है। किसी चीज को स्वीकार या खारिज किए बगैर खुले दिमाग से जांच करना विज्ञान का तरीका है। भौतिक आंखें ही एकमात्र ऐसी इंद्रीय नहीं है। अन्य आंखों को खोलना सच्चे अर्थों में तार्किक होने की ओर पहला कदम है।

- गुरुजी कृष्णानंद मानसा फाउंडेशन, बेंगलुरू

साभारः दैनिक भास्कर

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