सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को लेकर जब भी हमारे देश में राज्य सरकारों से जबाव तलब किया जाता है तो उनका दावा होता है कि उनके यहां अब यह समस्या बिल्कुल नहीं। इस कुप्रथा का नामो निशान मिट गया है और इन सफाई कर्मियों का उन्होंने अपने यहां पूरी तरह पुनर्वास कर दिया है, लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई और कितना झूठ है, यह हाल ही में हमारे सामने निकलकर आया। साल 2011 की जनगणना के आंकड़े इन दावों की हवा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 50 फीसद भारतीय खुले में शौच को जाते हैं और 13 लाख ऐसे अस्वच्छ शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी साफ-सफाई का जिम्मा आज भी घोषित और अघोषित रूप से

“नरेला इलाके में घर के बाहर खेल रही 6 साल की बच्ची को बहला फुसलाकर पड़ोसी ने किया बलात्कार। अजमेरी गेट इलाके की 14 वर्षीय छात्रा के साथ अध्यापक द्वारा चार साल से किये जा रहे यौन शोषण मामले का सनसनीखेज खुलासा। सफदरजंग अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए देररात महिला वार्ड में घुसकर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार का प्रयास। मुंडका में नाबालिक युवती के साथ पड़ोसी द्वारा बलात्कार। उत्तर पश्चिम जिले के महेंद्र पार्क में रूई मांगने के बहाने सर्वोदय विद्यालय की नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ पड़ोसी युवक द्वारा बलात्कार।“

लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिंग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियंत्रण हो, तब भी अदालतों पर तो उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा। निचली अदालतों में अनेक कारणों और अनेक तरीकों से अदालती मामलों को लंबित किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है। जैसा कि एक पुरानी कहावत भी है :

बीते शनिवार को एक जैसे दो समाचार आए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में चार साल की सजा सुनाई गई। इसके अलावा दिल्ली के एक पूर्व न्यायाधीश गुलाब तुलस्यानी को दो हजार रुपये की घूस के बदले तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया। पहले मामला का निपटारा 11 साल बाद हुआ और दूसरे का 26 साल बाद। दोनों ही मामलों में फैसला सीबीआइ की विशेष अदालतों ने सुनाया। इसी दिन यह स्पष्ट हो गया कि इन दोनों मामलों को ऊंची अदालतों में चुनौती दी जाएगी यानी अभी अंतिम फैसला आना शेष है। कोई नहीं जानता कि यह कब होगा, लेकिन अंतत: न्याय का चक्र घूमा और भ्रष्ट तत्वों

आजादी के 6 दशक बीत जाने के बाद भी देश से अस्पृश्यता मिटने का नाम नहीं ले रही है। देश में अब भी ऐसी तमाम जगहें हैं जहां प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दलितों व गैर दलितों के बीच भेदभाव जैसी कुरीति मौजूद है। यह तो तब है जबकि सरकार अस्पृश्यता के मामलों पर जीरो टालरेंस की नीति अपनाए हुए है। वोट बैंक की राजनीति के लिए ही सही सभी राजनैतिक पार्टियां भी अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुटी रहती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी दलितों को समाज में बराबरी के हक के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। कम से कम हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के पंडोह क्षेत्र के चंद

सुप्रीम कोर्ट ने न्याय पाने के अधिकार को मूल अधिकार बताते हुए अदालत जाने के अधिकार को इसका हिस्सा माना है। इस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी पहल की है। बीते ३१ जनवरी को सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर दिए गए निर्णय के बहुत दूरगामी परिणाम होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज में रहना आम जनता का मूल अधिकार है। इसलिए उसे हासिल करने के लिए अदालत में जाना और न्याय प्राप्त करना भी उस मूल अधिकार का हिस्सा है। स्वामी ने केंद्र सरकार को एक प्रत्यावेदन देकर पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत मुकदमा

सितंबर की उस तपती हुई दोपहर को जब मुख्य और जिला सत्र न्यायाधीश एस कुमारगुरु ने निर्णय सुनाना शुरू किया, तब धर्मपुरी (तमिलनाडु) के उस खचाखच भरे कोर्टरूम में खामोशी पसरी हुई थी। न्यायाधीश ने 3.30 बजे निर्णय सुनाना प्रारंभ किया था, लेकिन यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे तक जारी रही, क्योंकि उन्हें उन 215 सरकारी अधिकारियों के नाम पढ़कर सुनाने थे, जिन्हें दोषी ठहराया गया था। उन 12 अधिकारियों को 17 वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुनाई गई थी, जिन पर यौन दुराचार का आरोप था।

शेष 5 दुराचारियों को सात-सात साल की सजा सुनाई गई। अन्य व्यक्तियों को विभिन्न आरोपों में

सर्वोच्च न्यायालय के प्रबल समर्थक निश्चित तौर पर उसे यह श्रेय देंगे कि बीते तीन दशकों के दौरान उसने तीन क्रांतिकारी बदलावों की शुरुआत की। पहला था 1980 के दशक में जनहित याचिका से जुड़ा आंदोलन जिसने देश के हर नागरिक के लिए अदालत के दरवाजे खोले, खासतौर पर उन लोगों के लिए जो अपनी गरीबी, निरक्षरता और पिछड़ेपन के कारण ऐसा करने में असमर्थ थे। लगभग उसी समय न्यायालय ने अपने कुछ फैसलों के जरिए नागरिक अधिकारों की शुरुआत की जो आगे चलकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का आधार बना। तीसरी लहर थी भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र की स्थापना की. इसका अंकुरण भी अदालती कक्षों में हुआ जब हवाला

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