सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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बीते शनिवार को एक जैसे दो समाचार आए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में चार साल की सजा सुनाई गई। इसके अलावा दिल्ली के एक पूर्व न्यायाधीश गुलाब तुलस्यानी को दो हजार रुपये की घूस के बदले तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया। पहले मामला का निपटारा 11 साल बाद हुआ और दूसरे का 26 साल बाद। दोनों ही मामलों में फैसला सीबीआइ की विशेष अदालतों ने सुनाया। इसी दिन यह स्पष्ट हो गया कि इन दोनों मामलों को ऊंची अदालतों में चुनौती दी जाएगी यानी अभी अंतिम फैसला आना शेष है। कोई नहीं जानता कि यह कब होगा, लेकिन अंतत: न्याय का चक्र घूमा और भ्रष्ट तत्वों

आजादी के 6 दशक बीत जाने के बाद भी देश से अस्पृश्यता मिटने का नाम नहीं ले रही है। देश में अब भी ऐसी तमाम जगहें हैं जहां प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दलितों व गैर दलितों के बीच भेदभाव जैसी कुरीति मौजूद है। यह तो तब है जबकि सरकार अस्पृश्यता के मामलों पर जीरो टालरेंस की नीति अपनाए हुए है। वोट बैंक की राजनीति के लिए ही सही सभी राजनैतिक पार्टियां भी अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुटी रहती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी दलितों को समाज में बराबरी के हक के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। कम से कम हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के पंडोह क्षेत्र के चंद

सुप्रीम कोर्ट ने न्याय पाने के अधिकार को मूल अधिकार बताते हुए अदालत जाने के अधिकार को इसका हिस्सा माना है। इस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी पहल की है। बीते ३१ जनवरी को सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर दिए गए निर्णय के बहुत दूरगामी परिणाम होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज में रहना आम जनता का मूल अधिकार है। इसलिए उसे हासिल करने के लिए अदालत में जाना और न्याय प्राप्त करना भी उस मूल अधिकार का हिस्सा है। स्वामी ने केंद्र सरकार को एक प्रत्यावेदन देकर पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत मुकदमा

सितंबर की उस तपती हुई दोपहर को जब मुख्य और जिला सत्र न्यायाधीश एस कुमारगुरु ने निर्णय सुनाना शुरू किया, तब धर्मपुरी (तमिलनाडु) के उस खचाखच भरे कोर्टरूम में खामोशी पसरी हुई थी। न्यायाधीश ने 3.30 बजे निर्णय सुनाना प्रारंभ किया था, लेकिन यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे तक जारी रही, क्योंकि उन्हें उन 215 सरकारी अधिकारियों के नाम पढ़कर सुनाने थे, जिन्हें दोषी ठहराया गया था। उन 12 अधिकारियों को 17 वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुनाई गई थी, जिन पर यौन दुराचार का आरोप था।

शेष 5 दुराचारियों को सात-सात साल की सजा सुनाई गई। अन्य व्यक्तियों को विभिन्न आरोपों में

सर्वोच्च न्यायालय के प्रबल समर्थक निश्चित तौर पर उसे यह श्रेय देंगे कि बीते तीन दशकों के दौरान उसने तीन क्रांतिकारी बदलावों की शुरुआत की। पहला था 1980 के दशक में जनहित याचिका से जुड़ा आंदोलन जिसने देश के हर नागरिक के लिए अदालत के दरवाजे खोले, खासतौर पर उन लोगों के लिए जो अपनी गरीबी, निरक्षरता और पिछड़ेपन के कारण ऐसा करने में असमर्थ थे। लगभग उसी समय न्यायालय ने अपने कुछ फैसलों के जरिए नागरिक अधिकारों की शुरुआत की जो आगे चलकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का आधार बना। तीसरी लहर थी भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र की स्थापना की. इसका अंकुरण भी अदालती कक्षों में हुआ जब हवाला

कुछ साल पहले मैंने इसी कॉलम में इस बात पर बड़ा आश्चर्य जताया था कि कैसे अमरिका के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें सजा भी मिल जाती है, लेकिन भारत में ऐसे ही अपराधों में शामिल व्यवसायी आसानी से बच जाते हैं। भारत में दरअसल भ्रष्ट राजनेताओं ने पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को इस तरह से अपंग बना दिया है कि तमाम स्तर की सुनवाइयों के बाद भी उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि इस तरह का सड़ा हुआ सिस्टम धूर्त उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार नहीं होने देगा, क्योंकि किसी भी तरह का घपला इन दोनों की मिलीभगत से ही अंजाम दिया जाता

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भारत के पास लगातार सफल चुनाव संपन्न कराने का और एक मज़बूत व शांतिपूर्ण लोकतंत्र चलाने का अच्छा रिकॉर्ड है.  पिछले पचास सालों में कई देश जो लोकतान्त्रिक उम्मीदों के साथ जन्मे थे, समय के साथ तानाशाही ताकतों और सैन्य विद्रोहों का शिकार हो गए. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश के उदाहरण से ही पता चलता है कि लोकतंत्र चलाना कितना कठिन है. फिर भी भारत विगत कई सालों से परिस्थितियों के साथ लचीलापन रखते हुए लोकतान्त्रिक मान्यताओं को बनाये रखने में कामयाब रहा है.  लोग बड़ी तादातों में वोट करने आते हैं और समय के साथ

सन 2011 के अंतर्राष्ट्रीय संपत्ति अधिकार सूचकांक की हाल में ही घोषणा हुई जिसमें विश्व के 129 देशों के बौद्धिक और भौतिक संपत्ति अधिकारों को मापा गया है.

भारत स्थित सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी सहित विश्व के 67 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने इस बार वाशिंगटन डी सी स्थित 'प्रोपर्टी राईट्स अलाइंस' के साथ मिल कर इस पांचवे वार्षिक सूचकांक को पेश किया है.

संपत्ति अधिकार के क्षेत्र में भारत अभी भी पीछे है और काफी सुधार की संभावना है.  इस बार के सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 5.6 है और 129 देशों में उसकी रैंक 52 है. अगर क्षेत्रीय आंकड़ों की

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