सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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कुछ महीने पहले मुंबई के सबर्ब विलेपार्ले में पुलिस फुटपाथ को हॉकरों से खाली कराने की मुहिम चला रही थी। उसी दौरान डर से भाग रहे एक हॉकर की मौत हो गई। इसने शहर में एक बड़े विवाद का रूप ले लिया। सांसद प्रिया दत्त और एमएलए कृष्णा हेगड़े ने इस मृत्यु के लिए पुलिस की कार्रवाई को जिम्मेदार बताते हुए एक हॉकर पॉलिसी लागू करने की मांग की।

हर बड़े शहर में हॉकर फुटपाथ और सड़क घेर कर अपना धंधा करते हैं। और हर जगह पुलिस और म्युनिसपैलिटी वाले जब-तब इन हॉकरों को खदेड़ने की मुहिम चलाते हैं। हॉकरों की यह स्थिति मुंबई, दिल्ली, बेंगलूर

केंद्रीय सरकार ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के लिए इस कानून में जरूरी बदलाव लाने का निर्णय अगस्त 1 को ले लिया। इससे पहले विभिन्न प्रमुख राजनीतिक दलों पर इस विषय पर आम सहमति बनती नजर आई थी कि उन्हें सूचना के अधिकार की जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाए। इससे राजनीतिक दलों की पोल अच्छी तरह खुल गई है और देश के नागरिकों को पता चल गया है कि चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्षी दल, वे सभी अपने को पारदर्शिता से बचाना चाहते हैं। इससे पहले केंद्रीय सूचना आयोग ने इस बारे में तर्कसंगत फैसला दिया था कि सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत सार्वजनिक

यह देखना दयनीय है कि करीब-करीब हर मुद्दे पर मतभेद रखने वाले हमारे राजनीतिक दल इस पर एकजुट हैं कि राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून से बाहर रखा जाए। यह एकजुटता कितनी जोरदार है, इसका पता सूचना अधिकार कानून में संशोधन लाने के लिए पेश किए गए विधेयक से चलता है। इस पर गौर किया जाना चाहिए कि हमारे राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थो के लिए उस कानून को बदलने यानी कमजोर करने जा रहे हैं जिसे स्वतंत्रता के बाद सबसे प्रभावी कानूनों में से एक की संज्ञा दी गई है।

यह और कुछ नहीं संसद के बेजा और

अंतत: आठ साल चली लंबी लड़ाई के बाद महाराष्ट्र में डांस बार पर पाबंदी खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार पर प्रतिबंध खत्म करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को कायम रख सही फैसला दिया है। इसके पहले भी राज्यपाल ने प्रतिबंध संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। लेकिन राज्य सरकार पाबंदी लागू करने पर अड़ी रही और मध्यवर्ग की 75 हजार से ज्यादा युवतियां बेरोजगार हो गईं। इससे खराब बात तो यह हुई कि सरकार ने कोर्ट और मीडिया में उन पर जो अश्लील आरोप लगाए उनकी वजह से वे कोई दूसरा काम करने लायक नहीं रहीं। सरकार ने डांस बार को ऐसी जगह बताया जहां लोग लड़कियों से

 

राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दखल से लोग इतने नाराज हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट के दो हालिया फैसलों का स्वागत ही करेंगे। इनमें एक किसी भी सजा पाए व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकता है, भले ही उसने ऊंची अदालत में सजा के खिलाफ अपील कर रखी हो। दूसरा जेल में बंद व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाता है, फिर चाहे उन्हें अस्थायी तौर पर पुलिस या न्यायिक हिरासत में ही क्यों न रखा गया हो। दोनों फैसले कुछ अपराधियों को चुनाव से दूर रख सकते हैं, लेकिन उनके साथ यह जोखिम भी जुड़ा है कि कुछ इज्जतदार लोग भी इसके चलते चुनाव लड़ने से रह जाएं। कई बदमाश जेल से चुनाव जीते

 

खराब नीतियों द्वारा थोपे गए नुकसान भयानक हो सकते हैं, लेकिन टीवी के एंकरों का ध्यान इन पर कभी नहीं जाता। जनता की नजर भी इन पर तभी जाती है, जब कोई विशाल संख्या ऐसे नुकसानों के साथ नत्थी कर दी जाती है (मसलन 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक्स के मामले)। इन मामलों से जुड़ी संख्याएं बाद में बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई प्रतीत हुईं, लेकिन हर तरफ फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के गुस्से को आकार देने में इनकी एक भूमिका जरूर रही। दुर्भाग्यवश, खराब कानूनों और लालफीताशाही से होने वाले नुकसान को लेकर हमारे पास कोई आकलन ही नहीं है। ये चीजें आर्थिक सक्रियता की राह में

 

एक मामूली गरीब महिला है विजय कुमारी। उसकी कहानी इतनी आम है कि उसके बारे में आप न तो टेलीविजन के चैनलों पर सुनेंगे और न ही अखबारों में पढ़ेंगे।

बीबीसी पर पिछले दिनों अगर उसकी कहानी न दर्शाई गई होती, तो शायद मुझे भी उसके बारे में कुछ मालूम न होता, बावजूद इसके कि मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती कि हूं उन अनाम, रोजमर्रा की नाइंसाफियों के बारे में लिखने की, जो अदृश्य रह जाती हैं। तो सुनिए, विजय कुमारी की कहानी।

यह कहानी शुरू होती है कोई बीस साल पहले, जब विजय

 

सांप्रदायिक दंगों के मामलों में राजनेताओं सहित सभी दोषियों को दंड मिलने से हिंसा रुकने का रास्ता खुलेगा।

न्याय पाने की उम्मीद भी लुटा चुकेलोगों की सारी नजरें अब कुछ बड़े दिग्गज ‘परीक्षण मामलों’ पर टिकी हैं, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे वरिष्ठ राजनेता शामिल हैं। लोग मानते हैं कि इन्होंने नरसंहार करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया था।

जिला जज आर्यन ने जैसे ही कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को बरी करने का फैसला सुनाया, कोर्ट केभीतर बुरी तरह

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