सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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नजरियाः प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों के लिए 75% आरक्षण के कानून का असर बाकी राज्यों पर भी पड़ेगा

भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। अपनी सहयोगी जननायक जनता पार्टी के दबाव में उसने प्राइवेट सेक्टर में हरियाणवियों के लिए प्राइवेट नौकरियों में 75% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। कानून 50 हजार रूपये प्रतिमाह से कम कमाने वालों पर लागू होगा। उद्योगों को डर है कि नया कानून हरियाणा को गैर-प्रतिस्पर्धी और व्यापार के लिए अनाकर्षक बना देगा। इससे स्थानीयों को नौकरी मिलने की

संकट काल से गुजर रही भारतीय कृषि से जुड़ी आम राय के संदर्भ में कृषि कानूनों पर स्पष्ट मत विभाजन का विश्लेषण और बयानबाजी से आगे बढ़ने के संभावित तरीके।

देश का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र होने के बावजूद भारतीय कृषि आज की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक विनियमित, प्रतिबंधित और निषिद्ध क्षेत्र है। इन अड़चनों के बावजूद भारतीय किसानों ने देश को खाद्यान्नों के अभाव से अधिशेष की स्थिति में पहुंचा कर एक चमत्कार ही किया है। लेकिन इसे हासिल करने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है, क्योंकि आज इस क्षेत्र

सार: 138 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के किसी एक प्रांत अथवा राज्य में होने वाले आंदोलन की तीव्रता को पूरे देश की जनता इच्छा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

मान लिया कि एनडीए सरकार द्वारा लागू किये गए कृषि कानूनों के कारण बड़ी तादाद में किसान विशेषकर पंजाब और हरियाणा जैसे देश के उत्तरी राज्यों के किसान उद्वेलित हुए हैं लेकिन इन कानूनों को वृहद परिपेक्ष्य में देखने वालों का मानना है कि पार्लियामेंट द्वारा पारित इन विधेयकों को तैयार करने और लागू करने की सरकार की इस

कृषि की दशा और किसानों की आर्थिक अवस्था में सुधार के उद्देश्य से देश में तीन नए कानून बनाए गए हैं। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है जहां कृषि

क्या केंद्र और पंजाब सरकार किसानों की आय का एक स्थायी समाधान तलाशने और पानी, मिट्टी और हवा को बर्बाद होने से बचाने के लिए हाथ मिला सकते हैं? केवल ऐसा करके ही वे पंजाब को फिर से महान बना सकते हैं।

कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसान कंपकपाती सर्द रातों से जूझते हुए दिल्ली की सीमा पर आंदोलनरत हैं। उन्हें डर है कि नए कानून उनकी आय पर विपरीत प्रभाव डालेंगे। इसमें कोई गलत बात नहीं है क्योंकि प्रत्येक नागरिक अपनी मौजूदा आय को न केवल सुरक्षित रखना चाहता है बल्कि उसमें

एक पुरानी कहावत है - अमेरिकी लोगों की बुद्धिमता को कम आंक कर किसी का आर्थिक नुकसान नहीं हुआ अर्थात अमेरिकियों को आसानी से फुसलाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। यदि आप इस पर आगे विचार करें तो उन्हें अधिक बुद्धिमान आंकना संभवतः ज्यादा कारगर होगा। यदि आप इस विषय पर और अधिक विचार करें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति सभी लोकतंत्रों के साथ है। और यदि आप में थोड़ा अधिक धैर्य है और आप और अधिक विचार करते हैं तो आप पाएंगे कि कहावत में ‘अमेरिकी लोगों’ के स्थान पर ‘भारतीय लोग’ ज्यादा सटीक बैठता है। विशेषकर वर्तमान में जारी उन बहसों के परिपेक्ष्य में जो बहु प्रतीक्षित

किसानों का एक तबका आंदोलन कर रहा है, जो झूठे प्रचारों के द्वारा गुमराह हैं। जबकि दूसरी तरफ खेती किसानी करने वाले बहुसंख्यक किसान जो कि दलित और गरीब हैं, अपनी अनुपस्थित के साथ सुस्पष्ट हैं।

वर्ष 2019 की अप्रैल की शुरुआत में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने ‘किसानों की आजादी के लिए घोषणा पत्र’ (फारमर्स मेनिफेस्टो फॉर फ्रीडम) जारी किया। यह एक प्रगतिशील दस्तावेज था जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रिटिश औपनिवेशक कानूनों से स्वतंत्रता प्राप्त होने के सात दशकों के बीत जाने के बाद भी किसान, जो

अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास कृषि क्षेत्र में सुधार के एक बड़े पैरोकार हैं और मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों को काफ़ी हद तक सही मानते हैं. लेकिन 'इंडिया अनबाउंड' नाम की प्रसिद्ध किताब के लेखक के अनुसार प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं. वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा

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