जो चाहे वह करने की आजादी हो

पिछले पखवाड़े एक ही दिन दो खबरें आईं। दोनों इतनी विपरीत थीं कि मैं चकरा गया। दोनों खबरें लोकतांत्रिक संस्कृतियों से आई थीं। अखबारों में फोटो थे, जिनमें युवा लड़के-लड़कियों को पुलिस हिरासत में लेती दिखाई दे रही थी। ये किस ऑफ लव डे के बहाने विभिन्न संगठनों द्वारा नैतिक पुलिस बनकर उन्हें परेशान करने का विरोध कर रहे थे। यह हालत तब है जब उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन भी नहीं किया होता है।
 
कोझीकोड के एक कैफे से इसकी शुरुआत हुई, जिसमें प्रेम के खुले इजहार से क्रुद्ध एक गुट के लोगों ने तोड़-फोड़ की थी। जिस युगल पर हमला किया गया था, वह पुलिस के पास गया, लेकिन उसे वहां से भगा दिया गया। ऐसे मामले में अब तक यही होता आया है। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर किस ऑफ लव डे मनाना शुरू कर दिया। जैसा कि नाम से लगता है यह सार्वजनिक रूप से अशालीनता का कोई उत्सव नहीं है बल्कि उच्च नैतिकता का दावा करके हिंसा करने वाले मूर्खों का विरोध था। जिस दिन यह विरोध होेने वाला था, पुलिस ने युवाओं को इकट्‌ठा होने के पहले ही हिरासत में ले लिया। 
 
उसी दिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, जो शायद दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान है, ने उन सबको एक वर्कशॉप के लिए आमंत्रित किया, जो शारीरिक संबंधों के असामान्य पहलू जानना चाहते थे। वर्कशॉप उन सारे छात्रों, लड़के-लड़कियों के लिए थी जो सुरक्षित संबंधों के बारे में जानकारी लेना चाहते थे। इसमें असामान्यता का पहलू ऐसा था, जो दुनिया के कई हिस्सों में टैबू माना जाता है यानी प्रतिबंधित है (गौरतलब है कि एेसे मामले में मलेशिया के प्रधानमंत्री जेल जा चुके हैं)। बात सिर्फ जानकारी देने और शिक्षित करने की नहीं थी।
ये दो उदाहरण दुनिया की दो सबसे रोमांचक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से आए हैं।
 
एक अपने युवाओं को पीटने के लिए बल्ला दिखा रही है कि कथित नैतिकता की लक्ष्मण रेखा पार की तो खबरदार! और दूसरी है जो उन्हें शिक्षित होने का अवसर उपलब्ध करा रही है ताकि वे जानकारी के आधार पर चुनाव कर सकें। अनुभव बताता है कि जब युवाओं पर चॉइस थोपी जाती है तो वे विरोध करते हैं, लेकिन जब वे खुद चयन करते हैं, अच्छा या बुरा तो पीढ़ियों और भिन्न लिंगों के बीच संबंध अधिक परिपक्त और अर्थपूर्ण हो जाते हैं।
 
मेरे उदाहरण थोड़े बनावटी, कृत्रिम लग सकते हैं, लेकिन वे आगे बढ़ती संस्कृतियों के संबंध में लक्षणात्मक रूप से कुछ जानकारी देते हैं। कुछ तो अधिक स्वतंत्रता की ओर दौड़ लगा रहे हैं जबकि अन्य मुड़कर फिर रूढ़िवादी सांचे में ढल रहे हैं। मैं कहीं पढ़ रहा था कि भारतीय युवा सबसे रूढ़िवादी लोगों में शुमार हैं। क्या उन्होंने इस रूढ़िवादिता को सोच-समझकर अपनाया है? क्या वाकई वे रूढ़िवादी बने रहना चाहते हैं? 
 
जरा कल्पना कीजिए कि यदि हम स्कूल-कॉलेजों में वर्कशॉप चलाकर हमारे बच्चों को यह बताएं कि इन रिश्तों का जाति, रंग, आस्था या लिंग से कोई संबंध नहीं तो इससे वंश या खानदान और परिवार के सम्मान के नाम पर होने वाली सारी हत्याएं रुक सकती थीं, जिनमें भाइयों ने बहनों की हत्या कर दी या पिताओं ने बेटियों को मार डाला, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने ‘किसी अन्य से प्रेम’ किया। इससे बहुत सारी सांप्रदायिक हिंसा रुक जाती, जो बलपूर्वक अपहरण करने या लव जेहाद की झूठी अफवाहों के कारण होती है। और हां, उन लोगों के खिलाफ निरर्थक हिंसा भी थम जाती, जिन्हें हम तृतीय पंथी कहते हैं। मामला तो सिर्फ चॉइस का है। युवा तो सिर्फ चुनने की स्वतंत्रता चाहते हैं कि वे किसके साथ कैसे रिश्ते रखें, यह वे खुद तय करें कोई और नहीं। नैतिकता का दावा करने वाला कोई हिंसक गुट तो कतई नहीं।
 
श्वेता बसु प्रसाद का मामला अपनी किस्म का उदाहरण है। उसे हैदराबाद पुलिस ने प्रलोभित कर ऐसा चुनाव करने पर मजबूर किया कि उसे शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। लेकिन युवाओं को गलतियां करने की अनुमति है, यदि यह गलती थी तो। गलतियां करके ही तो वे सीखते हैं। उसे बहकाया गया। जान-बूझकर जाल बिछाया गया, यह सिद्ध करने के लिए कि वह शारिरिक संबंध के लिए पैसा लेती थी। यदि महिलाओं को आजीविका के लिए हर तरह के काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, वे भी जिनसे उन्हें नीचे देखना पड़े, यदि वे कष्टप्रद, प्रेमहीन विवाह सहन करने पर मजबूर होतीं हैं, जो उन्हें बर्बाद कर देते हैं।
 
यदि वे भारतीय पुरुष के साथ अपने भविष्य का जोखिम उठा सकती हैं, जिनमें से 60 फीसदी नियमित रूप से ‌उन्हें पीटते हैं और 75 फीसदी अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध चाहते हैं तो ऐसी क्या बात थी कि श्वेता को अपनी पसंद का चुनाव करने से रोका जाता। और यदि इस चुनाव में पैसा है तो उसका आकलन करने वाले हम होते कौन हैं? पुलिस को क्या हक है कि वह उसका नाम और फोटो सार्वजनिक रूप से जारी करके उसे शर्मिंदा करे? उन्होंने हैदराबाद की उन सारी लड़कियों के नाम और फोटो क्यों नहीं जारी किए, जो कुछ हजार रुपए के लिए इतने बरसों से 80 साल के बूढ़े अरब शेखों को ब्याह दी जाती रही हैं?
 
हम चुनने की आजादी के युग में रह रहे हैं। हर किस्म की चॉइस हमारे सामने है। उपभोक्ता के रूप में पसंदीदा वस्तुओं का चुनाव। करिअर का चुनाव। जीवन-शैली का चुनाव। जब आप खाने के लिए हत्या करते हैं तो आप नैतिक चुनाव करते हैं। जब आप चमड़े की चीजें पहनते हैं या फर के वस्त्र खरीदते हैं तो आप नैतिक चुनाव करते हैं। जब आप ऐसे सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करें, जिनका जानवरों पर परीक्षण किया जाता है तो आप नैतिक चुनाव कर रहे होते हैं। सबकुछ चुनने की आजादी से जुड़ा है। ऐसे में यह जरूरी है कि युवाअों को यह पता रहे कि उनके सामने कौन से विकल्प हैं, उनके निहितार्थ क्या हैं?  
 
हर पीढ़ी अपनी नैतिकता परिभाषित करती है। और बहुत बार वह अपने से पहले की पीढ़ियों से सीधे टकराव की मुद्रा में होती हैं। जहां तक शारीरिक संबंधों का सवाल है, गर्भनिरोधक गोली बनाने वाले ऑस्ट्रियाई-अमेरिकी केमिस्ट व लेखक कार्ल जरासी का दावा है कि अब हम ऐसे युग की ओर जा रहे हैं, जहां शारीरिक रिश्ते केवल आमोद-प्रमोद का अंग होंगे। आईवीएफ जैसे कृत्रिम साधन मानव प्रजाति की निरंतरता सुनिश्चित करेंगे, इसलिए किसी को जैविक घड़ी की चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि युवा होते ही प्रजाति की निरंतरता के लिए आवश्यक जैविक पदार्थ संरक्षित कर लिए जाएंगे। क्या इससे फिर ढेर सारे चुनाव, विकल्पों की संभावनाएं नहीं खुलतीं?
 
 
- प्रीतीश नंदी (फिल्म निर्माता और वरिष्ठ पत्रकार)
साभारः दैनिक भास्कर