कृषि ऋण का बेजा इस्तेमाल

क्या कृषि ऋण वास्तविक लाभार्थी तक पहुंच रहा है? यह सवाल देश के सर्वोच्च बैंक ने पूछा है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कृषि ऋण की समीक्षा के लिए गठित आंतरिक कार्य समूह (आईडब्ल्यूजी) की ताजा रिपोर्ट में पाया है कि कुछ राज्यों में इस क्षेत्र को आवंटित ऋण उनके कृषि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से अधिक था। इससे ऐसे संकेत मिले हैं कि  कृषि ऋण का बेजा इस्तेमाल वास्तविक उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा है। केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्य इसी श्रेणी में आते हैं।

आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार कृषि ऋण आवंटन इन राज्यों में वर्ष 2015, 2016 और 2017 के औसत कृषि जीडीपी के मुकाबले लगभग 180 प्रतिशत अधिक था। आंध्र प्रदेश में बुनियादी कृषि जरूरतों के लिए वर्ष 2014, 2015 और 2016 में आवंटित कृषि ऋण का अनुपात 7.5 गुना अधिक था। इससे सवाल उठने लगे हैं कि क्या कृषि कार्यों के लिए दिए जाने वाले ऋण का कहीं बेजा इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है।

कुछ राज्यों में यह अनुपात केवल अधिक ही नहीं था, बल्कि इसके वितरण में भी खासी असमानता थी। रिपोर्ट के अनुसार गोवा में बुनियादी कृषि जरूरतों की तुलना में वर्र्ष 2014, 2015 और 2016 में 5 गुना अधिक कृषि ऋण आवंटित हुआ था। केरल में यह 6 गुना अधिक, तेलंगाना, तमिलनाडु और उत्तराखंड में यह 4 गुना और पंजाब के मामले में यह 3 गुना अधिक था।  इनके मुकाबले झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को बीज, जैविक खाद, उर्वरक, मरम्मत एवं रखरखाव, सिंचाई शुल्क, बिजली, कीटनाशकों आदि जैसे बुनियादी कृषि कार्यों के लिए भी ऋण नहीं मिल रहे थे।

श्रम एवं पट्टा किराया पर आने वाले खर्च इनमें शामिल नहीं हैं। वर्ष 2018-19 में सरकार ने कृषि कार्यों के लिए 11 लाख करोड़ रुपये ऋण आवंटित करने का लक्ष्य रखा था। संसद में दिए लिखित उत्तर में कहा गया कि वास्तविक आवंटन 114 प्रतिशत तक हुआ था। पिछले वर्षों में भी बैंक कृषि ऋण के मामले में लगातार निर्धारित सीमा से अधिक आवंटन करते रहे। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस रकम का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए ही हो रहा है। एक अन्य दिलचस्प बात यह है कि इस रकम का एक बड़ा हिस्सा छोटी अवधि के कृषि ऋण के मद में जा रहा है। फसल संबंधित निवेश ऋण में इसका हिस्सा कम होता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 2,000 में लघु अवधि के फसल ऋण और फसल संबंधित निवेश ऋण का अनुपात 51:49 था, जो 2018 में बदल कर 75:25 हो गया।

रिपोर्ट में वित्त वर्र्ष 2009-10 में शुरू हुई त्वरित भुगतान योजना को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में  दीर्घ अवधि तक मजबूत बनाए रखने के लिए निवेश ऋण का प्रवाह महत्त्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार बैंकों ने कर्ज वितरण में पशुधन, मत्स्यपालन, दुग्ध उत्पादन और वानिकी जैसे सहायक क्षेत्रों की अनदेखी की है और इन क्षेत्रों को पर्याप्त मात्रा में ऋण आवंटित नहीं किया गया। वर्र्ष 2014 से 2016 के बीच इन सहायक क्षेत्रों ने कृषि उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था और इनका हिस्सा 38 से 42 प्रतिशत रहा। हालांकि बैंकों द्वारा दिए जाने वाले कुल कृषि ऋण में इन सहायक क्षेत्रों की हिस्सेदारी महज 6 से 7 प्रतिशत तक ही सीमित रही। कृषि कार्यों में छोटे एवं सीमांत किसानों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, लेकिन व्यावसायिक बैंकों ने जितने ऋण आवंटित किए उनका ज्यादातर हिस्सा बड़े किसानों के खाते में चला गया।

साभारः बिजनेसस्टैंडर्ड.कॉम

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