इस देश में हजारों विजय कुमारी हैं

 

एक मामूली गरीब महिला है विजय कुमारी। उसकी कहानी इतनी आम है कि उसके बारे में आप न तो टेलीविजन के चैनलों पर सुनेंगे और न ही अखबारों में पढ़ेंगे।

बीबीसी पर पिछले दिनों अगर उसकी कहानी न दर्शाई गई होती, तो शायद मुझे भी उसके बारे में कुछ मालूम न होता, बावजूद इसके कि मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती कि हूं उन अनाम, रोजमर्रा की नाइंसाफियों के बारे में लिखने की, जो अदृश्य रह जाती हैं। तो सुनिए, विजय कुमारी की कहानी।

यह कहानी शुरू होती है कोई बीस साल पहले, जब विजय कुमारी पर हत्या का इल्जाम लगा था। एक बच्चा मरा पाया गया था उसके घर के पास में और दोष उस पर लगा दिया गया था। नतीजतन वह गिरफ्तार हो गई।

उसके बाद जब अदालत में यह मामला आया, तो जज साहिब ने मुकदमे की कमजोरी देखकर विजय कुमारी को जमानत दे दी, शायद इस बात को भी ध्यान में रखकर कि वह गर्भवती थी। काश कि जज साहिब ने यह भी देखा होता कि विजय कुमारी इतनी गरीब थी कि पांच हजार रुपये की जमानत देना उसके लिए असंभव था।

गिरफ्तारी के बाद उसके रिश्तेदारों ने भी मदद नहीं की, सो जेल भेजी गई वह, और जेल में उसका बेटा कन्हैया पैदा हुआ। फिर दुनिया भूल गई कि विजय कुमारी नाम की एक औरत जेल में सिर्फ इसलिए जीवन बिता रही थी, क्योंकि उसके पास जमानत के पैसे नहीं थे।

इस तरह गुजर गए कुल उन्नीस साल। कन्हैया जब स्कूल जाने के लायक हुआ, तब उसको उसकी मां से अलग करके सरकारी कल्याण सेवा संस्थानों में भेजा गया। लेकिन वह अपनी मां को भूला नहीं कभी और जब कमाने के काबिल हुआ, तो उसने वकील करके अपनी मां को जेल से रिहा करवाया।

जेल से छूटकर पिछले सप्ताह से विजय कुमारी कानपुर में अपने बेटे के घर में रहने लगी है। बीबीसी के पत्रकार संजय मजूमदार जब उससे मिलने गए, तो विजय कुमारी ने कहा, मैंने तो यही सोचा था कि मैं जेल में ही मर जाऊंगी। सारे लोग कहते थे वहां कि एक बार कोई जेल में पहुंचता है, तो जिंदगी में फिर कभी रिहा नहीं हो सकता।

विजय कुमारी अब पचास वर्ष की हो गई हैं। बहुत अन्याय हुआ है उसके साथ, फिर भी वह खुशकिस्मत है, क्योंकि कम से कम अपना बुढ़ापा तो अपने बेटे के घर में गुजार सकेगी। हकीकत यह है कि उसकी तरह लाखों बेसहारा महिलाएं अपनी तमाम उम्र गुजार देती हैं इस देश की जेलों में केवल इसलिए कि उनके पास जमानत के पैसे नहीं होते।

बेसहारा और गरीब बच्चे भी हमारी जेलों में हैं ऐसे, जिन्होंने भूख के मारे कोई छोटी-मोटी चोरी की हो और फिर सारी जिंदगी गुजार देते हैं कैदी बनकर, क्योंकि उनकी जमानत देने कोई नहीं आता।

दरअसल कानून में व्याप्त इसी विसंगति के कारण कुछ सिरफिरे कानून हाथ में ले लेते हैं। यही हुआ हाल में बस्तर के जंगलों में। मैं उन नक्सली हत्यारों का समर्थन नहीं कर रही हूं, जिन्होंने इतनी बर्बरता से कांग्रेस नेताओं को मारा। मेरी राय में ऐसे लोगों को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए।

लेकिन कड़ी से कड़ी सजा वहीं संभव है, जहां की न्याय व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त हो। हमारे यहां फैसले आने में कई बार इतनी देरी लग जाती है कि देश भर में आपको मिलेंगे आम लोग, जो कहते हैं कि न्याय से उनका विश्वास उठता जा रहा है। यह उदासीनता कुछ तो इसलिए है कि विजय कुमारी जैसे लोगों को वे जानते हैं, और कुछ इसलिए कि न्याय अपने इस देश में बहुत धीमी गति से चलता है।

इस रफ्तार के पीछे कारण क्या हैं, यह सब जानते हैं। निचली अदालतों के कामकाज के बारे में खुद न्यायाधीशों की राय बहुत अच्छी नहीं है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वहां कार्यवाहियों में वक्त लग जाता है, जिस कारण पीड़ितों का पूरी व्यवस्था से ही विश्वास उठने लगता है।

अनुमान यह लगाया जाता है कि भारतीय अदालतों के पुराने मुकदमों को समाप्त करने के लिए चार सौ वर्ष लग सकते हैं। वह भी अगर नए मुकदमे दर्ज न हों।

ऐसे में, आम पीड़ितों को न्याय दिलाने के उद्देश्य का क्या होगा? विजय कुमारी के साथ जो हुआ, जाहिर है, वह न्याय नहीं है। इस तरह के अनेक सवाल हैं, जो पूछे तो बहुत बार गए हैं, लेकिन उनका जवाब कभी नहीं मिला है।

 

- तवलीन सिंह

साभारः अमर उजाला