रोजगार गारंटी योजना कृषि पर बहुत बड़ा प्रहार – शरद जोशी

मार्च 2012 के संसद के बजट की शुरूआत परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति के अभिभाषण से हुई। अभिभाषण में राष्ट्रपति ने सबसे ज्यादा बल उनकी सरकार के अन्न सुरक्षा बिल को लागू करने  के उद्देश्य पर दिया । राष्ट्रपति का भाषण सारी सरकार के लिए मार्गदर्शक होता है। इसलिए बजट भाषण में प्रणवदा भी इस मुद्दे पर बल देते यह स्वाभाविक ही था। प्रणवदा ने कहा कि इसे  सरकार पारित करवाने के लिए  कृतसंकल्प है। उन्होंने जोर देकर कहा इससे अन्न उपलब्ध कराना  कानूनी बाध्यता  (–लीगल इंटायटलमेंट) बन जाएगा। लेकिन उनके भाषण से ऐसा नहीं लगा कि अन्न सुरक्षा  संवैधानिक या मौलिक अधिकार बन पाएगा।

वर्तमान स्थिति में अन्न सुरक्षा तभी संभव है यदि किसान पर्याप्त मात्रा में  अनाज पैदा करें।प्रणवदा ने अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ नए बांध, कुछ नहरें बनाने की योजनाओं का जिक्र किया । खेती के लिए बुनियादी योजनाएं लागू करने की बातें भी उन्होंने कही। लेकिन जिस बात की तरफ सारे किसानों का ध्यान लगा हुआ था वह थी खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश की अनुमति। लेकिन मुखर्जी ने उसका जिक्र नहीं किया। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश शुरू होने पर वर्तमान कृषि और बाजार को डोड़नेवाले रास्ते बेहतर बनेंगे,स्टोरेज की व्यवस्था बनेगी,कुछ कोल्ड स्टोरेज उपलब्ध होगें। आज हमारी कृषि के पास सारी दुनिया से होड़ करनेवाला माल है लेकिन बंदरगाह तक पहुंचने तक  वह प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाता है –इस स्थिति को सभी जानते हैं। किसानों को इस बात पर अचरज होता है कि आज किंग फिशर जैसी कंपनियों के लिए भी विदेशी निवेश उपलब्ध है फिर किसानों को ही उसका लाभ लेने से क्यों वंचित रखा जा रहा है।

स्पष्ट है कि सरकार की 2008 की किसानों को कर्जमाफी  की योजना किसी अनाडी ने तैयार की होगी जिसे पता नहीं होगा कि किसान क्यों कर्ज के जाल में फंसता है। इस कारण बिना वजह छोटे किसान और बड़े किसान का वर्गीकरण किया गया ।इसके अलावा बिजली के बिल कृषि पर होनेवाले खर्च में  सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। उसके बारे में कर्जमाफी योजना कुछ नहीं कहती।नतीजतन किसानों के लाखों रूपये के बिजली बिल बकाया है और महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में स्वयं केंद्रीय  कृषिमंत्री के भतीजे बिजली कनेक्शन तोडने के लिए आगे आए हैं।

किसानों का हालत आज ऐसी है कि उन्हें बिजली मिलती नहीं,पैट्रोल और डीजल की कीमते आसमान छू रही हैं। इस बारे में कई लोगों ने सुझाव दिया था कि जैविक ईंधन की नीति में सुधार करके इथेनाल के उत्पादन की अनुमति दी जानी चाहिए।लेकिन कम से कम अबतक सरकार ने उसपर ध्यान नहीं दिया है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना ने खेती पर बहुत बड़ा आघात किया है। असल में इस योजना में बेरोजगार के रुप में केवल उसी का नाम दर्ज किया जाना चाहिए जिन्हें स्थानीय खेती में काम नहीं मिल सकता। इससे आगे बढ़कर शरद पवार ने यह सुझाव दिया है कि खेती की बुवाई और कटाई के मौसम में इस योजना को बंद रखा जाना चाहिए।असल में इस योजना से देशभर में आलसीपन का माहौल फैला है।यदि दो जून की रोटी की समस्या हल हो जाए ,बच्चों की शिक्षा की समस्या का समाधान हो जाए ,दवा दारू का इंतजाम हो जाए तो कोई क्यों काम करेगा।इसके अलावा एक और बड़ी आपत्ति यह है कि वामपंथी विचारकों के दबाव में सरकार जमीन के अधिकतम सीमा तक कम करने की सोच रही है।किसानों की जमीनों स्पेशल एकानामिक झोन और और अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के लिए हडपा जा रहा है।

जमीन नहीं ,पानी नहीं,तकनीक नहीं,काम करने के लिए मजदूर नहीं फिर भला खेती होगी कैसे और अन्न सुरक्षा योजना कानून के लिए लगनेवाला अनाज पैदा कैसे होगा ?हाल ही में कृषि मूल्य आयोग के अध्यक्ष डा गुलाटी ने यह मुद्दा उठाया। इस बात की संबावना कम ही है कि जबतक किसान की न्यूनतम जरूरतें पूरी नहीं होंगी वह सारी दुनिया का पेट भरने के लए आगे नहीं आ सकता। यह तो नहीं कहा जा सकता कि प्रणवदा को खेती की इन मूलभूत समस्याओं का अहसास नहीं है। उन्हें उसका अहसास होगा ही।लेकिन जिस तरह मनमोहन सिंह कृषि को फायदा पहुंचाने के का मुद्दा उठने पर बगलें झांकने लगते है उसीतरह प्रणव मुखर्जी भी अपने बास का अनुकरण कर रहे हैं। नहीं तो उनके बजट में कृषि की किसी भी महत्वपूर्ण समस्या के समादान के लिए  उपाय योजना क्यों नहीं है। 

(मराठी दैनिक लोकसत्ता से साभार)