जहां अपने देश में ही प्रवेश के लिए लेनी पड़ती है परमिट

लेह-लद्दाख घूमने गए अतुल कुमार नामक दिल्ली निवासी एक युवक को वहां के एक वर्ग विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र में शिक्षा की दयनीय स्थति को देख काफी पीड़ा हुई। स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं से बातचीत में उसे पता लगा कि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। उन्होंनें बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल में जो टीचर आते हैं वो महीनें में एक दो दिन ही क्लास लेते हैं और अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहते हैं।

स्थानीय लोगों की परेशानी को सुन अतुल ने अपने कुछ अन्य उत्साही मित्रों के साथ लेह जाकर वहां के बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करने की योजना बनाई। पांच युवकों व एक युवती की यह टीम जब लेह के उक्त इलाके में पहुंची तो उन्हें जानकर काफी हैरानी हुई कि अपने ही देश में स्थित क्षेत्र में प्रवेश के लिए उन्हें परमिट लेने की जरूरत पड़ेगी। खैर किसी प्रकार उन्हें अधिकतम तीन महीने की परमिट मिल गई और उन्होंनें स्थानीय लोगों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करने का काम शुरू कर दिया। उनके इस कार्य को लोगों से काफी सराहना और प्रशंसा मिली। अतुल व उनके साथायों द्वारा चलाई जा रही कक्षाओं में उमड़ने वाली भीड़ ने उनके उत्साह को कई गुना और बढ़ा दिया। लेकिन इसी बीच स्थानीय प्रशासन ने उन्हें उस इलाके को छोड़कर चले जाने का हुक्म सुना दिया जबकि अभी दो महीने ही हुए थे और एक महीने का समय बचा था। अतुल के मुताबिक उन्होंने तीन महीने की परमिट के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार किया था। बाद में पता चला कि कुछ स्थानीय धर्म के ठेकेदार नहीं चाहते थे कि वहां के युवाओं को आधुनिक शिक्षा प्राप्त हो और इसलिए प्रशासन के साथ मिलकर उन्हें वापस जाने को मजबूर कर दिया।

अतुल ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस पूरे वाक्ये को एक डॉक्यूमेंट्री की शक्ल दी जिसे शनिवार को ‘10वें जीविका एशिया लाइवलीहूड डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल’ के दौरान प्रदर्शित किया गया। सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा आयोजित इस डॉक्यूमेंट्री फेस्टिवल में प्रदर्शित ‘टीच टू लर्न’ नामक इस डॉक्यूमेंट्री को दर्शकों और विशेषज्ञों से काफी सराहना प्राप्त हुई। अतुल ने बताया कि छः सदस्यीय उनकी टीम ने लेह की -25 से -30 डिग्री की हड्डियों को गला देने वाले तापमान को तो झेल लिया लेकिन सरकारी नियम कायदों के आगे हार गई और अपनी योजना को पूरी तरह मूर्त रूप नहीं प्रदान कर सकी। अतुल व उनकी टीम के मुताबिक कितने आश्चर्य की बात है कि सरकार स्वयं तो लोगों को शिक्षित नहीं कर पा रही है और दूसरों को ऐसा करने से भी रोक रही है। हालांकि अतुल ने हार नहीं मानी है और बताया कि उनका प्रयास जारी रहेगा और भविष्य में यदि उन्हें मौका मिला तो वह दुबारा ऐसा अवश्य करेंगे।

 

- अविनाश चंद्र