जन्मदिन मुबारकः शरद जोशी को क्यों याद करें?

आज ही के दिन ठीक 85 साल पहले शरद जोशी का जैविक रूप से हम सभी साधारण पुरुषों की तरह जन्म हुआ था. फिर ऐसी कौन सी बात है, जिसके कारण शरद जोशी के जन्म को याद किया जाना चाहिए और उसका उत्सव मनाया जाना चाहिए?

70 के दशक में जब शरद जोशी भारत आए तब हमारे देश में ट्रेजेडी नेताओं की बड़ी भारी धूम थी। समाज में सदियों से जड़ जमाए हुए आपसी विवाद और मतभेदों के बिंदुओं को आधार बनाकर उनके ऊपर अपनी प्रतिष्ठा की दुकान चलाने वाले नेता किसानों, दलितों और वंचितों की छाती पर बैठकर समाज सेवा का ढोंग करते रहते थे. इन तमाम नेताओं में एक बात सामान्य थी, उन सभी का मिजाज सामंती था और वे सभी आधुनिक पश्चिमी देशों के योगदान को हमारे जीवन में अमान्य करने वाले थे.

उनकी समाज सेवा की कल्पना, अपने बीमार मरीज की आजीवन चिकित्सा करते रहने किंतु कभी उसका अंतिम इलाज नहीं करने, जैसी थी. इसलिए उनके समाज सुधार के तरीके बड़े कॉस्मेटिक किस्म के हुआ करते थे, जो ऊपर से तो बड़े करुणाभरे और रूमानी लगते थे, किंतु चमड़ी के भीतर उसका कहीं इलाज होते दिखाई नहीं देता था. नतीजतन समाज और अर्थ सुधार की हजारों कोशिशों के बावजूद 70 और 80 के दशक ने इस देश में ऐसे समाज सुधारक नेताओं की फौज पैदा की, जिनको अर्थशास्त्र और आधुनिक विज्ञान का कौड़ी जितना भी ज्ञान नहीं था. अपनी-अपनी जातियों और धार्मिक भीड़ का नेतृत्व करते हुए ये तमाम नेता भारत की आधुनिकता और मुक्ति के सबसे बड़े दुश्मन बन चुके थे. हर आंदोलन में सरकार के सामने अपनी मांगों की लंबी फेहरिस्त सामने रखना, किंतु स्वतंत्रता की मांग कभी नहीं करना, यह मानो एक सोचा समझा फार्मूला था.

शरद जोशी पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने यह अनुभव किया कि आजादी और गरिमा से बड़ा कोई जीवन मूल्य नहीं हो सकता है. उन्होंने सरकार से बस आजादी मांगी क्योंकि उनकी यह मान्यता थी की सरकारें एक आवश्यक बुराई है. उनके सामने बार-बार लंबे चौड़े मांग पत्र रखकर उन्हें पुण्य आस्था का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए. इससे आम आदमी की गरिमा और स्वतंत्रता का हनन करने की पाशविक शक्ति सत्ता के पास आ जाती है. शरद जोशी ने इस देश में उत्पादकों (पोशिंदो) की आजादी की एक दूसरी जंग का सूत्रपात किया जो अपने लिए कड़े कानून की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद कानूनों में शिथिलता या उन्हें समाप्त करने की मांग करती थी. जो अपने लिए किसी दुश्मन को सख्त सजा देने की नहीं, बल्कि अपने साथ साथ दुश्मन को भी स्थायी मुक्ति देने की मांग करती थी.

शरद जोशी से मिलने के बाद नेताओं को इज्जत देने का मेरा स्केल बदल गया. मैंने नेताओं के भाषणों को नहीं, उनके विचारों से समाज पर पड़ने वाले कुल अंतर को देखने की जैसे दृष्टि पा ली थी. आज मैं शोक संतप्त परिवारों को खोजते फिरते नेताओं की इज्जत नहीं करता क्योंकि मुझे ये सभी लोग दूसरों के दुखों पर अपनी प्रतिष्ठा की चमक बढ़ाने वाली भीड़ का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं. ये लोग समस्या का हिस्सा है, समस्या का इलाज नहीं है. ये तो चाहते है कि लोग दुखी रहकर इन्हें याद करते रहें. ये तमाम लोग हद दर्जे के अहंकारी होते है.

यदि मैं शरद जोशी से नहीं मिला होता तो भारतीय फिल्मों में काम करने वाले रॉबिनहुड किस्म के नायक, वामपंथी लेखक, पर्यावरणवादी विकास विरोधी कार्यकर्ता शायद मेरे भी आदर्श होते. किंतु शरद जोशी से 25 दिसंबर 1994 हुई मुलाकात ने मेरे भीतर नेताओं को पसंद और नापसंद करने को लेकर एक स्केल पैदा कर दी, जो उससे पहले कभी नहीं थी.

आज मैं सोचता हूँ कि शरद जोशी को असली आदरांजलि यह नहीं है कि हम हर साल सरकारों के सामने अपनी मांगों की फेहरिस्त बढ़ाते चले जाए. शरद जोशी को असली श्रद्धांजलि यह होगी कि हम दुनिया के कोने कोने में मनुष्य की जिंदगी को ज्यादा उत्पादक, गरिमापूर्ण और कलात्मक बनाने के लिए जो भी मानवीय अविष्कार हुए हैं, जो भी विचार प्रकट किए गए हैं, उन सभी को वास्तविक अर्थों में अपनी धरा, अपने अस्मिता वाले समूहों के सामने उतारने की कोशिश करें।

शरद जोशी अतीत की कला और संस्कृति के जितने मुरीद थे, उतना ही पश्चिम का ज्ञान भी उन्हें लुभाता था. वे संस्कृत में लिखी किसी कविता का जहाँ बेमिसाल अर्थ बता सकते थे वहीं उन्हें फ्रेंच में भी उतनी ही दिलचस्पी थी. वह हमारे दौर के ऐसे वैश्विक महापुरुष थे, जिन्हें धर्म, जाति, भाषा और राष्ट्र की सीमाओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी. और इसीलिए वे इन अस्मिताओं को "जन्म का अपघात" कहकर इनकी खिल्ली उड़ा देते थे. वे इस देश की तरुणाई से यह उम्मीद करते थे कि वह असफल होने की जोखिम लेकर दूर गगन की यात्रा करें और क्षितिज के पास जाकर भारत माता की और समग्र मानवता की संपूर्ण मुक्ति का कोई ना कोई तरीका सदा ढूंढती रहें और ऐसा करते समय कहीं भी अपने वर्तमान और अतीत की किसी भी गलतफहमी का गुलाम ना बने. उनके लिए डिग्री लहराते हुए रोजगार मांगने वाले युवा के मुकाबिले पकौड़े बेचनेवाला युवा सदा ज्यादा कीमती तत्व होता. अपनी अपनी जातीय अस्मिताओं से चिपके रहकर जातिविहीन समाज बनाने के निकले सभी नेता शरद जोशी के मन में स्थायी घृणा और खीज का विषय होते थे. वे तो चाहते थे कि इस देश को कभी भी आपके जन्म और जाति प्रमाणपत्र की जरूरत ना पड़े. जिस उम्र में, जिस किसी स्थान पर आप हो, आपको अपनी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति अधिकार मिलना चाहिए.

मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं, कि मुझे उनके साथ चार कदम चलने का मौका मिला, उनके स्वर्णिम शब्द उनके मुखाग्र से सुनने का मुझे भाग्य मिला. मैं उस महान आत्मा को आज के इस स्मृति दिवस पर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता हूं.

- एड. दिनेश शर्मा, पुलगांव (लेखक नागपुर उच्च न्यायालय व वर्धा जिला न्यायालय में वकालत करते हैं। समूचे महाराष्ट्र में अर्थशास्त्र से संबंधित विषयों में व्याख्यान देने के लिए इन्हें आमंत्रित किया जाता है। आप स्वतंत्र भारत पार्टी, महाराष्ट्र प्रदेश समिति के अध्यक्ष हैं)

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