गिरावट से उपजा निवेश का मौक़ा

बेफिक्र हो जाइए। अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग घटने के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था दोहरी मंदी (डबल-डिप रिसेशन) में फंसने नहीं जा रही है। हालांकि ग्लोबल इकनॉमी की रफ्तार सुस्त हो रही है। मुमकिन है कि लंबे समय तक आर्थिक रफ्तार सुस्त रहे। अक्सर जब वित्तीय संकट से मंदी शुरू होती है तो ऐसा होता है। ऐसे में शेयर बाजार में गिरावट खरीदारी का अच्छा मौका है। यह मंदी के निचले स्तरों तक नहीं जाएगा।

2 अगस्त को तकनीकी डिफॉल्ट से बचने के लिए अमेरिकी नेताओं के बीच वक्त रहते कर्ज सीमा बढ़ाने पर सहमति बन गई थी। आलोचकों का कहना था कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच इस मामले पर टकराव 'राजनीतिक ठहराव' की निशानी है, जिसके भविष्य में गंभीर नतीजे हो सकते हैं। हालांकि यह सियासी ड्रामा ज्यादा था। इसी तरह का राजनीतिक तमाशा 1995 में भी हुआ था।

याद करिए कि बंटवारे को लेकर मुकेश और अनिल अंबानी के बीच किस कदर खींचतान चली थी। तब किसी ने एक मिनट के लिए भी यह नहीं सोचा था कि रिलायंस अपने कर्ज पर डिफॉल्ट कर सकती है। अमेरिका के बारे में भी यह सच है। दोनों पार्टियों के बीच कई बार तकरार बढ़ जाता है और ठहराव की स्थिति भी बन सकती है, तकनीकी डिफॉल्ट के हालात भी पैदा हो सकते हैं लेकिन इससे अमेरिका को कर्ज चुकाने में अक्षम नहीं माना जा सकता। अगर अमेरिका तकनीकी तौर पर डिफॉल्ट कर भी जाता तो भी किसी को इस पर संदेश नहीं होता कि उसके चेक कुछ देरी के बाद भुनाए नहीं जा सकेंगे। 1995 में ऐसा हो चुका है।

बेशक, पिछले कुछ दिनों में वैश्विक निवेशकों ने उभरते हुए बाजारों से अपना पैसा निकाला है और उसे डॉलर में लगाया है। इससे यह साफ हो जाता है कि अमेरिका भले कितनी ही बड़ी समस्या से क्यों न गुजर रहा हो, सुरक्षित निवेश के ठिकाने के तौर पर कोई दूसरा देश उसकी जगह नहीं ले सकता। निवेशक अमेरिकी डॉलर के बदले किसी और मजबूत करेंसी की तमन्ना कर सकते हैं, लेकिन न ही यूरो और न ही येन में यह काबिलियत है। इनोवेशन और एकेडमिक ताकत के मामले में अमेरिका का कोई सानी नहीं है।

यूरोप की समस्या कहीं ज्यादा गंभीर है। यूरो जोन सदस्य देशों का मौद्रिक एकीकरण था। इसमें राजकोषीय एकीकरण को छोड़ दिया गया था। आज यूरो जोन संघर्ष करता हुआ नजर आ रहा है। दक्षिण यूरोप के कमजोर देशों के पास एक रास्ता यह है कि वे यूरो को त्याग दें और अपनी करेंसी की ओर लौट जाएं। दूसरा रास्ता यह है कि यूरो जोन के देशों का कुछ हद तक राजकोषीय एकीकरण भी हो। इसमें मजबूत देश कमजोर मुल्कों के कर्ज की गारंटी दें। राजनेताओं को दोनों ही रास्ते गवारा नहीं हैं। इसलिए वे एक के बाद एक गलती कर रहे हैं।

मार्केट को भी इसका बखूबी अंदाजा है, इसलिए वह डरा हुआ है। इसके बावजूद ऐसे हालात कुछ समय तक बने रह सकते हैं। जर्मनी और उत्तरी यूरोप के कुछ और देशों के लोग 'अहसानफरामोश दक्षिण' को बार-बार बचाने के खिलाफ हैं। ऐसे में यूरो जोन के सभी देशों का राजकोषीय एकीकरण असंभव है। हालांकि कमजोर देशों को यूरोबॉन्ड जारी करने का अधिकार मिल सकता है। इस बॉन्ड को यूरोपीय संघ के सभी देशों से गारंटी मिली होती है। जर्मनी और फ्रांस के गारंटर होने की वजह से यूरोबॉन्ड को सुरक्षित माना जाएगा। इससे ब्याज दरें घटकर वाजिब स्तर तक आ सकती हैं। हालांकि इससे मुश्किल लंबे समय तक बनी रह सकती है।

स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स ने अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग एएए से घटाकर एए प्लस कर दी है। हालांकि मूडीज और फिच के ऐसा करने के आसार नहीं हैं। रेटिंग एजेंसियों का दामन भी पाक नहीं रहा है। 2008 के वित्तीय संकट के वक्त यह खुलासा हुआ था कि एजेंसियों ने किस तरह से दिवालिया होने या दिवालिया होने की कगार तक पहुंचे संस्थानों को ऊंची रेटिंग दी हुई थी। दरअसल, स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स अभी सख्ती दिखाकर पुरानी साख हासिल करने की कोशिश कर रही है। अमेरिका की विश्वसनीयता को धक्का जरूर लगा है, लेकिन उसकी साख अभी भी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स से कहीं ज्यादा है।

- स्वामीनाथन अय्यर
साभार: स्वामीनॉमिक्स.ऑर्ग

स्वामीनाथन अय्यर