कितनी कामयाब होगी रेल प्रशासन की यह नई योजना!

रेल प्रशासन एक बार फिर से अपनी घोषणा को लेकर चर्चा में है। यह चर्चा ट्रेनों, विशेषकर पूरब की ओर जाने वाली रेल गाड़ियों में सभी को सीट उपलब्ध कराने की घोषणा को लेकर है। इसके लिए रेल प्रशासन ने किसी भी ट्रेन में प्रतीक्षा सूची के तीन सौ से ज्यादा होने की दशा में दो अतिरिक्त कोच जोड़ने और सूची के सात सौ से अधिक होने पर विशेष ट्रेन चलाने की बात कही है। यही नहीं ट्रेन में वेटिंग की सीमा को 545 से बढ़ाकर एक हजार भी कर दिया गया है। यानि कि अब यात्रियों को लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण टिकट रिग्रेट की परेशानी से जूझना नहीं पड़ेगा। अब सबको टिकट मिलेगा और सबको बर्थ भी मिलेगा। 

हर साल होली, दीवाली व छठ पूजा के मौके पर यूपी-बिहार जाने वाले लोगों की भारी भीड़ के मद्देनजर रेल प्रशासन द्वारा बढ़-चढकर घोषणाएं की जाती हैं। भीड़ के समुचित प्रबंधन व टिकट खिड़की को दलालमुक्त करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन बात जब दावों को हकीकत के धरातल पर लाने की बात होती है तो सब योजनाएं-घोषणाएं टायं-टायं फिस्स ही नजर आती हैं। और प्रशासन की घोषणाओं को सच मान फीलगुड करने वाला यात्री उसे लानत-मलानत भेजता भेड़ बकरियों की तरह किसी तरह डब्बे में ठुंस कर यात्रा करने को बाध्य होता है। गर्मियों तो स्थित और भी बदतर हो जाती है और ट्रेन के स्टेशन से खुलते ही पता चलता है कि न तो टायलेट में पानी है और न ही कोच में लाइट। फिर शुरू होता है हर स्टेशन पर पानी व लाइट के लिए शिकायत करने और प्रशासन द्वारा शिकायतों को अनदेखा करने का फैसला।

भारतीय रेलवे की बदहाली किसी से छुपी नहीं है। भीड़ के दबाव में पुराने व जर्जर हो चुके कोचों का प्रयोग, यात्रियों का टूटी व फटी सीटों पर चूहों व काकरोचों के दल के साथ यात्रा करने की मजबूरी कोई नई बात नहीं है। दरअसल, ऐसा नए कोचों की अनुपलब्धता व ट्रैकों की मरम्मत के अभाव के बावजूद प्रतिवर्ष रेल बजट के दौरान जनता को खुश करने के लिए नई ट्रेनों को शुरू करने की घोषणा के कारण होता है। बजट के अभाव में नए कोच तो बनते नहीं लेकिन नई ट्रेनें अवश्य चला दी जाती हैं। मजबूरीवश पुरानी जर्जर हो चुके कोचों को ही इंजन के पीछे जोड़ नई ट्रेन चला दी जाती है। अब समस्या यह है कि पहले से ही कोचों की अनुपलब्धता की समस्या से दो चार भारतीय रेलवे प्रतीक्षा सूची के क्रमशः तीन सौ व सात सौ से अधिक होने पर अतिरिक्त डिब्बे जोड़ने व नई ट्रेन चलाने के लिए कोच कहां से लाएगा। कहीं एक वर्ष बाद होने वाले चुनावों को ध्यान में रख लोकप्रियता हासिल करने के लिए स्क्रैप में तब्दील हो चुके कोचों की मदद से ट्रेनें तो नहीं दौड़ा दी जाएंगी।

एकबार यह मान भी लिया जाए कि किसी प्रकार अतिरिक्त कोचों की व्यवस्था कर ली जाएगी तो क्या पहले से ही महज कुछ मिनटों के अंतराल पर एक दूसरे के पीछे दौड़ती ट्रेनें पटरियों पर अतिरिक्त दबाव नहीं बढ़ाएंगी। क्या रेल यात्री तयशुदा समय पर अपने घर सुरक्षित पहुंच पाएगा। उम्मीद है कि इस बार रेल प्रशासन ने घोषणा करने के पूर्व इन बातों पर अच्छी तरह मंथन किया होगा। स्वयं केंद्र सरकार द्वारी एटमी ऊर्जा वैज्ञानिक अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में रेलवे की सुरक्षितता पर विचार करने के लिए बनी कमेटी की रपट में रेलवे की जमकर खबर ली गई है। कमेटी का कहना है कि हर मामले में रेल यात्रियों की सुरक्षितता के साथ समझोता किया जा रहा है। 

कमेटी के मुताबिक रेलवे का सारा आधारभूत ढांचा बहुत पुराना और जर्जर हो चुका है । इसपर उसके नवीनीकरण की कभी कोशिश ही नहीं की गई। उससे भी बुरी बात यह है कि रेलवे के विस्तार के नाम पर उन्हीं रेलवे ट्रेकों पर नई-नई  ट्रेनें चलाई जा रही हैं। कमेटी के मुताबिक पिछले पांच सालों में पांच सौ से ज्यादा नई ट्रेनें चलाई गईं। पहले से मौजूद ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी बढाई गई और ट्रेनों में लगे कोचों की संख्या भी बढ़ाई गई। कमेटी का कहना है कि बिना गंभीर विचार किए केवल राजनीतिक कारणों से हर वर्ष इतनी बड़ी संख्या में नई ट्रेनें को शुरू करने से रेलवे की सुरक्षितता पर खराब असर पड़ा है।

समिति ने अपनी बेबाक रपट में रोजाना भारतीय रेल में सफर करनेवाले एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की रेल मंत्रालय के क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं। उसे पढ़ने के बाद लगता है कि इसके बावजूद केवल भाग्य के कारण भारत के रेल यात्री सुरक्षित रहते हैं। लेकिन यदि रेल मंत्रालय की लापरवाही ऐसे ही बनी रही तो कबतक सुरक्षित रहेंगे।

- अविनाश चंद्र