कूली बनने के लिए भी चाहिए 3-4 लाख रूपए

क्या आप रेलवे स्टेशनों पर सामान ढोने के ऐवज में कूलियों द्वारा अनाप शनाप पैसे मांगने का कारण जानते हैं? क्या आपको पता है कि एक गरीब इंसान को रेलवे स्टेशनों पर कूली का काम करने के लिए कितनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है? क्या आपको पता है कि सभी प्रक्रियाओं से सफलता पूर्वक गुजरने के बाद भी बांह पर बिल्ला बांधने के लिए हजारों रूपए की जरूरत होती है, और वर्षों का इंतजार करना पड़ता है? क्या आपको पता है कि तत्काल कूली बनने के लिए आपके पास 3 से 4 लाख रुपयों की जरूरत पड़ती है? अधिकांश लोगों का जवाब होगा नहीं। लेकिन आज हम बताते हैं कूलीगिरी से जुड़ी ये आश्चर्यजनक बातें: 
 
यात्री सेवा व उनके सामानों की सुरक्षा को ध्यान में रख कर कुलीगिरी के पेशे का सृजन किया गया था। यह एक ऐसा पेशा है, जिसके लिए ऊंची शिक्षा व उच्च पेशेवर दक्षता की जरूरत नहीं है। फिर भी इस पेशे में प्रवेश करना टेढ़ी खीर है। आज दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर कुली के धंधे में प्रवेश करने के लिए लगभग 4 लाख रूपए चाहिए। नई दिल्ली स्टेशन पर कुली के धंधे में प्रवेश करने के लिए 3 लाख रूपए चाहिए। ऐसा क्यों? गरीबों की धंधा गरीबों की पहुंच से दूर क्यों?
 
इसके लिए एक मात्र कारण है लाइसेंस राज। लाइसेंस राज ने जैसे हर व्यावसायिक गतिविधि को कुंठित किया है, उसी तरह कुलीगिरी के धंधे के प्राकृतिक विकास में बाधा खड़ी की है। 
 
नई दिल्ली आधारित थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा वर्ष 2005 में कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक सरकार लाइसेंस के माध्यम से कुलियों की संख्या पर नियंत्रण रखती है। सीमित संख्या में लाइसेंसों के लिए आवेदन प्रायः तीन से चार साल पर आमंत्रित किए जाते हैं। आवेदन पत्रों की स्क्रूटनी, दस्तावेजों की जांच के बाद आती है साक्षात्कार की बारी। मेडिकल फिटनेस पास करने साक्षात्कार में सफल रहने के बाद ही मिलता है कूलीगिरी का लाइसेंस अर्थात बाजू पर बांधा जाने वाला बिल्ला। कूली का कार्य पाने में सफल व असफल रहने वाले आवेदकों की प्रतिशतता 1:100 तक की होती है। यानि की जबरदस्त मारामारी।
 
कूलीगिरी के कार्य को तत्काल पाने का एक और भी रास्ता है। और वो यह कि कोई पुराना कूली अपना लाइसेंस हस्तांतरित कर दे। जी हां, रेलवे के नियमों के मुताबिक कूली सामानों की ढुलाई करने में असमर्थता की स्थिति में अपने सगे संबंधियों को अपना बिल्ला हस्तांतरित कर सकता है। इसके लिए भी उसे कठिन मेडिकल जांच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और यह भी साबित करना होता है कि काम ना करने की स्थिति में उसका व उसकी पत्नी की देखभाल उक्त व्यक्ति ही करेगा। आम तौर पर इसके लिए बेटा, भाई या भतीजा ही अर्ह होता है। लेकिन विशेष परिस्थितियों में यह बिल्ला साले (पत्नी के भाई) को भी दिया जा सकता है। साला एक ऐसा संबंध है जिसका वेरिफिकेशन करना आसान नहीं होता। यही कारण हैं कि बिल्लों का हस्तांतरण आम तौर पर सालों को ही होता है। हालांकि इसके लिए भी अधिकारियों और संबंधित विभाग को 'खुश' करना होता है। कुल मिलाकर इसके लिए 3-4 लाख रूपयों की जरूरत पड़ती है। 
 
कुछ मामले ऐसे भी देखने को मिलते हैं जिसमें अधिकारियों की मिली भगत से लाइसेंस हासिल कर लिया जाता है और कुछ ही दिनों में अस्वस्थता आदि का हवाला देकर दूसरों को हस्तांतरित कर दिया जाता है। इन सब प्रक्रिया में लाखों रूपयों का हेरफेर होता है। 
उपर्युक्त परिस्थितियों के कारण लाइसेंस की अवैध खरीद बिक्री का कारोबार आज काफी फल फूल रहा है।
इसके अलावा सरकार ने विभिन्न बोझ सीमाओं के लिए विभिन्न दर भी निश्चित कर रखी है। जो बहुत ही कम है। इतने में कुलियों का गुजारा संभव नहीं। चूंकि कुलियों की संख्या सीमित है, अतः थोड़ा प्रबंधन कौशल का इस्तेमाल कर कुलियों का अभाव पैदा करके नियंत्रित सरकारी दर से बहुत अधिक राशि यात्रियों से वसूल की जाती है। 
 
कुल मिलाकर सरकारी नियंत्रण में कुलीगिरी में पूर्ण अराजकता व लूट खसोट का राज जारी है। अतः सरकारी नियंत्रण अविलंब खत्म कर निजीकरण तथा व्यावसायिक प्रतियोगिता की नीति पर अमल करते हुए कुलीगिरी के पेशे में निम्नलिखित सुधार किया जाना चाहिएः 
 
लाइसेंस राज अविलम्ब खत्म हो और कुलियों के लिए सिर्फ पंजीकरण करना ही जरूरी रखा जाए। इसके लिए चाहे कितनी ही संख्या में इच्छुक संगठनों को कुलीगिरी के कार्य ठेका दिया जा सकता है। आवेदकों के पैतृक स्थान व उसकी विश्वसनीयता की जांच निजी तौर पर कोई भी समूह अधिक कुशलता से कर सकता है। यात्रियों के सामोने के साथ किसी भी क्षति की पूर्ति कुलियों के संगठन के लिए अनिवार्य बनायी जा सकती है। कुलियों के बिल्ले पर कुलियों का पंजीकरण संख्या अंकित की जा सकती है।
धंधे में प्रवेश पर से सीमा हटाने से यात्रियों से अधिक वसूली की समस्या खत्म होगी। साथ ही लाखों रुपए में लाइसेंसों की अवैध खरीद बिक्री की समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी। और अधिकाधिक गरीबों के लिए रोजी-रोटी कमाने का द्वार खुल जाएगा। 
 
- अविनाश चंद्र
लेख में शामिल तथ्य सीसीएस द्वारा प्रकाशित नागरिक मार्गदर्शिका श्रृंखला 1 (आर्थिक स्वतंत्रता का संघर्ष) से लिए गए हैं।
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