भारत की अनोखी कहानी

भारतीय जनगणना रपट 2011 के नवीनतम  आंकड़े जारी होने के बाद मुझसे पूछा गया कि क्यों भारत में इतने सारे मोबाइल है लेकिन पर्याप्त शौचालय नहीं हैं।हालांकि पचास प्रतिशत से ज्यादा लोगों  के पास मोबाइल हैं लेकिन इतने लोगों के यहां शौचालय नहीं हैं। मेरे देश की असाधारण कहानी  में ऐसे विरोधाभास ढ़ेर सारे हैं। विकास रिसकर नीचे की तरफ पहुंच रहा है। लेकिन सरकार ने जिन सेवाओं को मुहैया कराने का वायदा किया है वे तो अब भी नदारद हैं।

यह सही है कि पिछले 10 वर्षों में देश में भारी परिवर्तन आया है। नए उद्यमियों,,ऊर्जावान निजी क्षेत्र  और तेजी से बढ रहे मध्यम वर्ग के साथ तेजी से विकास हो रहा है। यह वह समय है जब लाखों  लोग गरीबी के दलदल से बाहर निकल रहे हैं। जीवन की संभाव्यता पांच वर्ष बढ़ी है और 80 प्रतिशत बच्चों ने स्कूलों में नाम दर्ज कराए हैं। लेकिन मेरी चिंता यह है कि हमारे यहां सरकार का संकट है। एक यह कि वह कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त काम नहीं करती और दूसरे क्षेत्रों में अच्छा करने के बजाय नुक्सान ज्यादा करती है। यह भारत के धीमे पड़ते विकास के सामने सबसे महत्वपूर्ण खतरा है। सरकार आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रताएं सुनिश्चित कराने,स्वच्छ नियामक वातावरण, बिजली –सड़क –पानी उपलब्ध कराने  में नाकाम रही है। बिजली ,सड़क पानी तो आठवे दशक से राजनेताओं की युद्ध घोषणाएं रहीं है।

भारत के विरोधाभास बहुत तीखे हैं और उनके ओर छोर का पता लगा पाना आसान नहीं है। अक्सर दीवारों पर शुभ लाभ लिखा रहता है फिर भी हमारे देश में बाजार के प्रति वितृष्णा रही है। हमारे देश  का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है लेकिन यहां सामान्य अनुबंधों को लागू कर पाना मुश्किल होता है।

कई पालक अपने ढंग से विरोध जता रहे हैं।25 प्रतिशत ग्रामीण अभिभावक और 48 प्रतिशत शहरी अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी पढ़ाई न दे पानेवाले स्कूलों से हटाकर संभावनापूर्ण प्रायवेट स्कूलों में भेज रहे हैं। इसके बावजूद शिक्षासंस्थाएं खोलने के  इच्छुक योग्य व्यक्तियों को शिक्षासंस्थाएं खोलने के लिए औसतन पंद्रह लाइसेंसों की जरूरत होती है और इसके बाद भी वे मुनाफा नहीं कमा सकते जिसका वे सुविधाएं और गुणवत्ता बढ़ाने में निवेश कर सकते हैं। संसद खाद्य सुरक्षा बिल जैसे एक असाधारण कानून पर विचार कर रही है जो यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भूखा न रहे लेकिन वह आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म नहीं करती जो देश के अंदर कृषि उत्पादों के मुक्त विनिमय को रोकता है।

भारत सरकार का शिक्षा, स्वास्थ्य ,बुनियादी ढांचे के प्रति रवैया गहन जनकल्याणकारी है जो अच्छी नीयत,भारी खर्चे और लोकलुभावन योजनाओं पर आधारित है। लेकिन इस सोच के अवांछित परिणाम भी होते हैं। उदाहरणार्थ 2010 में लागू हुआ शिक्षा का अधिकार कानून शिक्षा को संवैधानिक अधिकार बना देता है। लेकिन उसमें कई अनावश्यक शर्तें लगाई गईं हैं खेल का मैदान होना आवश्यक है,शिक्षकों को सरकारी वेतनमान के मुताबिक वेतन दिए जाएं। इन निर्देशों से देश के तीन लाख कम बजटवाले स्कूलों के बंद होने का खतरा पैदा हो गया है जो तीन सौ से छह से रूपये प्रति माह फीस लेकर गरीब परिवारों के बच्चों  को शिक्षा मुहैया कराते हैं। ये शर्ते उन्हें फीस 2500 से तीन हजार तक बढ़ाने या स्कूल बंद करने को मजबूर कर देंगी। भारत जैसे देश के लिए यह कोई छोटा मोटा नुक्सान नहीं है।

अन्य नीतियों से भी इसी तरह के सवाल खड़े हुए हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ग्रामीण भारत के उन लोगों को 100 दिन का रोजगार देने का वायदा करती है जो शारीरिक श्रम करने को तैयार हैं। लेकिन रोजगार योजना का सबसे उपयोगी पहलू यह है कि भारत का सूचना का अधिकार कानून बहुत प्रभावशाली है। सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर गांवों में  रोजगार गारंटी योजना कानून के रोस्टर में  ऐसे मजदूरों की भरमार है जिनका अस्तित्व ही नहीं है। भारत के लेखा महानिदेशक द्वारा की गई कार्य़क्रम की समीक्षा में पाया गया जिन गांवों के रोस्टरों की जांच की गई उनमें से 70 प्रतिशत रजिस्टरों में हेराफेरी की गई थी। इससे न केवल कार्यक्रम के संचालन में भ्रष्टाचार को बढावा मिला है वरन इसने शहरों और खेतों में मजदूरों का अभाव पैदा किया हुआ है। नए  बुनियादी ढाचे का निर्माण भी कम ही  हुआ है ।न फीडर रोड बने हैं न ड्रेनेज सिस्टम। भारतीय अब सवाल कर हैं कि कहीं यह कार्य़क्रम कृषि उत्पादों की कीमतें बढाने में मदद तो नहीं कर रहा।

किसी समस्या पर पैसे खर्च कर देने भर से वह समस्या खत्म नहीं हो जाती।यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़े और उत्पादक बनें तो हमें पढ़ाई के नतीजों पर गौर करना चाहिए न कि साधनों पर।बाजार में प्रवेश के रास्ते में अनावश्यक बाधाएं खड़ी कर देने से विकास अवरूद्ध होता है। जनकल्याणकारी योजनाओं को चलाने के पीछे के अच्छे  इरादों की तरह ही उनके  अवांछित परिणामों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

भारत की सबसे बड़ी खबर है कि सुधारो पर रोक लग गई है जिनमें मौद्रिक सुधार भी शामिल हैं। इससे हमारी धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था को एक और धक्का लगेगा।सुधार का कार्यक्रम फिर शुरू हो पाएगा इसके आसार कम हैं। हमारे लिए यह जरूरी है कि जनकल्याणवाद से दूर रहे और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करें ।सबसे महत्वपूर्ण सुधार तो यह है कि पिरामिड की तली में रहनेवालों के लिए कोटा परमिट राज खत्म करें। रेहड़ीवाले प्राइवेट स्कूल चलानेवाले ,रिक्षावाले आदि को बंधनमुक्त करें। सड़कें बनाए,बिजली –पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करें और कानून का राज लागू करने से न चूकें।

मैं आठ वर्ष विदेश रहने के बाद दो वर्ष पहले भारत लौटी। यह एक अस्थायी फैसला था लेकिन वापस लौटनेवाले बाकी भारतीयों की तरह विरोधाभासों के इस गुलदस्ते के प्यार में पड़ गई हूं। विरोधाभास इसलिए हैं क्योंकि सरकार प्रभावहीन है । वैचारिक दृष्टि से अनिर्णय की स्थिति में है और सैद्दांतिक दृष्टि से दीवालिया। जनकल्याण के और ज्यादा कार्य़क्रम तैयार करने से लघुकालिक राजनीतिक जीत भले ही हासिल कर लें लेकिन उससे उन विकृत प्रोत्साहनों को ही बढ़ावा मिलेगा जिन्होंने देश को मध्यम आय के फंदे में फंसा रखा है। जो जनकल्याण के अपने वायदे को पूरा करने में अक्षम है और अपने विकास के वायदे को पूरा नहीं कर पा रहा है।

- भुवना आनंद