आदर्श मुद्रा की तलाश में... - हेनरी हेजलिट

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

हर रोज और घंटे दर घंटे भारी उतार-चढ़ाव देखने वाली विनिमय दर का कोई खुले तौर पर बचाव नहीं करता। भविष्य के आयात, निर्यात और घरेलू दामों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी इसी दायरे में आते हैं। अखबारों का हर पाठक इस बात को लेकर डरता है कि वस्तुओं के भाव अगले साल और अधिक बढ़ जाएंगे और उससे अगले साल और अधिक। संक्षेप में कहें तो सड़क पर चलने वाला आम आदमी भी इस बात का महसूस करता है कि दुनिया मुद्रा को लेकर अंधेरगर्दी की स्थिति की ओर बढ़ रही है।

लेकिन जहां तक इस समस्या के हल की बात है तो यहां सहमति का नितांत अभाव है। महंगाई बुरी बात है, कुछ इससे सहमत होते हैं। हां, लेकिन यह मंदी और बेरोजगारी से बेहतर है और कम से कम यह और अधिक बड़ी बुराईयों को परे रखती है। इसलिए जब तक यह बुराईयों को परे रखती है हमें महंगाई थोड़ी ज्यादा ही रहने देना चाहिए। महंगाई बुरी बात है, कुछ अन्य इससे सहमत होते हैं, लेकिन इसका मुद्रा प्रणाली से कुछ लेना-देना नहीं होता। कीमतों में इजाफे का कारण तो विक्रेता के लोभ और लूट की भावना है, इसे मूल्य नियंत्रण से तत्काल रोका जा सकता है। बल्कि राजनीतिज्ञों या नौकरशाहों की बड़ी गलतियों और गलत कदमों का परिणाम है।

मुद्रा प्रणाली में ही कुछ खामी की बात स्वीकारने वाले भी इसमें जरूरी सुधारों को लेकर सहमत दिखाई नहीं देते। ऐसे सुधार काफी बड़ी संख्या में सुझाए गए हैं। सुधार की बात करने वाले वैसे दो समूहों में बांटे जा सकते हैं। इनमें से कुछ सुधारों का सोने, चांदी या अन्य वस्तुओं के भाव से कुछ लेना-देना नहीं होकर ये मुद्रा नियंत्रण पूरी तरह से सरकार के ही हाथ में देने के समर्थक होते हैं। दूसरा समूह फिर सोने को ही आधार बनाने का पक्षधर है। इन दो समूहों को भी दो-दो विचारधाराओं में बांटा जा सकता है। एक समूह, जिसे मैं अंकशास्त्री (स्टेटिस्ट) या कागजी मुद्रा (पेपर मनी) समूह कहूंगा, में से एक हर बात सरकारी मुद्रा प्रणाली के अधिकारियों के रोजमर्रा के विवेक पर छोड़ देगा तो दूसरा इन अधिकारियों को सख्त परिणामात्मक (क्वांटिटेटिव) नियंत्रणों से बांधना चाहेगा। और दूसरे स्वर्ण समूह (गोल्ड ग्रुप) में भी इसी तरह एक विचारधारा अस्पष्ट लेकिन विस्तारित सीमाओं के भीतर निजी बैंकरों और सरकार के विवेक पर बात को छोड़ना चाहेगा तो दूसरा समूह इसी विवेक को सख्त और तय सीमाओं से नियंत्रित करना चाहेगा। इसलिए अब हमारे पास मुद्रा संबंधी विचारकों की चार विचारधाराएं उपलब्ध हैं। लगभग सभी मुद्रा प्रस्तावों को इन चार विचारधाराओं के तहत ही देखा जा सकता है।

कागजी मुद्रा - कोई नियंत्रण नहीं

शुरूआत पहली विचारधारा से करते हैं, यानी कागजी मुद्रा वाले अंकशास्त्रियों से जो पूरी कमान (मुद्रा की प्रकृति, मात्रा और मूल्य) किसी सत्तारुढ़ राजनीतिज्ञ या उनके द्वारा नियुक्त नौकरशाहों के हाथ में सौंपने के पक्षधर हैं। वैसे तो यह सबसे ज्यादा दुस्वप्न जैसी मौद्रिक व्यवस्था है, लेकिन आज यह पूरी दुनिया में तकरीबन सभी जगह पर मौजूद है। इसने पूरी दुनिया में महंगाई, अभूतपूर्व अनिश्चितता और आर्थिक विघटन को जन्म दिया है। इनमें से कोई भी महज आकस्मिक नहीं है। 1944 में ब्रेटन वुड्‌स में अमेरिका के हैरी डेसटर व्हाइट और इंग्लैंड के लॉर्ड कीन्स के मार्गदर्शन में 44 देशों के सम्मेलन में इस प्रणाली को बाकायदा तैयार किया गया। इस सम्मेलन का प्रत्यक्ष उद्देश्य तो 'अंतरराष्ट्रीय सहयोग' बढ़ाना और मानो या न मानो मुद्रा और विनिमय दरों को 'स्थिर' करना था। इस प्रणाली के प्रमुख निर्माताओं को यह यकीन था (हालांकि वे इसे खुले तौर पर स्वीकारते नहीं थे) कि इसे मौद्रिक व्यवस्था से सोने को हटाकर हासिल किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने पूरी दुनिया के लिए सोने की बजाय डॉलर का मानक तैयार कर दिया। अब दुनिया की हर मुद्रा की कीमत का निर्धारण डॉलर की एक तय आधिकारिक विनिमय दर से किया जाने लगा।

इस प्रणाली का एक सिरा अब भी सोने के साथ जुड़ता था। खुद डॉलर का सोने के साथ 35 डॉलर प्रति औंस के भाव से विनिमय किया जा सकता था। लेकिन इस संबंध को दो तरीकों से कमजोर कर दिया गया। दूसरे देश डॉलर के लिहाज से अपनी मुद्राओं को स्थिर रख सकते थे, न कि मुक्त मुद्रा विनिमय बाजार (जैसा कि पहले विश्वयुद्ध से पहले सोने के मानक होने के दिनों में किया जाता था) के जरिये, बल्कि सरकार की डॉलर की खरीद या बिक्री के जरिये। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार के मूल्य नियंत्रण के जरिये। अब डॉलर को कोई भी अपनी मर्जी से सोने में नहीं बदल सकता था, ऐसा केवल विदेशी केंद्रीय बैंकों के जरिये ही किया जा सकता था। अमेरिका तो (अघोषित तरीके से) अपनी राजनीतिक और आर्थिक ताकत के बूते, जैसा उसने किया भी, केंद्रीय बैंकों को इस मामले में धमकाने तक की गुस्ताखी करता रहा है। इसलिए ब्रेटन वुड्‌स प्रणाली के जरिये कुछ वर्षों तक हासिल कृत्रिम स्थायित्व की वजह किसी देश द्वारा अधिक मुद्रा या उधार के जरिये अपनी मुद्रा को स्थिर रखने की कोशिश नहीं, बल्कि सरकार के मूल्य नियंत्रण और भद्रजनों के बीच व्यवस्था को न बिगाड़ने के समझौते के कारण थी। यह व्यवस्था अंततः अज्ञानी, कमजोर और अस्थायी साबित हुई। यह प्रणाली केवल मजबूत मुद्राओं द्वारा कमजोर मुद्राओं की मदद के जरिये स्थायित्व का आभास देती रही। उदाहरण के लिए, अमेरिका आगे बढ़कर ब्रिटेन को लाखों डॉलर की मदद दे देता या फिर लाखों पौंड खरीद लेता। ऐसा ही वह संकटकाल में दूसरी मुद्राओं के लिए भी करता था। लेकिन कमजोर मुद्राओं की मदद का यह शगल खुद मजबूत मुद्राओं को भी कमजोर करता चला गया। जब अमेरिकी राजकोष ने लाखों पौंड की डॉलर के जरिये खरीद की तो इस काम के लिए उसे ढेर सारे डॉलर छापने पड़े। और ऐसे में जब डॉलर अपने ही दुस्साहसी प्रयासों के कारण खतरे में पड़ गया और जब हम अगस्त 1971 में सोने के मानक से खुले तौर पर अलग हो गए, दूसरे देशों पर इसका प्रभाव पड़ा। उदाहरण के लिए ब्रेटन वुड्‌स समझौते के तहत जर्मनी अपनी मुद्रा को आधिकारिक समता (ऑफिशियल पैरिटी) से ऊपर जाने से रोकने के लिए अरबों डॉलर खरीदने पर मजबूर हो गया। और जर्मनी ने यह अरबों डॉलर खरीदने के लिए जरूरी अरबों मार्क कहां से लाए? इन्हें छापकर और कहां से। इस तरह से तेजी से मुद्रास्फीति का शिकार होते देशों ने लगभग एक तय गति से अपनी मुद्रास्फीति धीमी गति से इस प्रक्रिया से गुजर रहे देशों को निर्यात कर दी। और इसने धीरे-धीरे बाकायदा पूरी दुनिया को मुद्रास्फीति की वर्तमान अराजकता में धकेल दिया। सच है, मजबूत मुद्राओं वाले देशों को, ब्रेटन वुड्‌स समझौते के नैतिक दबाव के बावजूद, कमजोर मुद्रा खरीदने के लिए अपनी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है। न तो जर्मनी और न ही किसी अन्य देश, जिसने डॉलर हासिल किए, को केंद्रीय बैंक के अतिरिक्त संसाधन के तौर पर डॉलर का अपनी और अधिक मुद्रा जारी करने के लिए इस्तेमाल करने की जरूरत थी। वे ऐसा अपने डॉलर के रिजर्व को 'स्टरलाइज' करके भी कर सकते थे।

या जब उन्हें डॉलर खरीदने की नौबत का सामना ही करना पड़ रहा था तो वे तुलनात्मक सरकारी खर्च को कम कर सकते थे या अतिरिक्त करों से यह पूंजी जुटा सकते थे। डॉएशे मार्क या अन्य मुद्रा के छापने से तो यह बेहतर विकल्प होता। लेकिन यह बेहद कठिन निर्णय होता। इससे वे अपनी सरकार के कार्यकाल को खतरे में डाल सकते थे। उन्होंने जो रास्ता चुना उसे मौजूदा परिस्थितियों में सबसे कम प्रतिरोध का सामना करना पड़ता। अगर एक स्थिर और स्थायी मौद्रिक सुधार किया जाना है तो यह बात साफ तौर पर समझ लेने की जरूरत है कि आज पूरी दुनिया में जो महंगाई है वह महज एक संयोग नहीं है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जो एक बेहद शानदार आधुनिक और प्रबुद्ध अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक कोष व्यवस्था के बावजूद हो गई। यह एक ऐसी बात है जो निश्चित तौर पर इसी व्यवस्था का परिणाम है।

स्थायी नाकामी (स्टेडी ब्रेकडाउन)

यह इसके द्वारा तय 'अंतरराष्ट्रीय सहयोग' का ही परिणाम था जो अंततः इसकी नाकामी का कारण बना। मूलतः मौद्रिक संकट की ओर ले जाने की नीतियों वाले देशों को जुर्माना किया जाना चाहिए था। नाकाम मुद्राओं को दूसरे देशों की केंद्रीय बैंकों के जरिये नहीं बचाया जाना था। कमजोर मुद्रा वाले देशों को यह पता था कि अगर वे किसी मौद्रिक संकट में फंसे भी आम अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित संगठन उनको मदद कर संकट से उबार लेगा। इस वजह से वे बेफिक्र होकर और अधिक गर्त में गिरते चले गए। जैसा कि होता है पूरा ढांचा चरमराता रहा, लेकिन साजिशन इस बात को बड़ी सफाई के साथ दबाया जाता रहा। सितंबर 1949 में ब्रिटिश पौंड का 30 फीसदी अवमूल्यन होकर यह 04.03 डॉलर से घटकर 02.80 डॉलर हो गया। जब ऐसा हुआ तो 25 अन्य देशों की मुद्रा का भी अवमूल्यन हुआ। नवंबर 1967 में ब्रिटिश पौंड का एक और अवमूल्यन हुआ और यह 02.80 डॉलर से घटकर 02.40 डॉलर हो गया। 1946 में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की स्थापना से लेकर अब तक सैकड़ों मुद्राओं का अवमूल्यन हो चुका है। अपने मासिक बुलेटिन में आईएमएफ हर साल लाखों आंकड़े प्रकाशित करती है। लेकिन जहां तक मुद्रा अवमूल्यन की संख्या की बात है तो इसने आज तक एक अदद ऐसा आंकड़ा छापने की जहमत नहीं उठाई है। बहुत हो चुका। अब यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि ब्रेटन वुड्‌स प्रणाली कितनी खराब साबित हुई। कुछ लोग, उन नौकरशाहों के साथ जिनकी नौकरियां दांव पर लग सकती हैं, फिर से इस प्रणाली को अपनाने की हिम्मत दिखा सकेंगे। प्रणाली की मौत हो चुकी है। दुर्भाग्य से इस मुर्दे को अभी जमीन में गाड़ा जाना बाकी है।

मुद्रावादी (द मोनेटेरिस्ट्‌स)

आइए अब अगले उम्मीदवार पर नजर डालें। यानी कथित मुद्रावादियों के प्रस्ताव। मुद्रावादियों के पक्ष में दो बातें कही जा सकती हैं। वे मुद्रा की मात्रा और मौद्रिक ईकाई की क्रय शक्ति (पर्चेजिंग पॉवर) के बीच संबंध को मानते हैं। दूसरा वे मुद्रा जारी करने पर कड़े और स्पष्ट प्रतिबंधों का महत्व जानते हैं। लेकिन उनकी वास्तविक धारणाओं और नीतिगत प्रस्ताव, दोनों ही में कुछ कमजोरियां हैं। यह सच है कि मुद्रा की आपूर्ति और मौद्रिक ईकाई की क्रय शक्ति के बीच संबंध है, लेकिन यह सच नहीं है कि इनके बीच विलोम आनुपातिक (इन्वर्सली प्रपोर्शनल) संबंध है या यह किसी भी अन्य तरीके से तय या भरोसेमंद हैं। यह भी सच नहीं है कि मुद्रा की आपूर्ति में इजाफे और इतने ही प्रतिशत में कीमतों में इजाफे के बीच तय बाधा (फिक्स्ड लेग) है। यह निष्कर्ष जिन आंकड़ों पर आधारित है, उन्हें बस अपर्याप्त कहा जा सकता है। उनमें पर्याप्त मुद्राओं का पर्याप्त लंबी अवधियों तक अध्ययन नहीं होता।

उदाहरण के लिए एक सामान्य मुद्रास्फीति के तहत आरंभिक दौर में मुद्रा की आपूर्ति की गति की तुलना में महंगाई नहीं बढ़ती और बाद के दौर में तो महंगाई मुद्रा की आपूर्ति से भी तेज गति से बढ़ती है। मुद्रावादी इस तुलना को अनुचित और अप्रासंगिक करार देंगे। वे नहीं मानते कि वे जो प्रस्ताव कर रहे हैं वह महंगाई का कारण हो सकते हैं। उनके लिए तो मुद्रास्फीति का अर्थ मुद्रा की आपूर्ति नहीं केवल कीमतों में इजाफा है। और उनका प्रस्ताव, जैसा कि वे इसे देखते हैं, हर साल मुद्रा का भंडार तीन से पांच फीसदी बढ़ाना है,  ताकि कीमतों के 'स्तर' को गिरने से बचाया जा सके। वे तो मुद्रा भंडार में इजाफा चाहते हैं, ताकि अर्थव्यवस्था में तीन फीसदी या ज्यादा की 'उत्पादकता' की भरपाई की जा सके।
मुद्रावादी का प्रस्ताव एक झूठी वास्तविक धारणा पर आधारित है। 'उत्पादकता' में तीन फीसदी या किसी तय दर से कोई स्वचालित और विश्वसनीय इजाफा नहीं होता। अमेरिका में उत्पादकता में जो इजाफा हुआ है वह हाल के वर्षों की बचत, निवेश और प्रौद्योगिकी तरक्की के परिणामस्वरुप है। इनमें से कोई भी स्वचालित नहीं है। हकीकत में पिछले दो वर्ष् में उत्पादकता के आम उपायों में गिरावट ही दर्ज की गई है। जगह की कमी के कारण पर्याप्त गणितीय और सांख्यिकी समस्याओं का जिक्र नहीं कर पाने के बावजूद मैं कहना चाहूंगा कि कीमतों के स्तर पर नियंत्रण एक अनिश्चित लक्ष्य है। यह इस धारणा पर आधारित है कि गिरती कीमतें 'अपस्फीतिकारी (डिफ्लेशनरी)' हैं और वह मंदी का कारण बनती हैं। इस धारणा पर सवालिया निशान लगाया जा सकता है। जब मुद्रा का भंडार नहीं बढ़ाया जाता, बढ़ते उत्पादन और आर्थिक प्रगति के कारण कीमतों में गिरावट एक सामान्य परिणाम है। जरूरी नहीं कि यह मंदी का कारण बने, क्योंकि कीमतों में गिरावट उत्पादन लागत में गिरावट का परिणाम है। लाभ की वास्तविक सीमा (रियल प्रॉफिट मार्जिन्स) नहीं बदलती। मौद्रिक पारिश्रमिक दरों में इजाफा न हो, लेकिन वास्तविक पारिश्रमिक में इजाफा होगा क्योंकि इन्हीं पैसों से खरीदारी की जाएगी। लगातार बढ़ती समृद्धि के साथ कीमतों में गिरावट हमारे इतिहास में बारबार देखने को मिलती है।

संघीय ताकत का दुरूपयोग

शक्तिशाली और आक्रामक श्रम संगठनों, कानूनी प्रतिरोधी ताकतों की हमारी वर्तमान दुनिया में मुद्रावादियों का यह भय सही लगता है कि ऐसे संगठन इसी पारिश्रमिक से क्रय शक्ति में इजाफे को स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे मामलों में, जब यह यूनियन मांगें मनवा कर पारिश्रमिक में इजाफा करवा लेती हैं, तो इसके साथ बेरोजगारी और मंदी का दौर आता है। लेकिन यह खतरा तो किसी भी मौद्रिक प्रणाली में मौजूद रहेगा। जब तक कि आप एकतरफा श्रम कानून और संगठनों की विचारधारा पर कायम रहेंगे। मुद्रावादियों की विचारधारा की सबसे बड़ी कमजोरी इसका राजनीतिक भोलापन (पॉलिटिकल नेवेट) है। यह मुद्रा की मात्रा, स्तर और हमारी क्रय शक्ति, सबकुछ सरकार के हाथ में दे देती है। यानी राजनीतिज्ञों और दफ्तरों में बैठे नौकरशाहों के हाथ में। मैं खुद को यह कहने से रोक नहीं पा रहा हूं कि इससे पूरा मामला इन दफ्तरों में अस्थायी तौर पर बैठे लोगों के विवेक, सनक पर निर्भर हो गया है। मुद्रावादी इससे इनकार करेंगे। वे मौद्रिक प्रबंधकों के विवेक को कड़े नियमों के जरिये नियंत्रित करेंगे। प्रबंधकों को दो, तीन, चार या पांच फीसदी प्रति वर्ष के हिसाब से मुद्रा का भंडार बढ़ाने के लिए कहा जाएगा। इसे कानून या संविधान में दर्ज किया जाएगा। यह मुद्रावादियों की सोच की अनिश्चितता का ही प्रमाण है कि वे खुद यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि अफसरशाही के लिए यह आंकड़े मासिक आधार पर तय किये जाने चाहिए या फिर वार्षिक। या फिर इसे कानून या संविधान में ही दर्ज करा दिया जाए। न ही वे यह तय कर सके हैं कि यह आंकड़ा क्या होना चाहिए- 2,3,4 या 5 फीसदी। वे केवल अस्पष्ट बने रहकर ही अपना स्थान कायम रख सकते हैं।

अनवरत राजनीतिक दबाव

यह तय है कि इस प्रणाली का एक बार नियोजन होने के बाद इसे राजनीतिक दबाव का अनवरत सामना करना पड़ेगा। वो जिन्हें लगता है कि हर वर्ष मुद्रा भंडार में दो फीसदी का इजाफा पर्याप्त होगा, हर दम अपने उन साथियों से जूझते रहेंगे जिनको यह अपर्याप्त लगता है और जिन्हें यह भय है कि यह कहीं मंदी का कारण न बन जाए। तीन फीसदी वालों को चार फीसदी और उन्हें पांच फीसदी के समर्थकों से जूझते रहना पड़ेगा। और यह अनंतकाल तक चलता रहेगा। जब कभी भी मंदी की आहट सुनाई देगी ठीकरा मुद्रा भंडारण में इजाफे की कम दर के ही सिर फोड़ा जाएगा। आंदोलन इस असंतोष को और अधिक भड़का देंगे। यह केवल मेरे दिमाग की कोरी कल्पना मात्र नहीं है।

20 फरवरी 1975 को हैनरी फोर्ड द्वितीय ने अपनी मोटर कंपनी की निराशाजनक वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए 'सशक्त भरोसेमंद बेहतरी' के उपायों की जरूरत का जिक्र किया था। इनमें से एक था, 'संघीय कोष को कम अवधि के लिए मुद्रा भंडारण की दर 6 से 8 फीसदी कर देनी चाहिए।' मैं इसे ढेर सारे उदाहरणों में से एक के तौर पर पेश कर रहा हूं। यह खासतौर पर शिक्षाप्रद था क्योंकि यह एक राजनीतिज्ञ नहीं एक कारोबारी के विचार थे। एक माह बाद एक और जोरदार उदाहरण देखने को मिला। 18 मार्च को अमेरिकी सीनेट ने एक प्रस्ताव 860 से पारित कर फेडरल रिजर्व बोर्ड से मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाने के लिए कदम उठाने की मांग की, ताकि 'अर्थव्यवस्था को जल्द बेहतर' बनाया जा सके। प्रस्ताव के जरिये यह सुझाव भी दिया गया कि हाउस और सीनेट बैंकिंग कमेटी से मुद्रा की आपूर्ति के संदर्भ में 'उद्‌देश्य और योजना' को लेकर हर छह माह में सलाह-मशविरा कर ले। वास्तविकता में यह फेडरल रिजर्व बोर्ड (फेड) को स्फीतिकरण (इन्फ्लेटिंग) का आदेश था, शायद मुद्रास्फीति की दर बढ़ाने के लिए। साथ ही फेड को इस बात का भी अहसास करा दिया गया कि वह चाहे जो हो लेकिन स्वतंत्र नहीं है और सत्तारुढ़ राजनीतिक आका उसे आदेश दे सकते हैं। मुद्रावादियों का कार्यक्रम तो मौद्रिक प्रणाली को राजनीतिज्ञों के पैर की फुटबॉल बना देगा। और किस बात की अपेक्षा की जा सकती थी? क्या सरकार के हाथ में मुद्रा आपूर्ति की कमान देना नौसीखियों जैसा फैसला नहीं था और फिर यह उम्मीद करना कि वे अपने कार्यकाल के दौरान इसका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे? स्वस्थ मौद्रिक प्रणाली की पहली शर्त ही यह है कि इसको लेकर राजनीतिज्ञों के हाथ में कम से कम अधिकार दिए जाएं। यह हमें फिर सोने की ओर ले आता है। मुद्रा के तौर पर सोने की अभूतपूर्व साख ही है कि यह मौद्रिक प्रणाली को मुद्रा की आपूर्ति और क्रय शक्ति के मामले में सरकारी नियंत्रण से आजाद रखती है। यानी राजनीतिज्ञों, पार्टी नेताओं और दबाव बनाने वाले समूहों की पहुंच से भी दूर। सोने की साख का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह दुर्लभ है और कुदरत ने इसकी मात्रा को भी नियंत्रित रखा है। इसे खोजना, खनन करना और इसकी प्रोसेसिंग काफी खर्चीली है और यह महज सरकारी साख या सनक से नहीं किया जा सकता। सोने की योग्यता ही कहें कि यह उधार विस्तार की सीमा तय करती है।

आंशिक या पूर्ण आरक्षित?

सोने के दो तरह के मानक हैं। एक आंशिक आरक्षित प्रणाली (फ्रेक्शनल रिजर्व सिस्टम) और दूसरी शुद्ध सोना या 100 फीसदी आरक्षण प्रणाली (फुल रिजर्व सिस्टम)। आंशिक आरक्षित प्रणाली वो है जो 1815 से 1914 तक पश्चिमी देशों में पनपी और फली फूली। इसमें कथित लचीलापन होता था और इससे हम यह भी कह सकते हैं कि यह तंत्र जिम्मेदारीभरा था। इसमें कारोबार चक्र, तेजी-मंदी चक्र, उतार-चढ़ाव देखने को मिले। आंशिक आरक्षित प्रणाली के परिणाम देखने के लिए आइए एक देशमान लीजिए और रूरितानिया का उदाहरण देखें। यहां बैंक उधारकर्ताओं को मांग जमा (डिमांड डिपॉजिट) के आधार पर उधार देती है और इससे वे विभिन्न काम शुरू करते हैं। इस तरह की नई पूंजी से, कारोबार और रोजगार में मंदी से जूझने के बाद, रूरितानिया में कीमतें बढ़ेंगी। किसी चीज को बेचने के लिए रूरितानिया एक अच्छा बाजार हो जाएगा और खरीदने के लिहाज से कमजोर। कारोबार या भुगतान का संतुलन इसके खिलाफ काम करने लगेगा। यह रूरितानिया की मुद्रा की विनिमय दरों में गिरावट के तौर पर दिखने लगेगा, 'सोने के निर्यात के बिंदु' तक। इसके बाद सोना यहां से दूसरे देशों में जाने लगेगा। इसे रोकने के लिए रूरितानिया में ब्याज की दरों को बढ़ाना पड़ेगा। अधिक ब्याज दर और सोने के कम भंडारण के कारण मुद्रा की मात्रा कम हो जाएगी। इसका अधिकांश मामलों में मतलब तो अवस्फीति (डिफ्लेशन) या एक संकट है जिसके बाद गिरावट तय है। संक्षेप में, सोने की आंशिक आरक्षित प्रणाली से तेजीमंदी का उतार-चढ़ाव भरा दौर चलता ही रहेगा।

ऐसी प्रणाली में ब्याज दर में गिरावट या कोष की जरूरतों को कम करने के लिए लगातार राजनीतिक दबाव देखने को मिलता है। ताकि कर्ज विस्तार और मुद्रास्फीति को जारी रखा जाए या प्रोत्साहित किया जा सके। कर्ज विस्तार को मंजूरी के कारण आंशिक आरक्षण प्रणाली को बहुत फायदेमंद माना जाता है। लेकिन जिस बात की अनदेखी कर दी जाती है, वो यह है कि आवश्यक विधिसम्मत कोष के लिए चाहे जितनी सीमा तय की जाए, एक ऐसा बिंदु तो आएगा ही जब यह विधिसम्मत तय कर्ज विस्तार सीमा तक पहुंच जाएगा। इसके बाद फिर एक बार राजनीतिक दबाव बनेगा कि इस आवश्यक कोष का प्रतिशत कम किया जाए।

अमेरिका के आर्थिक तंत्र का यही इतिहास रहा है। फेडरल रिजर्व एक्ट का प्रभाव और आंशिक तौर पर उद्‌देश्य था कर्ज विस्तार कार्यक्षम मात्रा (पोटेंशियल वॉल्यूम) को बढ़ाना। नए फेडरल रिजर्व कानून के तहत सदस्य बैंकों की आवश्यक आरक्षित निधि को, पुरानी राष्ट्रीय बैंकों के लिए 15 से 25 फीसदी के बीच और नए सदस्य बैंकों के लिए 12 से 18 फीसदी के बीच तक घटा दिया गया था। 1917 में सदस्य बैंकों के लिए आवश्यक आरक्षित निधि को और कम कर 7 से 13 फीसदी की सीमा में कर दिया गया था।

कर्ज का पिरामिड मॉडल

सदस्य बैंकों को कर्ज का जो उल्टा पिरामिड बनाने की इजाजत दी गई थी, फेडरल रिजर्व बैंक ने उस पर अपना एक और उल्टा पिरामिड थोप दिया। रिजर्व बैंकों को अपनी जमा में आरक्षित निधि का केवल 45 फीसदी रखना पड़ता था और अपने नोटों के लिए सोने का 40 फीसदी कोष। बाद में आरक्षित निधि को लेकर रिजर्व बैंक के अधिकारियों का सदस्य बैंकों के साथ रवैया और अधिक सख्त होता गया। उदाहरण के लिए, उन्होंने 1936 में इसे तेजी से बढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन अपनी आरक्षित निधि के लक्ष्य तय करने में उसने काफी ढिलाई बरती। जून 1945 से मार्च 1965 के बीच आरक्षित निधि की जरूरतों को 35 से 40 के बीच की बजाय सीधे 25 फीसदी तय कर दिया था। और बाद में तो उन्होंने उसे समाप्त ही कर दिया। यह तो हुई इतिहास की बात। लेकिन भविष्य का क्या?

अगर दुनिया या कम से कम यह देश कभी होश में आया और उसने सोने के मानक की ओर लौटने की सोची तो आंशिक आरक्षित निधि की प्रणाली को कूड़े के ढेर में डालना पड़ेगा। अगर किसी चमत्कार के चलते अमेरिकी सरकार यह फैसला कल ही करती है तो यह तबाह कर देने वाले और बेवजह की मुद्रास्फीति लाए बगैर प्रत्ययी धन और कर्ज (फिडुशियरी मनी ऐंड क्रेडिट) या इसके पर्याप्त भाग को समाप्त किए बगैर संभव नहीं। लेकिन सरकार को कम से कम ऐसी और प्रत्ययी मुद्रा (फिडुशियरी करंसी) की आपूर्ति से बचना होगा। मान लीजिए कि तब सरकार डॉलर को सोने में तब्दील करने के लिए एक विनिमय दर तय करने में कामयाब होती है। एक ऐसी दर जो स्थायी हो और जो खुद मुद्रास्फीति या अवस्फीति का कारण नहीं बनेगी। अमेरिका फिर स्वस्थ मुद्रा और स्वस्थ स्वर्ण भंडार की ओर लौट सकता है। लेकिन आज दुनिया जिस तरह की है, उसमें असमंजस, महंगाई, शोर-शराबे में डूबी हुई निकट भविष्य में ऐसी किसी संभावना की कतई कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती।

मैंने जो इलाज बताया है वह इस धारणा पर आधारित है कि हमारी और अन्य सरकारें जिम्मेदार बनेंगी और एकाएक वह सबकुछ करने लगेंगी जो लंबी अवधि में सभी नागरिकों के हित में होगा, जो महज एक लालची समूह के तात्कालिक हितों के लिए नहीं होगा। आज की तारीख में ऐसा होना चमत्कार ही कहा जाएगा। लेकिन यह दृष्टिकोण निराशाजनक नहीं है। मैं शुरूआत इस बात से कर चुका हूं कि सदियों से हर एक अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा के निर्माण के लिए प्रयासरत है। आखिर वह सहमत क्यों नहीं होते? क्यों उनकी तमाम योजनाओं का परिणाम शून्य है? मेरी राय में उनकी नाकामी का कारण उनका काम की शुरूआत ही झूठी धारणा से करना है। यह धारणा कि मौद्रिक प्रणाली का निर्माण और प्रबंधन सरकार का ही हक होता है और होना चाहिए। यह धारणा एक अंतरराष्ट्रीय अंधविश्वास का रूप ले चुकी है। यह इस बात से सहमत होने की तरह है कि मौद्रिक प्रणाली को सत्तारुढ़ राजनीतिज्ञों के हाथ का खिलौना बनने दिया जाए।

संभावित मौद्रिक सुधारकों के प्रस्ताव नाकाम होने के मूलतः दो कारण हैं। वे नाकाम रहे क्योंकि वे एक मौद्रिक प्रणाली के आधारभूत काम को ही समझने में गलती कर बैठे। ढेर सारे मौद्रिक सुधारक यह धारणा लिए रहे कि मुद्रा का मुख्य गुण 'तटस्थता' है। और कई तो यह भी मान बैठे कि यही 'तटस्थता' एक ऐसी मुद्रा के निर्माण से हासिल की जा सकती है जो एक स्थायी और अपरिवर्तनीय 'मूल्य स्तर'  की ओर ले जाएगी। 1920 के दशक में इरविंग फिशर के 'समंजित डॉलर (कम्पंसेटेट डॉलर)' का यही लक्ष्य था। यही आज उनके आधुनिक चेलों, यानी कि मुद्रावादियों का भी लक्ष्य है। उनके उस प्रस्ताव में भी इसकी झलक मिलती है जो मूल्यों को तय सीमा में स्थिर रखने के लिए सरकार से मुद्रा की आपूर्ति में तीन से पांच फीसदी इजाफे की उम्मीद करता है। मेरी राय में तो यह लक्ष्य ही सवालिया निशान लगाए जाने के लायक है। वैसे इससे भी बड़ी गलती उन्होंने लक्ष्य को हासिल करने के लिए तय विधि के चयन में की है। वे इसे सत्तारुढ़ राजनीतिज्ञों के हाथ में मुद्रावादियों द्वारा पहले से ही तय फार्मूले के तहत मुद्रा से खिलवाड़ का अधिकार देना चाहते हैं।

स्वार्थी राजनीतिज्ञ

ऐसे सुधार जिस बात को समझ पाने में नाकाम होते हैं वह यह एक बार राजनीतिज्ञों या उनके द्वारा नियुक्त लोगों को ऐसे अधिकार दे दिए गए तो फिर यह तय सा है कि वे इन अधिकारों का इस्तेमाल सुधारकों द्वारा तय लक्ष्यों की बजाय निजी लक्ष्य हासिल करने के लिए करेंगे। राजनीतिज्ञ के निजी लक्ष्यों में सबसे महत्वपूर्ण होता है सत्ता में बने रहना। वे इस नीति को इस तरह से इस्तेमाल करेंगे कि वे सत्ता में बने रहें। वे मुद्रा का प्रकाशन जारी रखेंगे, क्योंकि इससेः

  1. 'क्रय शक्ति' में इजाफा करेगा और इससे संभवतया कारोबार और रोजगार भी बढ़ेगा
  2. यूनियन जितनी तेजी से पारिश्रमिक में इजाफा करेंगे ये उतनी ही तेजी से मूल्यों में वृद्धि करते रहेंगे ताकि रोजगार के अवसर बने रहें
  3. दबाव बनाने वाले विशेष समूहों को अनुदान और अन्य आर्थिक मदद दी जाएगी, बिना उनसे तत्काल कोई कर वसूले।

दूसरे शब्दों में राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता में बने रहने की सर्वश्रेष्ठ नीति मुद्रास्फीति ही रहेगी। निष्कर्ष यह कि मौद्रिक प्रणाली का निर्माण और प्रबंधन पूरी तरह से सरकार के यानी कि सत्तारुढ़ राजनीतिज्ञों के हाथ में रखना न केवल झूठा बल्कि नुकसानदेह भी है। क्योंकि वास्तविक हल तो ठीक उल्टा है। यह है सरकार को, जितना भी संभव हो, मौद्रिक प्रणाली से परे ही रखा जाए। स्वाधीनता के समर्थकों को पहले कदम के तौर पर सरकार और अदालतों को न केवल यह अनुमति देने के लिए मजबूर किया जाए या उनसे कानून ही बनवा दिया जाए कि स्वैच्छिक निजी अनुबंधों में सोने के बदले सोने से भुगतान संभव हो।

सोने की ओर वापसी का अभियान

आइए देखें कि अगर ऐसा होता है तो क्या होगा। मुद्रास्फीति की दर बढ़ने या फिर और अधिक अनिश्चित होने पर, अमेरिकी लंबी अवधि के अनुबंधों का भुगतान सोने में करने लगेंगे। क्योंकि ऐसे में विक्रेता और खरीदार कागजी या किसी भी अन्य तरह की मुद्रा के मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव को देखते हुए कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहेंगे। यह बात खास तौर पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों पर लागू होगी। इसके लिए विक्रेता या खरीदार को सोने का कुछ रिजर्व रखना होगा या फिर सोना खरीदने का भविष्य का अनुबंध (वायदा) करना होगा या फिर अनुबंध की तारीख के लिहाज से कागजी मुद्रा से खुले बाजार से सोना खरीदकर रखना होगा। कुछ समय बाद, अगर मुद्रास्फीति जारी रही तो, वर्तमान अनुबंध भी सोने में ही किए जाने लगेंगे। इस तरह कागजी मुद्रा, निजी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण मानकों में साथ-साथ बढ़ोतरी होगी। इसकी अनुमति देने वाले हर देश में तब दो मौद्रिक प्रणालियां एक साथ समानांतर काम करेंगी, दोनों के बीच हर रोज बदलते कारोबारी संबंध के साथ। और सरकारी मुद्रा के बेकार होते ही निजी स्वर्ण प्रणाली पूरी व्यवस्था को अपने हाथ में ले लेगी। जैसा कि नवंबर 1923 में जर्मनी में हुआ था। जैसा कई अन्य देशों में भी अलग अलग वक्त में हो चुका है।

एक निजी स्वर्ण मानक?

क्या एक निजी स्वर्ण मानक संभव है? ऐसा सवाल पूछने का मतलब इतिहास को भुलाना है जो इसका जवाब दे चुका है। निजी सोने के सिक्के और स्वर्ण मुद्रा, सरकार द्वारा मौद्रिक प्रणाली को राष्ट्रीयकरण को हाथ में लिए जाने से सदियों पहले से अस्तित्व में थे। तब राजाओं और सरकारों ने ऐसा करने का बहाना यह दिया था कि निजी सोने के सिक्को के आकार, गुणवत्ता या छपाई को लेकर कोई भरोसेमंद मानक नहीं था। यह जानना आसान नहीं था कि दिया गया सिक्का वाकई सोने का है या नहीं। यह भी तय नहीं था कि खोटा सिक्का पाने वाले को आखिर न्याय किस तरह से दिया जा सकेगा। लेकिन राजाओं के तर्क यहीं खत्म नहीं हुए, उनका कहना था कि अगर सिक्के एक जैसे होंगे और इस पर आसानी से पहचानी जा सकने वाली छाप होगी और अगर सरकार खुद फरेबियों को दंडित करने का काम अपने हाथ में ले ले तो लोगों का मुद्रा पर भरोसा लौट सकता है। कारोबारी लेन-देन और अधिक बेहतर हो जाएगा और इसमें वक्त भी कम लगेगा। सरकार के पक्ष में एक और तर्क खासतौर पर छोटे सिक्कों को लेकर दिया गया। कहा गया कि इतने छोटे सिक्के बनाना असंभव सा है जो ब्रेड के छोटे से टुकड़े या फिर जरा सा दूध खरीदने के लिए जरूरी हो।

इसलिए छोटे सिक्कों की दरकार बताई गई जो मानक का आधा, चौथाई, दसवां हिस्सा या फिर सौवां हिस्सा हो। यह सिक्के फिर किसी भी धातु से बने हों या फिर उनकी अंतर्भूत कीमत चाहे जो हो, विधिसम्मत और सर्वमान्य होंगे और उन्हें उन पर प्रकाशित कीमत के आधार पर स्वर्ण मुद्रा से बदला जा सकेगा। मैं मानता हूं कि वाकई ऐसे छोटे सिक्के मुहैया करा पाना निजी मौद्रिक प्रणाली के लिए मुश्किल होगा। क्योंकि तब हर एक के पास सिक्के छापने का अधिकार होगा और सोने के साथ उसके विनिमय का भी। एक निजी सिक्का प्रणाली शायद इस समस्या को हल कर सके, लेकिन मैं मानता हूं कि निजी तौर पर मैं इसका कोई ऐसा हल नहीं खोज पाया हूं जो जटिल, दुष्कर और अविश्वास भरा न हो। जाहिर है कि सरकार द्वारा मुहैया कराई गई या नियंत्रित की जाने वाली सिक्का प्रणाली के कुछ फायदे हैं। लेकिन इस फायदे की कीमत चुकानी पड़ती है। 19वीं सदी तक यह कीमत कम लगती थी, खासतौर पर 1914 तक, लेकिन आज सरकार की मुद्रा नियंत्रण की कीमत पूरी दुनिया में बहुत ज्यादा हो गई है। हमारे सामने जो समस्या है वह केवल मौद्रिक प्रणाली तक ही सीमित नहीं है। यह सरकार की शासन की समस्या है। यह वास्तविकता में हर मामले में सरकार की ही समस्या है। हमें सरकार की आंतरिक और बाहरी हिंसा पर काबू करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरत है। लेकिन हमें यह बात भी मानना पड़ेगी कि इंसान के किसी भी समूह पर आप आंख मूंदकर यकीन नहीं कर सकते। सत्ता का दुरुपयोग तो तय है और जितनी ज्यादा शक्ति हाथ में होगी दुरुपयोग की आशंका उतनी ही अधिक होगी। इसीलिए सरकार को कम से कम अधिकार दिए जाने चाहिए। लेकिन हर सरकार न्यूनतम अधिकारों का भी इस्तेमाल और अधिक ताकत हासिल करने के लिए करती है। ज्यादा ताकत वाली सरकार और अधिक ताकत हासिल करना चाहती है। 1914 के बाद से हुए दो विश्व युद्धों ने ही आज की छद्‌म सर्वशक्तिमान सरकारों को जन्म दिया।

लेकिन सरकार की समस्याओं का समाधान इस लेख की परिधि के बाहर की बात है। यह तय करना कि हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ मौद्रिक प्रणाली, अगर हम ऐसा कर सकें तो, अपने आपमें बहुत बड़ी समस्या है। लेकिन इस बड़ी समस्या का एक समाधान, मैं फिर एक बार दोहराना चाहूंगा, यही है कि कैसे राजनीतिज्ञों के चंगुल से मौद्रिक प्रणाली को आजाद कराया जाए। निश्चित तौर पर जब तक हम अपनी लगभग सर्वशक्तिमान सरकारों को कायम रखेंगे, स्वस्थ मुद्रा असंभव है।

- हेनरी हेजलिट एक प्रख्यात अर्थशास्त्री, पत्रकार और लेखक हैं। यहां उन्होंने विश्व बाजार में मुद्रा, मौद्रिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक नीतियों के संदर्भ में आदर्श मुद्रा से जुड़े उस सवाल की पड़ताल की है जो शायद आज हमारे सामने मौजूद एक बेहद महत्वपूर्ण समस्या है.