नागरिक गुणों की तलाश में.. - गुरचरण दास

नब्बे के दशक की बात है जब मैं पूर्व भारत में काफी भ्रमण किया करता था। अपनी इन यात्राओं से मैं इस नतीजे पर पहुंच गया था कि भारत जल्द ही आर्थिक तौर पर तरक्की कर लेगा और इतिहास में पहली बार भारतीय हर बात की कमी से जूझने से उपर उठकर एक ऐसे युग में पहुंच जाएंगे जब अधिकांश की जिंदगी आराम की होगी।

संपन्नता वाकई हर तरफ दिखने लगी। तेजी से विकास के 25 सालों में मध्यवर्ग बढ़कर लगभग 25 करोड़ के आंकड़े तक पहुंच गया है। जबकि 1980 से अब तक एक फीसदी गरीब हर साल गरीबी की रेखा को पार कर रहे हैं और ऐसे लोगों की संख्या लगभग 20 करोड़ तक हो गई है। अगर हमारी अर्थव्यवस्था अगले दो-तीन दशक तक तेज गति से बढ़ती रही तो कोई कारण नहीं दिखता जो इसी सदी के पहले 25 सालों में ही भारत की अधिकांश आबादी मध्यवर्गीय हो जाएगी। उस वक्त गरीबी खत्म तो नहीं हो जाएगी, लेकिन गरीबों की संख्या इतनी कम हो जाएगी कि उनका प्रबंधन किया जा सके और तब देश की राजनीति का स्वरूप भी बदल जाएगी। यह एक अच्छा समाचार है।

अब एक बुरा समाचार यह है कि संपन्नता के साथ ही सबसे भयावह शासन तंत्र भी फल-फूल रहा है। यह वाकई एक देखने लायक नजारा है. तेजी से विकसित होती निजी अर्थव्यवस्था (प्राइवेट इकोनॉमी) के बीच भारतीय, आम सार्वजनिक सेवाओं के लिए तरस रहे हैं। पहले स्थिति इससे ठीक उलट थी।

हमारे समाजवाद के दिनों में हम आर्थिक विकास को लेकर निराश होते थे, लेकिन हमारे सार्वजनिक संस्थान हमारे लिए गर्व का विषय हुआ करते थे। भारत में आज सरकारी ढांचा चरमरा रहा है। आज जबकि हमको शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आपूर्ति की सख्त जरूरत है, यहां पर शासकीय सेवाओं का प्रदर्शन निराशाजनक है। जहां इसकी जरूरत नहीं है वहां यह जरूरत से ज्यादा सक्रिय है। सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के अनुसार दिल्ली में एक स्कूल शुरू करने के लिए 11 लाइसेंसों की जरूरत होती है, जिसमें एक होता है इसकी अनिवार्यता का, और इनमें से अधिकांश के लिए रिश्वत मांगी जाती है।

जब मैं शासन की नाकामी का जिक्र करता हूं तो मैं भ्रष्टाचार के आम रूप का जिक्र नहीं कर रहा होता जैसे एक राजनेता रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। मुझे इस बात से कोफ्त होती है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में चार में से एक शिक्षक गायब रहता है और चार में से एक पढ़ाता नहीं है। सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर में पांच में से दो डॉक्टर आते ही नहीं, एक साइकल रिक्शा चालक अपनी दिन भर की कमाई का 15 फीसदी से ज्यादा पुलिस वाले को नियमित तौर पर रिश्वत में दे देता है। एक भारतीय गांव का एक किसान अपनी ही जमीन के मालिकाना हक के कागजात पटवारी को रिश्वत दिए बगैर हासिल नहीं कर सकता। 2004 में भारतीय संसद तक पहुंचे पांच सांसदों में से एक आपराधिक मामलों का सामना कर रहा था और औसतन हर 12 में से एक पर तो हत्या और बलात्कार तक के आरोप थे।

यह एक परेशान कर देने वाला सवाल उठा देता है क्या भारत ऐसे कुशासन के बाद भी तरक्की कर रहा है? भारतीयों को उन मूलभूत सेवाओं के लिए भी सरकार पर निर्भर रहना पड़ रहा है जो एक विकसित समाज में आसानी से मिल जाती हैं। उदाहरण के लिए अब तो गरीब भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर अपनी गरीब बस्तियों और गांवों में खुलने वाली निजी स्कूलों में दाखिला दिलवा रहे हैं। स्वास्थ्य और जल सुविधा के लिए भी यह बात सही है। भारतीय शासन में बिना बात के अनुदान, प्रोत्साहन इतने ज्यादा हैं कि जवाबदेही तय करना नामुमकिन है।

हमारे नैतिक ताने-बाने को सबसे बड़ा नुकसान उन बड़े समाचारों जैसे- जिहादी आतंक, गुजरात 2002, नक्सलवाद आदि से नहीं है, जिस पर मीडिया ध्यान केंद्रित कर रहा है, बल्कि शांत सी दिखने वाली रोजमर्रा की नाकामियों से है। जब कोई स्कूल टीचर अपनी ड्यूटी पर नहीं आती तो वह हमारे सामाजिक धर्म को क्षति पहुंचाती है। उस सोच को क्षति पहुंचती है जिसमें उसे गुरू का दर्जा हासिल है और जिससे शिष्यों को प्रेरणा मिलती है। साथ ही वह अपने छात्रों के लिए एक नागरिक के तौर पर गुणधर्म का एक बुरा उदाहरण छोड़ देती है। ऐसा लगता है कि नागरिक का सरकार की हर व्यवस्था से पड़ने वाला पाला संदेहों से भरा पड़ा है। मेरे वाहन के लाइसेंस की अवधि समाप्त होने जा रही है और मुझे यह सवाल सता रहा है कि उसके नवीनीकरण के लिए क्या मुझे रिश्वत देनी पड़ेगी?

आज आर्थिक सुधारों से भी ज्यादा जरूरी है भारत के सरकारी ढांचे में सुधार। हमें पुलिस, न्यायिक, प्रशासनिक और राजनीतिक सुधारों की जरूरत है। वे तमाम समाज जिनकी हम तारीफ करते हैं। उदाहरण के लिए स्कैंडिनेवियाई देश, यूनाइटेड किंगडम भी बुरे शासन के दौर से गुजर चुके हैं। लेकिन उनके यहां के गलैडस्टोन, डिजराइली और थैचर जैसे नेताओं में निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर सरकार की जवाबदेही तय करने का साहस था। क्या यही बात यूपीए के शीर्ष नेताओं के दिमाग और सरकार के एजेंडे में शीर्ष पर नहीं होनी चाहिए?

यह आलेख, लेखक ने अपनी नई किताब “द डिफिकल्टी ऑफ बिइंग गुडः ऑन द सटल आर्ट ऑफ धर्मा", एलन लेन/पेंगुईन 2009 के आधार पर ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के लिए विशेष तौर पर तैयार किया है। गुरचरण दास “इंडिया अनबाउंड” के लेखक और ‘प्रॉक्टर एंड गैम्बल’ के पूर्व सीईओ भी हैं।

गुरचरण दास