ऐसे कैसे होगा किसानों का भला..!

दिल्ली के बॉर्डर पर पिछले 100 दिनों से जारी किसान आंदोलन के बीच राजनैतिक दलों और राज्य सरकारों के बीच भी सियासी प्रतिस्पर्धा जारी है। यह प्रतिस्पर्धा स्वयं को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की है। किसानों (वोट) को अपने साथ लाने के लिए पहले पंजाब सरकार और उसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा संशोधित कृषि कानून लाए गए। इन कानूनों का उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के कारण किसानों के होने वाले ‘नुकसान’ को कम करना है। आज बात करते हैं राजस्थान सरकार द्वारा पारित तीन कृषि संशोधन विधेयकों की।

कुछ माह पूर्व राजस्थान सरकार द्वारा तीन कृषि संशोधन विधेयक पारित किए गए जिनका उद्देश्य केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों के ‘दुष्प्रभावों’ को निष्प्रभावी करना था। राजस्थान सरकार का कहना है कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी और उनके लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित होगी। लेकिन विधेयकों पर ध्यान देने से पता चलता है कि इसके प्रावधान किसानों की मदद करने की बजाए लंबे समय में उन्हें नुकसान ही पहुंचाएंगे।

राजस्थान द्वारा पारित नए विधेयक राज्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमतों पर कृषि उपज के अनुबंध पर रोक लगाते हैं। लेकिन इस विधेयक के साथ एक व्यावहारिक समस्या है। कृषि उपज के लिए एमएसपी की घोषणा जहां प्रत्येक (वर्ष) मौसम में होती है वहीं किसान और खरीदार के बीच कृषि उपज के लिए अनुबंध पांच मौसमों तक प्रभावी रह सकता है। विधेयक में यह स्पष्ट नहीं है कि करार पर हस्ताक्षर करने की तारीख की एमएसपी या कृषि उपज की आपूर्ति की तारीख की एमएसपी में से कौन सी एमएसपी मापदंड होगी। इस प्रकार कृषि उपज के लिए एक से अधिक मौसम तक करार करने के समय यह दिक्कत आएगी कि अगले मौसम के लिए उपज की कीमत कौन सी निर्धारित की जाए। चूंकि एमएसपी से कम पर खरीदी निषेध होगी इसलिए खरीदार करार करने से बचेंगे और अंततः नुकसान किसानों का ही होगा।

संशोधन कृषि उपजों को एमएसपी से कम कीमत पर खरीद पर रोक लगाता है, भले ही उसपर दोनों पक्षों में सहमति क्यों न हो। यह साफ नहीं है कि राज्य को एमएसपी से कम कीमतों पर कृषि उपज ना बेचने के लिए किसानों पर जोर डालने की खातिर कानूनी ताकत का सहारा लेने की क्या जरूरत है। अगर सरकार की एमएसपी ज्यादा है तो उससे कम पर कौन अपनी फसल बेचना चाहेगा? कोई किसान केवल इस कारण से एमएसपी से कम पर अपनी फसल बेचेगा अगर एपीएमसी तक फसल ले जाने का खर्च या एपीएमसी में ज्यादा शुल्क या किसी दूसरे तर्कसंगत कारण से किसान का अंतिम मुनाफा कम होता हो। यह विधेयक किसानों को निजी पार्टियों के साथ लेन-देन में अनिच्छुक भागीदार मानता है, जबकि निजी बाजारों को राज्य संचालित एपीएमसी के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

विधेयक राजस्थान सरकार को कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) के बाहर कृषि उपज की बिक्री पर शुल्क लगाने की मंजूरी भी देते हैं। विधेयक में कहा गया है कि कर की कीमत का बोझ किसान पर नहीं पड़ेगा बल्कि यह कर खरीदार को कृषि उपज खरीदते समय चुकाना होगा। चूंकि बाजार को कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा करनी होती है और उन्हें किसानों के लिए आकर्षक होना पड़ता है। अब सरकार को राज्य संचालित मंडियों के बाहर होने वाले व्यापार पर कर लगाने की मंजूरी देने से किसानों को आखिर में मिलने वाली बिक्री की कीमत का प्रतिशत कम होगा। यह संशोधन किसानों के उतने हित में नहीं है जितना कि बताया जा रहा है।

विधेयक के प्रावधान शोषण को अपराध के दायरे में डालते हैं। शोषण को अपराध मानना सही है। यहां इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि इसके लिए परिभाषाएं और सजा क्या हैं। अधिनियम कहता है कि कोई व्यक्ति अगर कृषि उपज की आपूर्ति पर सहमत हुआ था और फिर आपूर्ति होने पर उसे तीन दिन के भीतर स्वीकार नहीं करता या उसके लिए कीमत का भुगतान नहीं करता यह शोषण है। इसके लिए उसे तीन से सात साल की जेल की सजा हो सकती है। बहुत सारे लोगों को यह सजा काफी ज्यादा लग सकती है।

राजस्थान में पारित हुए इन संशोधन विधेयकों का निश्चित असर यह होगा कि इससे कृषि क्षेत्र से निजी निवेश दूर चले जाएंगे। कोई भी कृषि-व्यापार राजस्थान में क्यों कारोबार करेगा और किसानों के साथ अनुबंध पर क्यों हस्ताक्षर करेगा जब उसे अतिरिक्त कर देना होगा, बदली हुई कीमतें देनी होंगी और साथ ही जेल की सजा का खतरा झेलना होगा? उनके लिए पड़ोसी राज्य कृषि निवेश के लिहाज से कहीं ज्यादा आकर्षक विकल्प होंगे।

जैसे विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को मुक्त करने से देश में समृद्धि आयी है, समय आ गया है कि कृषि को भी मुक्त किया जाए ताकि भारतीय किसान और भारत दोनों तरक्की करें।

- अविनाश चंद्र