संप्रग सरकार की लाचारी

यदि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देने के फैसले के जरिये सरकार उस बनती धारणा को समाप्त करना चाह रही थी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दूसरे कार्यकाल में नीतिगत स्तर पर लकवाग्रस्त स्थिति है, तो सरकार मकसद में बुरी तरह नाकाम हुई। इसके बजाय संप्रग के नाराज सहयोगी दल आरोप लगा रहे हैं कि उनसे परामर्श नहीं किया गया, सत्तारूढ़ कांग्रेस में भी विरोधाभास के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं और एकजुट विपक्ष संसद के भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर सरकार को कमजोर करने पर आमादा है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जोर देकर कहा है कि तृणमूल कांग्रेस बहु-ब्रांड खुदरा बाजार को खोलने पर सहमत नहीं है और इस फैसले को वापस लेने की मांग जोर पकड़ रही है। लेकिन संप्रग नेताओं को यह नहीं समझना चाहिए कि इस निर्णय को पलटने से वे इस गंध से बाहर आ जाएंगे। बिलकुल नहीं, बल्कि यह एक और सवाल खड़ा करेगा। यही प्रश्न कि यह सरकार सत्ता में क्यों है, बस ऐसे ही? तकरीबन दो साल पहले राजधानी में सत्ता के गलियारों में संप्रग की वापसी के बाद से खुदरा में एफडीआई का फैसला सुधारों की दिशा में लिया गया इस सरकार का पहला और इकलौता निर्णय है।

इसलिए कोई हैरत की बात नहीं कि सरकार लकवाग्रस्त स्थिति के लिए कुख्यात हुई है। यदि सरकार इस सुधारवादी कदम से भी पीछे हट जाती है तब इसकी झोली में आखिर कौन सी बढिय़ा उपलब्धि रह जाएगी? याद रखिए कि यह सुधार एक कार्यकारी फैसला है जिसके लिए सदन के भीतर जटिल तिकड़में नहीं भिड़ानी होंगी। इससे शहरी मध्य वर्ग और किसानों को मिलने वाला लाभ एकदम स्पष्ट है और यह ऐसा वर्ग समूह है जिसका समर्थन हासिल करने और उन्हें एकजुट करने में मुश्किल नहीं आनी चाहिए। इस विचार को अकादमिक अध्ययनों और कारोबारियों का समर्थन मिला है। इसके प्रमुख तत्व वही हैं जिन पर मुख्य विपक्षी दल पूर्व में प्रतिबद्घ रहा है। इन सभी सहयोगी कारकों के बावजूद संप्रग के लिए इसे सिरे चढ़ाना मुश्किल लगता है।

सुधार से संबंधित एक सीधे-सादे फैसले के उचित प्रबंधन के बजाय सरकार ने खुद को और कमजोर बना लिया है, जिससे विपक्ष को उस पर हमला करने का मौका मिल रहा है और इससे संसद के महत्त्वपूर्ण शीतकालीन सत्र की पूरी अवधि के लिए जोखिम उत्पन्न हो गया है। इस तरह की गड़बड़ी सरकार की असफलता दर्शाती है जहां उपयुक्त तैयारी और राजनीतिक प्रतिबद्घता की कमी नजर आती है। सरकार इस फैसले पर विपक्ष के विरोध का आकलन करने में भी नाकाम रही और उसने संसद बाधित करने के लिए विपक्ष को आसान बहाना मुहैया कराते हुए सत्र के दौरान ही इस फैसले पर मुहर लगाई। साथ ही यह अपने छोटे और कम उदार सहयोगी दलों को समझाने में नाकाम रही कि इससे उनके लिए कोई खतरा पैदा नहीं होगा।

सरकार यह संदेश देने में भी मात खा गई कि कांग्रेस मजबूती के साथ उसके संग खड़ी है। वास्तव में प्रधानमंत्री ने तार्किक बयान देते हुए इसे महंगाई और निवेश के साथ जोड़ा। लेकिन सत्ताधारी दल के दूसरे वरिष्ठ नेता कहां थे? सुधारों पर ऐसे मिश्रित संकेतों के साथ सुधार नहीं हो पाएंगे। यदि आसानी से लागू होने वाला यह फैसला वापस लिया जाता है, तो दूसरे फैसले कैसे टिक पाएंगे? दूसरे कार्यकाल में संप्रग ने अक्षमता दिखाते हुए बुनियादी काम की उपेक्षा की है, सहयोगियों को आश्वस्त नहीं किया, संसद में चेहरा बचाने के लिए विपक्ष की मान मनौवल नहीं की। गठबंधन के नेताओं को यह हकीकत समझनी ही होगी कि उनके पास दो ही विकल्प हैं: सुधर जाओ या बरबाद हो जाओ।

साभार: बिज़नेस स्टैण्डर्ड