प्रतिबंध समस्या का समाधान नहीं समस्या को बढ़ाने वाला कारक है (अंतिम भाग)

प्रतिबंध को समस्या का एकमात्र समाधान मानने के दुष्परिणाम के रूप में राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक व गुटखे पर लगी पाबंदी के बावजूद खुले आम बिक्री, प्रयोग और सेवन के तौर पर देखा जा सकता है। गुटखे पर लगे प्रतिबंध के लगभग तीन माह और प्लास्टिक पर प्रतिबंध को एक माह बीत जाने के बावजूद दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक बैग व गुटखों की उपलब्धता व प्रयोग खुलेआम न दिखता हो। और तो और डलाव व कूड़ा घरों में कूड़े से ज्यादा प्लास्टिक व पॉलीथीन देखने को मिल रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि गुटखा उत्पादकों ने इस प्रतिबंध का भी आसान तोड़ निकाल लिया है। चूंकि पान मसाला व तंबाकू पर रोक नहीं है इसलिए गुटखे की सामग्री (पान मसाला व तंबाकू) अब अलग अलग पैकेट में बिकने लगी है। कानूनी तौर पर कोई जांच अधिकारी न तो पान मसाला व तंबाकू अलग अलग पैकेट में बेचने वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकता है और ना ही इसे खरीदने वाले के खिलाफ। इस प्रकार, तंबाकू सरेआम बाजार में उपलब्ध है। उधर, प्लास्टिक का भी बदस्तूर प्रयोग जारी है। हर दुकान और बाजार में न केवल प्लास्टिक मौजूद है बल्कि ग्राहक भी हाथ में पॉलीथीन कैरीबैग लेकर घूमते दिखाई देते हैं जबकि दोनों कार्यो पर प्रतिबंध है।

अब इसके दुष्परिणाम की तरफ ध्यान दें। सबसे पहले तो यह कि अलग-अलग पैकेट में तंबाकू व पान मसाला मिलने से इसकी हानिकारकता और बढ़ जाती है। चूंकि गुटखे में सरकार की तरफ से तय मात्रा में तंबाकू मिलाया जाता है जबकि अलग से मिलाकर खाने वालों को इसकी कोई जानकारी नहीं होती। उपभोक्ता (ज्यादा स्ट्रांग बनाने के चक्कर में) पान मसाले में ज्यादा तंबाकू मिलाकर खा लेता है और अनजाने में कैंसर को और जल्दी दावत देने लगा है। दूसरा दुष्परिणाम यह कि गुटखे पर वैधानिक चेतावनी के साथ कैंसर बीमारी की भयानक तस्वीर जो छपती थी वह पान मसाले के पैकेट पर नहीं होती। जिससे गुटखे के सेवन और उससे होने वाली बीमारियों के प्रति जागरूकता कार्यक्रम को भी बाधा पहुंच रही है और लोग बेफिक्र होकर इसका सेवन कर रहे हैं। तीसरा महत्वपूर्ण दुष्परिणाम यह कि कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों की चांदी हो गई है और उपभोक्ताओं को तीन से चार सौ फीसदी तक अधिक दाम चुकाने को मजबूर होना पड़ रहा है। दरअसल, गुटखे की बिक्री पर प्रतिबंध होने के कारण पहले जो गुटखा एक रूपए में उपलब्ध होता था वह अब तीन से चार रूपए में मिलता है। गौरतलब है कि यह अतिरिक्त पैसा दुकानदारों व व्यापारियों की जेब में जा रहा है जबकि सरकार को टैक्स मिलना बंद हो गया है।

इसी प्रकार, पॉलीथीन का कोई विकल्प उपलब्ध कराए बगैर इसके प्रयोग पर सीधे प्रतिबंध लगाने से क्रेता विक्रेता दोनों परेशान हैं और प्रतिबंध की अनदेखी को मजबूर हैं। दरअसल, प्रयोग की आसानी के कारण प्लास्टिक जैसा अविष्कार लोगों के दैनिक जीवन में इस प्रकार घुलमिल गया है कि आसानी से इसके प्रयोग को बंद कर देना संभव नहीं रह गया है। इसके अतिरिक्त प्लास्टिक के प्रयोग की जगह अब पेपर बैग (ठोंगा) के प्रयोग का प्रचलन बढ़ने लगा है। पेपर की खपत इतनी होने लगी है कि मांग के बराबर आपूर्ति के लिए बड़ी तादात में पेड़ों के काटे जाने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। यदि समय रहते इसे रोका नहीं गया तो पर्यावरण संरक्षण के जिस उद्देश्य के तहत प्लास्टिक पर रोक लगाई गई थी, पेड़ों के कटने से स्थिति और ज्यादा भयावह हो जाएगी।

अब बात समाधान की। चूंकि प्रतिबंध किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि स्वयं एक समस्या है और आजतक किसी समस्या का समाधार प्रतिबंध के रास्ते ढूंढा नहीं जा सका है। किसी समस्या का समाधान सिर्फ और सिर्फ जागरूकता और वस्तु के प्रयोग के बाबत मानक तय कर किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि गुटखे के उत्पादन के दौरान उसमे तंबाकू व हानिकारक रासायनिक पदार्थों के लिए मानक तय कर दिए जाएं और कड़ाई से उसका पालन सुनिश्चित कराया जाए तो इससे होने वाले दुष्प्रभावों को थोड़ा कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त गुटखे पर भारी टैक्स लगाया जा सकता है जिससे उत्पादन महंगा हो जाए और उपभोक्ता धीरे धीरे स्वयं इसके प्रयोग को कम करने पर मजबूर हो जाए। टैक्स से प्राप्त धनराशि को जागरूकता कार्यक्रमों में खर्च किया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसके दुष्परिणामों से अवगत कराया जा सके। इससे उत्पादन में जुटे लोग झटके से बेरोजगार भी नहीं होंगे और उन्हें सरकार को सहयोग करने के लिए प्रेरणा भी मिलेगी।

ऐसे प्रयोग दुनिया के कई देशों में किए जा चुके हैं जिनके परिणाम सकारात्मक देखने को मिले हैं। सन् 1995 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक ऐसा ही प्रयोग किया गया। वहां सिगरेट पर भारी कर लगाया गया उस कर से होने वाली आय को विज्ञापन व जागरुकता कार्यक्रमों के लिए प्रयोग किया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि सिगरेट के प्रयोग में तत्काल 8-10 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जो बाद में 10-13 प्रतिशत तक पहुंच गई। इस प्रयोग के बाद वहां की सरकार ने ऐसे ही प्रयोग कई अन्य वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करने में किया।

सोचिए, क्या भारत में ऐसे प्रयोगों को प्रोत्साहन देने पर काम नही किया जा सकता। क्या हम प्रतिबंध थोपने की बजाए कुछ ऐसा नहीं कर सकते जो वास्तव में कारगर हो।

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अविनाश चंद्र