क्या गुजरात विकास की महान गाथा है?-----(3)

गुजरात ने इस दलील को गलत साबित कर दिया है कि लोगों को कम दाम में बिजली चाहिए होती है और वह ज्यादा दामों का भुगतान नहीं करना चाहते।गुजरात का अनुभव बताता है कि  लोग भुगतान करने को तैयार होते हैं  बशर्ते बिजली सप्लाई बेहतर हो।यह ज्योतिग्राम योजना के साथ भी हुआ है ।एक बार जब बिजली पूर्व निर्धारित समय पर उपलब्ध हो जाती है तो कृषि के लिए मिलनेवाली सब्सिडाइज्ड रेटवाली बिजली को घरेलू खपत के लिए इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति कम हो गई  है। ज्योतिग्राम योजना ने बिजली के ट्रांसमिशन और वितरण के दौरान होनेवाले नुक्सानों को कम किया है। उसने ट्रांसफारमर खराबी घटनाओं को कम करने में  भी मदद की है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस योजना ने सारे गांवों तक बिजली पहुंचाई है वह भी बिना लोड शेडिंग के। इससे सामाजिक –आर्थिक लाभ कई गुना बढ़े हैं।

क्या गुजरात की कोई य़शोगाथा है ? स्पष्ट है हां।यह गुजरात राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में  उच्च वृद्धि दर में प्रतिबिंबित होती है। आंकड़े मिलने में मुस्किल होने के बावजूद वह  विषमता को बढ़ाए बगैर गरीबी के कम होने में प्रतिबिंबित होती है। लेकिन क्या यह सुधार मानवीय विकास सूचकांकों में प्रतिबिंबित होता है विशेषकर पिछड़े क्षेत्रों और पिछड़े वर्गों के लोगों में।

सबूत बताते हैं कि सुधार हुआ है।खासकर 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में इन क्षेत्रों और इन वर्गों पर बिशेष द्यान दिए जाने के बाद।इसलिए यदि गुजरात की असमान विकास के लिए आलोचना की जाती है तो इन आकंड़ों की टाइम लाइन को देखना महत्वपूर्ण होगा।2007 के पहले के आंकड़े ठीक नहीं हैं।और यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सामाजिक क्षेत्र के नतीजे मिलने में समय लगता है। ज्यादा से ज्यादा आप यह शिकायत कर सकते हैं कि अभी ये सुधार उत्तरी और मध्य गुजरात में प्रतिबिंबित नहीं हुए हैं।

यदि कोई गुजरात की इस यशोगाथा को स्वीकार करता हैं तो उसका अगला सवाल होता है  कि गुजरात माडल क्या है। राज्य मे व्यक्तिगत पहल और उद्यमशीलता के लिए आजादी दी गई है और राज्य ने इसके लिए अनुकूल माहौल पैदा किया है।यह नियोजन के सशक्तिकरण और लोगों के सशक्तिकरण का उदाहरण है। यह विशिष्ठ योजनाओं के द्वारा लक्ष्य-उन्मुख सार्वजनिक खर्च की व्यवस्था है।इसमें केंद्र के अनुदान से चलनेवाली योजनाओं के साथ राज्य की विशिष्ठ योजनाओँ को पूरक बनाया गया है।

यह विकास का एक मानक सांचा है जिसे कोई भी राज्य अपना सकता है और लागू कर सकता है। फर्क यह है कि बहुत राज्यों ने इसे अपनाया नहीं है। वैसे गुजरात के माडल को सफल तरीके लागू करने में जिन विभिन्न कारकों का हाथ  है उन्हें अलग कर पाना मुश्किल है।वैसा पहला कारक हे विरासत का।2002 के पहले की सरकारों ने भी अच्छा प्रभाव छोड़ा है।

गुजरात में निजी उद्यमशीलता और सरकार के प्रति संदेह करने की स्वस्थ परंपरा रही है ।तीसरा  पानी और बिजली के क्षेत्र में गुजरात को अनुकूल स्थितियों का लाभ मिला। चौथा वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व ने नौकरशाही के सशक्तिकरण,भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ,नियोजन  और  डिलीवरी के विकेंद्रीकरण और पिछडे वर्गों और पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए सुनियोजित हस्तक्षेप   कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।हालांकि इन कारकों को अलग अलग नहीं किया जा सकता लेकिन चौथे कारक के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अस्मिता के प्रति गर्व ऊपर से शुरू होता है और नीचे तक रिसता जाता है और यह प्रक्रिया काफी हद तक पूरी हो चुकी है।

- बिबेक देवराय
जानेमाने आर्थिक मामलों के लेखक हैं। हाल ही में गुजरात पर उनकी पुस्तक छपी है। हाल ही में उसके कुछ अंश इकानामिक टाइम्स में छपे थे। हम उसका हिन्दी अनुवाद यहां प्रकाशित कर रहे हैं।