सरकार को जवाबदेह कैसे बनाएं ? ( 2 )

गरीबों द्वारा चुने विकल्पों

का सम्मान करने

की जरूरत

वाउचर और सशर्त नगदी देने के नए साधन सामाजिक सेवा प्रदाताओं में प्रतियोगिता पैदा कर सकते हैं और उपभोक्ताओं को विकल्प दे सकते हैं। सरकार स्कूलों को पैसा देने के बजाय अभिभावकों को स्कूल वाउचर देगी। जिन्हें वे शिक्षा की सेवा हासिल करते समय सरकारी या प्रायवेट स्कूलों में इस्तेमाल कर सकते हैं। अब सरकारी पैसा केवल सरकारी स्कूलों का एकाधिकार नहीं होगा। वह ऐसे किसी भी स्कूल को उपलब्ध होगा जिसे अभिभावक वास्तव में चुनेंगे। सरकारी पैसे के लिए सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में प्रतियोगिता होगी। दोनों तरह के स्कूलों में गुणवत्ता बढ़ाकर और फीस कम करके  छात्रों को आकर्षित करने और उन्हें अपने स्कूलों से जोड़े रखने की होड होगी। सेंटर फार सविल सोसाइटी के स्कूल चयन कार्यक्रम ने दिल्ली के गरीब इलाकों में स्कूल वाउचर की संकल्पना का परिक्षण करने के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। (पूरा खुलासा : मैं सेंटर फार सिविल सोसायटी का अध्यक्ष हूं, (www.ccs.in)। मध्यप्रदेश ने राशन की दुकानों से सब्सिडाइज्ड अनाज देने के बजाय अनाज के वाउचर या कूपन जारी किए हैं। दिल्ली ने भी इसी तरह का पायलट शुरू करने के लिए एसईडब्लूए। की मदद ली है।

इसी तरह सशर्ते नगदी देना भी जवाबदेही बढ़ाने का कारगर तरीका है। इस सिलसिले में किए गए पायलटों में पहला  पायलट बिहार में किया गया था जहां स्कूल जानेवाली लड़कियों को साइकिलें दी गईं थी। नीतीश कुमार की सरकार ने अन्य सरकारों की तरह साइकिलें खरीदकर उन्हें भेंट नहीं की। इसके बजाय उन्होंने अभिभावकों को 2000 रूपये इस शर्त के साथ दिए कि वे अपनी बेटियों के लिए साइकिल खरीदेंगे।किसी ने विशेषकर गैर सरकारी संगठनों ने जो गरीबों के प्रवक्ता होने का दावा करते हैं सोचा भी नहीं था कि अभिभावक वास्तव में साइकिलें खरीदने के लिए पैसे का उपयोग करेंगे।लेकिन एक अध्ययन के मुताबिक 92 प्रतिशत अभिभावकों ने साइकिले खरीदीं। क्या और कोई सरकारी योजना ऐसी है जिसमें सफलता की दर 90 प्रतिशत हो।

 शिक्षा के क्षेत्र में वाउचर और सशर्त नगदी देना चयन और प्रतियोगिता के द्वारा जवाबदेही बढ़ाने के  लिए बहुत महत्वपूर्ण साधन हैं। सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की सामाजिक सेवाओं पर खर्च होता है और जवाबदेही के ये नए साधन यह पता करते हैं कि सरकारी सेवाएं लोगों को लाभ पहुंचा रही हैं या नहीं। दुर्भाग्यवश  गैर सरकारी संगठनों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो पुराने सरकारवादी डीलीवरी सिस्टम से को मानती है। वे हर उस कदम को गरीब विरोधी करार देती हैं जो उनकी वित्तीय मध्यस्थता पर निर्भर नहीं होता और जिसमें गरीबों का विकल्पों पर सीधा नियंत्रण होता है। अब हमारे सामने वास्तविक चुनौती यह है कि हमें बहस को विचारधारा से आगे  निकलकर अनुभवजन्य प्रमाणों और नतीजों की तरफ ले जाना चाहिए। अभिजित बनर्जी और इसथर  डुफलोस द्वारा लिखित पुस्तक  - पुअर एकानामिक्स – में पायलट प्रोजेक्टों पर आधारित शोध की शक्ति को स्पष्ट किया गया है। इन प्रयोगों ने हमें बताया है कि गरीबों द्वारा चुनें गए विकल्पों को समझने और उनका सम्मान करने की जरूरत है। गरीब के कई रूप और आकार –प्रकार हैं इसलिए कोई जादुई छड़ी या एक समाधान नहीं है जो हरेक पर लागू हो। बड़े स्तर की उन योजनाओं जिनकी सफलता की कोई गारंटी नहीं है पर जनता का पैसा फूंकने से पहले  योजनाओं के  अलग अलग तरह के समाधानों का परीक्षण करने की जरूरत है। मुझे उम्मीद है कि जब वे पायलट प्रोजेक्टों के अनुभवजन्य नतीजों को देखेंगे और उन्हें गरीबों की तरफ से बोलने से पहले लोगों से सलाह लेनी ही चाहिए तब वे जवाबदेही के इन नए साधनों के महत्व को समझेंगे।

पुस्तक में जो छह पहलों का जिक्र है उनमें से पहली पहल सूचना पहल के बारे में है। यह सही भी है क्योंकि पूरी सूचना के बगैर पूरी जवाबदेही नहीं हो सकती। सूचना का अधिकार कानून सरकार को जवाबदेह बनाने के आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता है। इसके बावजूद आमतौर पर इस बात पर गौर नहीं किया जाता कि सूचना के अधिकार कानून ने सरकार पर  दो भिन्न् प्रकार की जिम्मेदारियां डालीं हैं । पहली जिसके बारे में सभी जानते हैं कि जब मांगी जाए तब सूचना उपलब्ध कराई जाए।दूसरा सरकार की जिम्मेदारी है कि   न मांगे  जाने पर भी सूचनाएं प्रकाशित करे। सूचना के अधिकार कानून के खंड4 में इसका उल्लेख है। संक्षेप में सूचना का अधिकार = सूचना प्रदान करने जिम्मेदारी + प्रकाशित करने की जिम्मेदारी

गैस सरकारी संगठनों और जन जागरण वालों की सक्रियता मुख्यरूप से सूचना प्रदान करने की ड्यूटी पर केंद्रीत रही है। लेकिन प्रकाशन से संबंधित खंड चार भी कानून का ज्यादा महत्वपूर्ण अंग है। सूचना के अधिकार की आदर्श व्यवस्था वह होगी जिसमें लोगों को सूचना हासिल करने के लिए कम आवेदन करने पड़े क्योंकि लोग जो जानना चाहते हैं उसे सरकार स्वयंमेव प्रकाशित कर देगी। हमें आदर्श व्यवस्था रातोंरात नहीं मिल सकती लेकिन यदि हम दो नई प्रथाओं को लागू करें  तो हम 10 -15 वर्षों में आदर्श व्यवस्था  के बहुत नजदीक होंगे।

पहली प्रथा को डीजीटल DTF/RTI : कह सकते हैं। ऐसी सारी जानकारी को आनलाइन उपलब्ध कराया जाए जिसे सूचना का अधिकार कानून के तहत आवेदन करने पर प्रदान किया जाता है। सूचना का अधिकार कानून के तहत जो भी जवाब दिए जाते हैं डीजीटल फार्मेट में तैयार किया जाता है। इसलिए सूचना अधिकारी को  उसे आनलाइन उपलब्ध कराने के लिए ज्यादा परिश्रम नहीं करने पड़ेगे। इससे सूचना अधिकारी का बहुत सारा समय और मेहनत बचेगी। लोग सूचना के लिए आवेदन नहीं करेंगे क्योंकि वह डिजीटल सूचना अधिकार के तहत पहले ही दी जा चुकी होगी।,सूचना के लिए आवेदन करने से पहले व्यक्ति यह  आरटीआई के पोर्टल पता कर लेगा कि  वह जानकारी पहले से उपलब्ध है या नहीं या किसी ने पहले उसके बारे में जानकारी हासिल करना चाही है या नहीं। इससे सरकार और साथ ही साथ लोगों का भी समय और पैसा बचेगा। यह सभी पक्षों के लिए लाभकारी है।

दूसरे परिवर्तन को दस सबसे आवश्यक कहा जा सकता है : खंड 4(1)(b) में 16 मदों की सूची दी गई है जिनके बारे में स्वयमेंव सूचनाएं प्रकासित करनी हैं। इसमें इक और बात जोडी जानी चाहिए कि किसी वर्ष में किसी सरकारी कार्यालय से दस सबसे ज्यादा चाही गई याचनाएं खंड़ 4 (1) का हिस्सा बन जाएं। इस तरह अकसर  मांगी गई सूचनाएं अगले वर्ष सरकार द्वारा दी जानेवाली सूचनाओं का हिस्सा बन जाएंगी। यदि इसे पूरी तरह से लागू किया गया तो वे सभी सूचानाएं जिन्हें लोग हासिल करना चाहते हैं वे कुछ वर्षों में बगैर मांगे ही उपलब्ध होंगी।

जवाबदेही के हमारे युद्ध में सूचना की पहल हमारी पहली पहल होनी चाहिए जैसा की पुस्तक में है।जय की पुस्तक एक चिंतित  नागरिक की तैयार होने की अपील है। यह गुस्से से जागरूकता और जागरूकता से कार्रवाई की तरफ ले जाती है।मैं उम्मीद करता हूं कि नागरिक इस अपील को सुनेंगे ताकि भारत खुशी और खुशहाली हासिल कर सके।

- पार्थ जे शाह