सरकार कैसे दे पाएगी सबको रोजगार?

इन दिनों उत्तर प्रदेश के रोजगार केंद्रों के दिन फिर गए हैं पिछले कई वर्षों से उजाड़ पड़े रहनेवाले रोजगार केंद्रो में फिर लंबी-लंबी कतारें लगने लगी हैं। उजाड़ पड़े रहने की वजह यह थी कि  सरकार के पास देने के लिए नौकरियां हैं कहां। जब रोजगार केंद्रों में नौकरियां मिलती नहीं तो भला लोग जाएं किस लिए। सरकार के पास देने के लिए नौकरियां अब भी नहीं है लेकिन नई सरकार नई रोशनी लेकर आई है। उसका वायदा है कि (हम रोजगार नहीं दे सकते तो क्या) बेरोजगारी का भत्ता देंगे। लोग भी यह सोचकर खुश हैं कि भागते भूत की लंगोटी भली। सरकार से जो भी मिल जाए बुरा क्या है। इसलिए रोजगार केंद्रों पर नाम दर्ज कराने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है। कहीं कहीं तो भीड़ इतनी बेकाबू हो गई कि पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। अबतक लोखों लोग बेकारी भत्ता पाने की उम्मीद में रोजगार केंद्रों में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। इनमें युवा ,अधेड़ और बूढ़े हर तरह के लोग है। बेकारी भत्ता पाने की उम्मीद लागाए लोगों की तादाद इतनी बढ़ती जा रही है कि अब सरकार कोई रास्ता निकालना चाहती है जिससे उनकी संख्या को सीमित किया जा सके।

दरअसल हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में वोटरों को लुभाने के लिए  एक से बढ कर एक ढपोर शंखी वायदे किए गए थे। उनमें से ही एक वायदा था बेरोजगारों को 1000 रुपये महीना बेरोजगारी का भत्ता दिया जाएगा।

यदि अखिलेश के नेतृत्व में बनी नई सरकार सचमुच अपने किए वायदों को लागू करने में गंभीरता से जुट जाए तो खजाना खाली हो जाएगा। लेकिन चुनावी युद्ध में जूझ रहे राजनीतिज्ञों को इसकी परवाह नहीं होती। उनका एक ही लक्ष्य होता है किसी तरह चुनाव जीतना।

समाजवादी पार्टी के पास तो इस तरह के  लुभावने नारों और वायदों की भरमार रही है। खुला दाखिला सस्ती शिक्षा लोकतंत्र की यही परीक्षा, संसोपा ने बांधी गांठ पिछडे पांवे सौ में साठ, धन और धरती बंट के रहेगी भूखी जनता चुप न रहेगी आदि। भारत के समाजवादी युग का  ऐसा ही एक लुभावना नारा रहा है – बेकारों को काम दो या बेकारी का भत्ता दो। इस नारे के पीछे सोच यह रही है कि देश के हर नागरिक को काम देना सरकार की जिम्मेदारी है और यदि सरकार काम देने में सक्षम नहीं है उन्हें सरकार को हर्जाने के तौरपर बेकारी भत्ता देना चाहिए। कुछ लोग तो इससे भी आगे बढ़कर यह मांग करते रहे हैं कि काम के अधिकार को मौलिक अधिकार माना जाए और हरेक को काम देना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी हो जाए। न देने पर उसे हर्जाना देना चाहिए।

यह नारा बहुत क्रांतिकारी लगता है और वोट वटोरने के लिए बहुत लुभावना हो मगर न केवल अव्यावहारिक है वरन बदलती आर्थिक हालातों से बहुत दूर है। असल में भारत जैसे विशाल आबादी वाले और मिश्रित अर्थव्यवस्थावाले  देश में सरकार के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह  हरेक को रोजगार मुहैया करा सके। केवल वही सरकार ऐसा करने के बारे में सोच सकती है जिसका उत्पादन और वितरण के सारे साधनों और आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण हो। भारत जैसे मिश्रित अर्थव्यवस्थावाले देश में तो यह संभव ही नहीं है कि सरकार सबको रोजगार मुहैया करा सके। उसमें भी हमारे देश में हो तो यह रहा है कि सरकारी क्षेत्र में रोजगार दिनोंदिन कम होते जा रहे हैं क्योंकि सरकार आर्थिक गतिविधियों से हाथ खींच रही है। अब यह सोच पनपती जा रही है कि सरकार को अपने को  कुछ बुनियादी उद्योगों तक ही सीमित रखना चाहिए। बाकी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के लिए छोड़ देना चाहिए। यही कारण सरकार अपने उद्योगों को या तो बेच रही है या फिर विनिवेश कर रही है। इसलिए वह सभी को वह सभी को रोजगार उपल्ब्ध करा पाने में सक्षम नहीं है। सबको रोजगार देने की बात तो छोढिए  उत्तर प्रदेश  में तो सरकार का रोजगार मुहैया कराने को लेकर कितनी गंभीर रही है इसका अंदाज तो इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले कई वर्षों से पांच लाख शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं ये सब सेंख्शन पद हैं।लेकिन सरकार ने  इन पदों को भरने की जेहमत नहीं उठाई। अगर सरकार इन पदों को भी भरती तो लाखों लोगों का भला हो सकता था। लेकिन  जो सरकार इतना तक नहीं कर पाती वह सबको सबको रोजगार देने का सपना दिखा रही है। वह सपना पूरा न कर पाने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ते का वादा कर रही है। हालांकि इससे भी सरकारी खजाने पर बोझ बढने ही वाला है।

अक्सर सरकारें लोगों को बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने के लिए रोजगार मुहैया कराने की कोशिश करती है तो वे ज्यादातर रोजदार ऐसे होंगे जो अनुत्पादक रोजगार होते हैं जैसे कि मनेरगा के रोजगार हैं। ये अनुत्पादक रोजगार मुहैया कराने के लिए आखिर उसके पास पैसा कहां से आएगा। इनके लिए उसे या तो लोगों पर नए कर लगाने पड़ेगे।या कर्ज लेना होगा। या यह दोनों ही संभव न होने पर ज्यादा नोट छापने पड़ेगे। यानी उसका बोझ तो जनता पर ही पड़नेवाला है। इसलिए सरकार के लिए सबसे बेहतर रास्ता यही है कि वह रोजगार उपलब्ध कराने के बजाय ऐसा माहौल बनाए जिसमें आर्थिक गतिविधियां बढ़े ,उद्योग धंधे फले फूलें ।इससे रोजगार के लिए ज्यादा से ज्यादा अवसर पैदा होंगे । यह तो एक आर्थिक सत्य हैं कि जैसे-जैसे विकास दर बढ़ती है तो रोजगार तो बढ़ते हैं गरीबी भी दूर होगी। इसलिए विकास दर बढ़ने से ही ज्यादा रोजगार भी पैदा होंगे। लेकिन समाजवादी पार्टी की सरकार लोगों को इस आर्थिक सच्चाई से अवगत कराने के बजाय बेरोजगारी भत्ता का झुनझुना थमा रही है। बेरोजगारी भत्ता रोजगार का विकल्प नहीं हो सकता।

- सतीश पेड़णेकर