सरकार को जवाबदेह कैसे बनाएं? (1)

प्रतियोगिता है महामंत्र

गुररचरण दास ने सही निदान किया है – भारत समृद्ध हो जाएगा लेकिन आनंदित नहीं होगा यदि हमने शासन पद्धति को ठीक नहीं किया।। अच्छी शासन पद्धति आर्थिक समृद्धि और आनंदपूर्ण और परिपूर्ण जीवन के के बीच की कड़ी है। सचेतन या अवचेतन रूप से लोगों और राजनीतिज्ञों में शासन पद्धति की महत्व को समझना शुरू कर दिया है। लेकिन महसूस करना एक बात है और यह जानना अलग बात है कि उसे हासिल कैसे किया जाए।

जय देसाई की एकाउंटेबिलिटी डिफीशिट (जवाबदेही की कमी )पुस्तक बहुत सही समय पर आई है जिसमें शासन विधि को सुधारने के कई रास्ते बताए गए हैं।वे इसे जवाबदेही के नजरिये से देखते हैं। जय जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस में एक नया नजरिया लेकर आते हैं – यह नजरिया अकादमिशियन या सक्रिय कार्यकर्ता का नही प्रबुद्ध नागरिक का है।26 सितंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले ने जय को यह पूछने को प्रवृत्त किया – क्यों कोई जिम्मेदारी नहीं लेता,क्यों किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता  और सबसे महत्वपूर्ण असली अपराधी कौन हैं- सरकारी अधिकारी,राजनीतिज्ञ ,हम नागरिक,सरकार या आंतकवादी ?भीतर यह अहसास जागने लगता है कि भारत के नागरिक के रूप में  मैंने  अपने जीवन के पैतालिस वर्षों में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे हमारे लोक प्रसासन की नाकामी के आरोप से अपने को मुक्त कर सकूं।इस दुख ने जय और उसके साथियों को गहन शोध के लिए प्रवृत्त किया। पुस्तक प्रशासन के तीनों स्तंभों विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका पर विचार करती है। और कामकाज,प्रभावशालीता और कार्यक्षमता जैसे  गहरे तक असर करनेवाले मुद्दों को हल करने के लिए छह  तरह की पहलों का सुझाव देती है।

एक तरफ भ्रष्टाचार,कालाधन,जन लोकपाल बिल और दूसरी तरफ भूमि अधिग्रहण,किसानों की आत्महत्या,और बढ़ती आमदनी की विषमता पर वर्तमान बहस के यही बुनियादी कारण हैं। हमें पहला सवाल यह पूछना चाहिए कि सरकार की सही भूमिका या क्षेत्र क्या हो? क्या सरकार को साइकल बनाने के कारखाने और होटल चलाने चाहिए,क्या रियल इस्टेट एजंट बनकर उद्योगपतियों के लिए किसानों से बलपूर्वक जमीन का अधिग्रहण करना चाहिए,वित्तीय नाकामी के बारे में पूरी तरह जानने के बावजूद गरीबों और हताश वोटरों  को रिश्वत देना कहां तक सही है।एक बार हम ये व्यापक सवाल पूछें और पुस्तक के विश्लेषण के साधनों को लागू करें तो कुछ बुनियादी सिद्धांत आकार लेने लगते हैं।

सरकार को केवल वही करना चाहिए जो लोग (व्यक्ति,एसोसिएशन,और समुदाय )अपने लिए नहीं कर सकते। यह विचारधारा नहीं है वरन इस तथ्य को  व्यावहारिक मान्यता देना है कि हर संगठन की कुछ बुनियादी जिम्मेदारियां या मुख्य योग्यताएं है और ईमानदार और कार्य़क्षम सरकार संभवतया वह सब नहीं कर सकती जो समृद्ध और सांतिपूर्ण समाज के निर्माण के लिए जरूरी है। इसे सहयोगितात्मकता या संघीयता कहते हैं। लोग जो कर सकते हैं वह करें – ऐसी व्यवस्था,नियम और नियमन बनाएं जाएं जो लोग जो अपने लिए करना चाहते हैं उसे सुलभ बनाएं न कि उनमें बाधक बनें। केवल वही जिम्मेदारियां सरकार को दी जाएं जिन्हें लोग नहीं निभा सकते।सरकार में भी पहले जिम्मेदारी स्थानीय सरकार को सौंपी जाए,जो काम स्थानीय सरकार नहीं कर सकती वह राज्य सरकार को दिया जाए और केवल वही काम केंद्र सरकार को सौंपें जाएं जिन्हें ये दोनों सरकारे नहीं कर सकती.। एक अच्छी लोकनीति या सुशासन का पहला सिद्धांत यह होता है – माई-बाप सरकार जवाबदेह सरकार नहीं हो सकती।

जवाबदेही की चुनौती समाज के सभी क्षेत्रों पर लागू होती है।चाहे निजी कंपनियां हो ,गैर सरकारी संगठन या सरकार। लेकिन फ्रीडमैन का नियम हमें बताता है कि सरकार के सामने यह चुनौती सबसे बड़ी होती है। इस नियम के अनुसार पैसा खर्च करने के चार तरीके होते हैं –

  1. अपना पैसा अपने पर खर्च करना
  2. अपना पैसा किसी और पर खर्च करना
  3. किसी और का पैसा अपने पर खर्च करना
  4. किसी और का पैसा किसी और पर खर्च करना

यह समझना आसान है कि ज्यादातर निजी खर्च पहले तरीके के तहत आता है और ज्यादातर सरकारी खर्च चौथे तरीके के तहत आता है(किसी और का यानी करदाता का पैसा किसी और यानी उदाहरणार्थ गरीबों के लिए टीवी खरीदने पर खर्च करना। अब सवाल यह है कि  इस तरह के खर्च के बुद्धिमत्तपूर्ण और कुशल ढंग से होने की संभावना कितनी है ? कहां लाभ सबसे ज्यादा और लागत न्यूनतम होते हैं ? चौथे तरह के खर्च में यह संभावना न्यूनतम होती है।यही कारण है कि सरकार के लिए जवाबदेही का मुद्दा सबसे चुनौतीपूर्ण होता है।जवाबदेही की सही व्यवस्था सरकार पर भी काम ठीक न होने पर  वही मापदंड ,नियम और दंड लागू करेगी जो वह गैर सरकारी उत्पाद और सेवा प्रदाताओं पर लागू करती है। यदि मैं जिस कंप्यूटर को इस्तेमाल कर रहा हूं उसे आग लग जाए।तो मैं निर्माता पर मुकदमा कर सकता हूं।यदि सरकार का दोपहर का भोजन जहरीला होने के कारण पांच बच्चे मर जाते हैं तो सरकार यदि उदार मूड में होगी तो बच्चों के परिवारों के लिए मुआवजा घोषित कर देगी। पूरा मुआवजा परिवार तक पहुंचेगा या नहीं यह परिवार के भाग्य पर निर्भर करेगा। उपभोक्ता संरक्षण कानून से राज्य द्रारा दी जाने वाली बहुत सारी सेवाओं और उत्पादों को जानबूझकर अलग रखा गया है। जबकि उपभोक्ताओं और नागरिकों को सभी सेवा प्रदाताओं को चाहे सरकारी हों या निजी जवाबदेह ठहराना चाहिए।

मध्यप्रदेश सार्वजनिक सेवा गारंटी कानून 2010 में सेवाओं के न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है। इसमें अपने काम के प्रति लापरवाही बरतनेवाले सरकारी अफसरों पर स्पष्ट दंड लागू किया गया है।बिहार ने भी इसका अनुकरण किया है और कई राज्य इस तरह का कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रानिक सर्विस डीलीवरी बिल तैयार किया है जो इलेक्ट्रानिकली मुहैया कराई जानेवाली सभी सेवाओं की गुणवत्ता की गारंटी देगा।उसमें यह वायदा किया गया है कि दस वर्ष में  बिल के दायरे में  गैर इलेक्ट्रानिकली मुहैया कराई जानेवाली सेवाएं भी आ जाएंगी।

जवाबदेही और एकाधिकार दोनों एकसाथ नहीं चल सकते। सभी एकाधिकार चाहे वे सरकारी हो या प्रायवेट वे अपने स्वार्थों को साधते हैं उपभोक्ताओं या नागरिकों के स्वार्थों को नहीं । टेलीकम्युनिकेशन और एयर लाइंस उद्योगों के उदारीकरण के अनुभव ने एक सप्लायर के बजाय कई सप्लायरों के बीच प्रतियोगिता के लाभों को स्पष्ट कर दिया। सेवाओं की गुणवत्ता सुधर रही है किराए घट रहे हैं। सप्लायरों के बीच प्रतियोगिता  और उपभोक्ताओं को के लिए कई विकल्पों का वही सिद्धांत शिक्षा,स्वास्थ्य सेवाओं,सब्सि[डाइज्ड अनाज,ईंधन,और खादों पर भी लागू होता है।शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के में एक या एकाधिकारी सेवा प्रदाता हमारे पुराने टेल्को भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) की तरह खराब होगा। आदर्श तौरपर सार्वजनिक और प्रायवेट सेवा प्रदाताओं को के बीच प्रतियोगिता होनी चाहिए और लोगों के पास कई प्रदाताओं का विकल्प हो।विकल्प और प्रतियोगिता  सेवा प्रदाताओं को जवाबदेह बनाएंगे। सवाल यह है कि हम टेलीकाम और एयरलाइंस उद्योग को मिले उदारीकरण के लाभों को  शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे सामाजिक क्षेत्र में किस तरह दोहरा सकते हैं?

- पार्थ जे शाह